मौहब्बत
मौहब्बत आसां नहीं तो मुश्किल भी नहीं होती है
नाशाद लेकिन ये सबके नसीब में भी नहीं होती है
ख्वाब चाहे जितने भी आप महबूब के देख लो मगर
सभी की किस्मत में ख्वाबों की ताबीर नहीं होती है
जुदाई के बाद मिलन की बात ही कुछ और होती है
सब की किस्मत में लेकिन ऐसी जुदाई नहीं होती है
चाहे कोई लाख छुपाये अपनी मौहब्बत की बात को
आँखों की हया होंठों की मुस्कान से ये बयाँ होती है
ना बातों से ना ही खतों से ये कभी महसूस होती है
ये दिल से दिल की बात है दिल ही से महसूस होती है
चाहे कोई लाख बचाए खुद को मौहब्बत के असर से
नाशाद ये मौहब्बत है एक बार तो होकर ही रहती है
गुरुवार, 8 जुलाई 2010
सोमवार, 5 जुलाई 2010
तेरी ज़ुल्फें
बन कर घटाएं कभी बरसती हैं
बन कर हवाएं कभी लहराती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बन कर नागिन कभी डसती हैं
बन कर खुशबु कभी महकती है
तेरी ज़ुल्फें
बन कर नशा ये मदहोश कर देती हैं
बन कर साया ये आगोश में लेती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बन कर तूफां ये दिल को हिला देती हैं
बन कर अदा ये ईमां डगमगा देती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बिखर कर गालों पर कातिल बन जाती हैं
लहरा कर कांधों पर घायल कर देती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बन कर घटाएं कभी बरसती हैं
बन कर हवाएं कभी लहराती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बन कर नागिन कभी डसती हैं
बन कर खुशबु कभी महकती है
तेरी ज़ुल्फें
बन कर नशा ये मदहोश कर देती हैं
बन कर साया ये आगोश में लेती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बन कर तूफां ये दिल को हिला देती हैं
बन कर अदा ये ईमां डगमगा देती हैं
तेरी ज़ुल्फें
बिखर कर गालों पर कातिल बन जाती हैं
लहरा कर कांधों पर घायल कर देती हैं
तेरी ज़ुल्फें
रविवार, 4 जुलाई 2010
याद को विदा कर आया
याद को तुम्हारी मैं आज विदा कर आया
तेरी यादों को मैं गंगा किनारे भुला आया
तेरे लिखे खतों को मैं आज जला आया
तेरे वादों को ताज के सामने भुला आया
तेरी तस्वीर को आज हवाओं में उड़ा आया
तेरी मुस्कान को मैं फूलों को लौटा आया
तेरी चाहत को मैं पैमाने में मिला आया
तेरी आहट को मैं वीरानों में छोड़ आया
अब ना सजेगी कभी तेरी महफ़िल ए सनम
"नाशाद" शम्मां-ए-महफ़िल ही बुझा आया
याद को तुम्हारी मैं आज विदा कर आयातेरी यादों को मैं गंगा किनारे भुला आया
तेरे लिखे खतों को मैं आज जला आया
तेरे वादों को ताज के सामने भुला आया
तेरी तस्वीर को आज हवाओं में उड़ा आया
तेरी मुस्कान को मैं फूलों को लौटा आया
तेरी चाहत को मैं पैमाने में मिला आया
तेरी आहट को मैं वीरानों में छोड़ आया
अब ना सजेगी कभी तेरी महफ़िल ए सनम
"नाशाद" शम्मां-ए-महफ़िल ही बुझा आया
शनिवार, 3 जुलाई 2010
बरखा की ऋतु
बरखा की ऋतु आई है सजनिया
याद तेरी संग लाई है सजनिया
जब जब तन पर पड़े पानी की बुंदिया
यूँ लगे जैसे तूने हो मुझे छु लिया
ठंडी हवा जब जब है शोर मचाती
यूँ लगे तू आई है पायल छनकाती
नदिया जब जब है कल कल बहती
तेरी बातें हैं मुझे याद तब तब आती
दूर कहीं जब बोलती है कोयलिया
यूँ लगे जैसे तूने हो मेरा नाम लिया
यूँही ना चली जाए बरखा ओ सजनिया
अब तुम बिन ना रहा जाए ओ सजनिया
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
जब से तुम से इश्क हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
हर गली में मेरा चर्चा हुआ है
जब भी कहीं से गुजरता हूँ मैं
लिए तस्वीर तेरी हाथ में
कहते हैं सभी लो फिर रांझा आया है
खुद से ही करता हूँ बातें
तारे गिन काटता हूँ रातें
अब से मेरा एक एक पल
बस तेरे ही नाम हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
तुझ को ही खुदा मानता हूँ
तुझ से ही तुझ को माँगता हूँ
तेरे आगे करता हूँ सजदा
तेरे घर के आगे सर झुका हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
दिल ये कहे तुझे कहीं ले जाऊं
चाँद सितारों की सैर कराऊं
लेकिन कैसे कहूँ दिल की बातें
ना जाने कब होगी ऐसी मुलाकातें
अब दिल तेरे ही सपनों में खोया हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
हर दिन सूना सूना लगता था
हर घडी उदास मैं रहता था
जब तुम ना थे तो मैं था अधुरा
तुझसे ही मेरा जीवन पूरा हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
कसम है तुम्हें ना मुझे ठुकराना
मेरे सिवा किसे भी ना अपनाना
सुन लो जानम तुम मेरी ये बात
सारा जग छोड़ ये जोगी तेरे संग हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
जब से तुम से इश्क हुआ है
मंगलवार, 29 जून 2010
सुनो सजना
सुनो सजना
तुमरे बिना
मोरा जिया
अब लागे ना
जबसे हमने देखा तुम्हें
चाहा तुम्हें माँगा तुम्हें
आ भी जाओ
अब तुम तड़पाओना
मोरा जिया अब लागे ना
ख़्वाबों में आते हो
बस तुम ही तुम
ख्यालों में छाए हो
बस तुम ही तुम
तुम बिन एक पल भी
चैन आए ना
मोरा जिया अब लागे ना
निभायेंगे तुम्हारा साथ
हम जीवन भर
होंगे ना तुमसे जुदा
कभी भी पल भर
अब तो सजना मान भी जाओ ना
मोरा जिया अब लागे ना
सुनो सजना
तुमरे बिना
मोरा जिया
अब लागे ना
जबसे हमने देखा तुम्हें
चाहा तुम्हें माँगा तुम्हें
आ भी जाओ
अब तुम तड़पाओना
मोरा जिया अब लागे ना
ख़्वाबों में आते हो
बस तुम ही तुम
ख्यालों में छाए हो
बस तुम ही तुम
तुम बिन एक पल भी
चैन आए ना
मोरा जिया अब लागे ना
निभायेंगे तुम्हारा साथ
हम जीवन भर
होंगे ना तुमसे जुदा
कभी भी पल भर
अब तो सजना मान भी जाओ ना
मोरा जिया अब लागे ना
गुरुवार, 24 जून 2010
मंगलवार, 22 जून 2010
तू मेरे सामने हैं
अब और कहीं मैं क्या देखूं
जब तू मेरे सामने हैं
अब राहों के बारे में क्यों सोचूं
जब मंजिल मेरे सामने हैं
अब सितारों के बारे में क्यों सोचूं
जब चाँद खुद मेरे सामने है
अब कड़क धूप से क्यों घबराऊं
जब तेरी जुल्फों के साये मेरे सामने हैं
अब बहारों का इंतज़ार मैं क्यों करूँ
जब तेरा नजारा मेरे सामने है
अब ग़मों की मैं परवाह क्यों करूँ
जब तेरा हाथ मेरे हाथ में है
अब कोई ख्वाब मैं क्यों देखूं
जब हकीकत मेरे सामने हैं
नाशाद किसी महफ़िल में क्यों जाऊं
जब ग़ज़ल खुद मेरे सामने हैं
अब और कहीं मैं क्या देखूं
जब तू मेरे सामने हैं
अब राहों के बारे में क्यों सोचूं
जब मंजिल मेरे सामने हैं
अब सितारों के बारे में क्यों सोचूं
जब चाँद खुद मेरे सामने है
अब कड़क धूप से क्यों घबराऊं
जब तेरी जुल्फों के साये मेरे सामने हैं
अब बहारों का इंतज़ार मैं क्यों करूँ
जब तेरा नजारा मेरे सामने है
अब ग़मों की मैं परवाह क्यों करूँ
जब तेरा हाथ मेरे हाथ में है
अब कोई ख्वाब मैं क्यों देखूं
जब हकीकत मेरे सामने हैं
नाशाद किसी महफ़िल में क्यों जाऊं
जब ग़ज़ल खुद मेरे सामने हैं
रविवार, 20 जून 2010
आज फादर्स डे है. आज हम यह फादर्स डे हमारे पापा के बिना पहली बार मना रहे हैं. हमारे पापा; हमारे जन्मदाता भले ही आज हमारे बीच में जिस्मानी तौर से मौजूद नहीं है लेकिन वो हममे; हमारे जिस्म में मौजूद हैं. उनकी रूह हममे समां चुकी है. हर सांस में हमें उनका एहसास होता है. हर धड़कन में उनकी मौजूदगी महसूस होती है. वे हमसे कभी जुदा नहीं होंगे. जो दिल में बस जाता है / जो रूह में समां जाता है; वो कभी भी जुदा नहीं हो सकता. हमारी आँखें उनके ही ख्वाब देखती हैं. उनके लिए एक बहुत ही छोटा सा प्रयास भर है ये कविता. जो मैं उनके चरणों में श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत कर रहा हूँ.
ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ
भरकर आँखों में आंसू
मैं स्मरण आपको करता हूँ
सदा रहना हम में समाये
मैं आपसे निवेदन करता हूँ
अपनी सारी खुशीयाँ
अपनी सारी इच्छाएं
अपने सारे सपने
अपना शेष जीवन
मैं आपको अर्पण करता हूँ
हर जनम आपसे हम मिलें
हर जनम हमें आपसे मिलें
हर जनम हम यूहीं साथ रहें
हर जनम ये घर यूहीं आबाद रहे
हे परम पिता परमेश्वर
मैं तुमसे आज ये मांगता हूँ
आपकी बतलाई राह पर चलेंगे
आपकी हर सीख याद रखेंगे
जो भी रह गए आपके ख्वाब अधूरे
उन्हें पूरा करने का
मैं आज प्रण करता हूँ
जो भी राह दिखलाई थी आपने
उसकी ओर मैं आज गमन करता हूँ
ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ
शनिवार, 12 जून 2010
मैं तोहे पुकारूं
सांवरे तोरी सुरतिया
ले गयी मोरी निंदिया
ना रहो मोसे दूर
ओ मोरे मन बसिया
बिन तोरे मोहे चैन ना आवे
जागूं सारी रैन मोरा जी घबरावे
दिन कट जावे पर कटे ना रतियाँ
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
कासे कहूँ अब मैं मन की पीरा
लगूं मैं बिरहन जैसे श्याम बिन मीरां
नीर बहे नैनों से जैसे कोई नदिया
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
कब से खड़ी राह मैं तोरी निहारूं
पवन संग दे आवाज मैं तोहे पुकारूं
ना आ सको तो भेजो अपनी कोई खबरिया
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
सांवरे तोरी सुरतिया
ले गयी मोरी निंदिया
ना रहो मोसे दूर
ओ मोरे मन बसिया
बिन तोरे मोहे चैन ना आवे
जागूं सारी रैन मोरा जी घबरावे
दिन कट जावे पर कटे ना रतियाँ
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
कासे कहूँ अब मैं मन की पीरा
लगूं मैं बिरहन जैसे श्याम बिन मीरां
नीर बहे नैनों से जैसे कोई नदिया
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
कब से खड़ी राह मैं तोरी निहारूं
पवन संग दे आवाज मैं तोहे पुकारूं
ना आ सको तो भेजो अपनी कोई खबरिया
ना रहो मोसे दूर ओ मोरे मन बसिया
गुरुवार, 10 जून 2010
अब कुछ नहीं
जब बिखर गई सारी दुनिया
अब सिवाय पछतावे के कुछ नहीं
जब टूट गए सारे रिश्ते
अब सिवाय दूरीयों के कुछ नहीं
जब तिनके तिनके हुई उम्मीदें
अब सिवाय ख़्वाबों के कुछ नहीं
जब बिछुड़ गया कोई हमसे
अब सिवाय यादों के कुछ नहीं
जब दूर हो गई सभी आहटें
तो सिवाय सन्नाटों के कुछ नहीं
जब ओझल हो गई हैं मंजिलें
अब सिवाय सहरा के कुछ नहीं
जब जीवन से लम्बी हो गई राहें
अब सिवाय मोड़ों के कुछ नहीं
जब सूनी हो गई हैं सभी महफिलें
"नाशाद" सिवाय तनहाईयों के कुछ नहीं
जब बिखर गई सारी दुनिया
अब सिवाय पछतावे के कुछ नहीं
जब टूट गए सारे रिश्ते
अब सिवाय दूरीयों के कुछ नहीं
जब तिनके तिनके हुई उम्मीदें
अब सिवाय ख़्वाबों के कुछ नहीं
जब बिछुड़ गया कोई हमसे
अब सिवाय यादों के कुछ नहीं
जब दूर हो गई सभी आहटें
तो सिवाय सन्नाटों के कुछ नहीं
जब ओझल हो गई हैं मंजिलें
अब सिवाय सहरा के कुछ नहीं
जब जीवन से लम्बी हो गई राहें
अब सिवाय मोड़ों के कुछ नहीं
जब सूनी हो गई हैं सभी महफिलें
"नाशाद" सिवाय तनहाईयों के कुछ नहीं
बुधवार, 9 जून 2010
सामने भी आया कर
मेरे खयालों ही में ना रह तू
हकीकत में सामने भी आया कर
लबों पे नहीं आती दिल की हर बात
कभी मेरी ख़ामोशी भी समझा कर
मेरे महबूब ज़िन्दगी संवर जायेगी तेरी
युहीं आकर मुझसे हर रोज़ मिला कर
ना रख जिंदगी के सफहों को खाली
हर सफ़हे पर मेरा नाम लिखा कर
तेरी मुस्कान से बहारें है मेरे जीवन में
बस हर वक्त युहीं तू मुस्कुराया कर
रविवार, 6 जून 2010
जुदा कर सकता नहीं
जिस्म को जान से जुदा कर सकता नहीं
तेरी याद को खुद से जुदा कर सकता नहीं
मंजिल को राहों से जुदा कर सकता नहीं
तेरी गलीयों से राह अपनी बदल सकता नहीं
साये को खुद से जुदा कर सकता नहीं
तेरी तस्वीर को आँखों से हटा सकता नहीं
दिल को दर्द से जुदा कर सकता नहीं
तेरे लिखे खतों को मैं जला सकता नहीं
सावन को घटाओं से जुदा कर सकता नहीं
तेरे नाम को अपने से जुदा कर सकता नहीं
खुद को भुला सकता हूँ मगर तुम्हे भुला सकता नहीं
अपने इश्क का कोई और वास्ता मैं दे सकता नहीं
जिस्म को जान से जुदा कर सकता नहीं
तेरी याद को खुद से जुदा कर सकता नहीं
मंजिल को राहों से जुदा कर सकता नहीं
तेरी गलीयों से राह अपनी बदल सकता नहीं
साये को खुद से जुदा कर सकता नहीं
तेरी तस्वीर को आँखों से हटा सकता नहीं
दिल को दर्द से जुदा कर सकता नहीं
तेरे लिखे खतों को मैं जला सकता नहीं
सावन को घटाओं से जुदा कर सकता नहीं
तेरे नाम को अपने से जुदा कर सकता नहीं
खुद को भुला सकता हूँ मगर तुम्हे भुला सकता नहीं
अपने इश्क का कोई और वास्ता मैं दे सकता नहीं
शुक्रवार, 4 जून 2010
मौहब्बत ये क्या रंग लाई है देखो
मौहब्बत ये क्या रंग लाई है देखो
हर सिम्त तुम ही नज़र आते हो देखो
ख़त तो लिखा था हमने तुम्हे मगर
लिफाफे पर अपना ही पता लिख दिया है देखो
तुम्हारे चेहरे से नज़र नहीं हटती मगर
अब तुम्हारी तस्वीर से शरमा रही हूँ देखो
हर वक्त जुबां पर रहता था नाम तुम्हारा मगर
अब कहते हुए तुम्हारा नाम जुबां काँप रही है देखो
हर रोज़ तेरा नाम ऊंगलीयाँ लिखती थी मगर
अब लिखते हुए नाम तुम्हारा ऊंगलीयाँ काँप रही है देखो
बुधवार, 2 जून 2010
तुम यकीन करोगी !
तुम यकीन करोगी !
क्या तुम यकीन करोगी !!
तुम्हारे लिए,
मैं हर रात एक नया ख्वाब देखता था
हर दरख़्त पर तुम्हारा नाम लिखता था
तुम्हारी किताबों में फूल रखता था
तुम्हारे नाम की पतंग उड़ाता था
तुम्हे पाने की कल्पना करता था
तेरे ही ख्यालों में खोया रहता था
रेत पर अपनी किस्मत लिखता था
तुम्हें ख़त हर रोज़ एक लिखता और
फिर उन्हें खुद ही पढ़ा करता था
सितारों में तुम्हारी तस्वीर तलाशता था
हर मोड़ पर तुम्हारी राह तकता था
खुद के साये को तेरा साथ समझता था
तेरी तस्वीर से हर दिल की बात कहता था
हर सांस तुम्हारे नाम की लेता था
क्योंकि मैं तुमसे बेपनाह मौहब्बत करता था
तुमसे बेपनाह मौहब्बत करता था
उस वक्त भी नहीं किया
अब क्या करोगी
क्या तुम यकीन करोगी ?
तुम यकीन नहीं करोगी
कभी नहीं करोगी
मंगलवार, 1 जून 2010
तुझ में बसी है मेरी जान रे
तोहे कैसे भुलाऊँ सजनवा
तुझ में बसी है मेरी जान रे
मोहे ना तू बिसराना कभी
तुझ बिन तज दूंगी प्राण रे
मोहे ना आए एक पल भी चैन
तारे गिन गिन काटू मैं रात रे
होरी खेले सखियाँ पिय के संग
मोरा साजन नहीं मोरे साथ रे
गए हो जब से परदेस सजनवा
आया ना कोई संदेस रे
भेजो अब अपनी कोई खबरिया
तन से उखड रही सांस रे
आ गई फिर रुत बरखा की
बरस रहा आसमान रे
ताना मारे हैं सारी सखियाँ
तन मन में लग रही आग रे
राह तोहरी निहारते सजनवा
पथरा गई है अब आँख रे
लौट आओ नहीं तो चल दूंगी
अब लेकर मैं चार कहार रे
सोमवार, 31 मई 2010
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे भर ले आंखों में आंसू
चाहे दिल से आवाज़ लगा ले
दिल तोड़ कर जो गए हैं
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे लिख दे लाख संदेशे
चाहे हर मोड़ पर राह तक ले
जो गुजर गए हैं उन राहों से
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे खुदा से फरियादें कर ले
चाहे खुद को बरबाद कर ले
जो बसा चुके अपनी अलग दुनिया
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे मंदिर में दिए जला ले
चाहे सब कुछ न्यौछावर कर दे
जो हो गए हैं किसी और के
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे रिश्तों की याद दिला दे
चाहे वफाओं का वास्ता दे दे
जो हो बेवफा कहीं चल दिए है
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे फिर महफिलें सजा ले
चाहे फिर शम्मा जला ले
जो डरते हैं जलने से नाशाद
वे नहीं परवाना बननेवाले
चाहे भर ले आंखों में आंसू
चाहे दिल से आवाज़ लगा ले
दिल तोड़ कर जो गए हैं
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे लिख दे लाख संदेशे
चाहे हर मोड़ पर राह तक ले
जो गुजर गए हैं उन राहों से
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे खुदा से फरियादें कर ले
चाहे खुद को बरबाद कर ले
जो बसा चुके अपनी अलग दुनिया
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे मंदिर में दिए जला ले
चाहे सब कुछ न्यौछावर कर दे
जो हो गए हैं किसी और के
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे रिश्तों की याद दिला दे
चाहे वफाओं का वास्ता दे दे
जो हो बेवफा कहीं चल दिए है
वे नहीं लौट कर आनेवाले
चाहे फिर महफिलें सजा ले
चाहे फिर शम्मा जला ले
जो डरते हैं जलने से नाशाद
वे नहीं परवाना बननेवाले
शनिवार, 29 मई 2010
अब हमें चुप नहीं रहना है
अब हमें चुप नहीं रहना है
हम सब का यह कहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
जो भी नफरत फैला रहे हैं
उनको अब सबक सिखाना है
जो भी आपस में लड़ा रहे हैं
उनको बेनकाब अब करना है
जो भी गरीबों का खून चूस रहे हैं
उन्हें खून की कीमत बताना है
अब हमें चुप नहीं रहना है
हम सब का यह कहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
जो निर्दोषों को मार रहे हैं
उन्हें सूली पर चढ़ाना है
जो खून की नदीयाँ बहा रहे हैं
उन्हें गंगा का महत्व बताना है
जो मजहब को बदनाम कर रहे हैं
उन्हें मजहब का मतलब बताना है
जो नहीं समझते प्रेम की भाषा
उन्हें दूसरी भाषा में समझाना है
अब हमें चुप नहीं रहना है
हम सब का यह कहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
जो धर्म के नाम पर लड़ा रहे हैजो जाति के नाम पर बाँट रहे हैं
जो बेहिसाब भ्रष्टाचार कर रहे हैं
जो देश की दौलत को खा रहे हैं
जो जनता को धोखा दे रहे हैं
उन सब को अब चेताना है
यह सब अब बंद करवाना है
हम सब का यह कहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
इस देश की शान बढ़ाना है
इसे सबसे आगे ले जाना है
इसे एक मिसाल बनाना है
इसे फिर सोने की चिड़िया बनाना है
इसे फिर देवभूमि बनाना है
हम सब का यह कहना है
अब हमें चुप नहीं रहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
जो भी गरीब का खाना छीन रहे हैं
जो देश की दौलत को लील रहे हैं
जो देश की अस्मिता से खेल रहे हैं
उन्हें असली जगह पर भेजना है
उन्हें उनकी औकात बताना है
उन्हें अपनी ताकत बताना है
अब हमें चुप नहीं रहना है
हम सब का यह कहना है
हम भारतीयों का यह कहना है
हम सब को अब एक हो जाना है
हमें धर्म के नाम पर नहीं लड़ना है
हमें जातियों में नहीं बंटना है
हमें प्रान्तों में नहीं बंटना है
हमें भाषाओं में नहीं बंटना है
हमें भारतवासी बनना है
हमें भारतवासी बनना है
हमें धर्म के नाम पर नहीं लड़ना है
हमें जातियों में नहीं बंटना है
हमें प्रान्तों में नहीं बंटना है
हमें भाषाओं में नहीं बंटना है
हमें भारतवासी बनना है
हमें भारतवासी बनना है
शुक्रवार, 28 मई 2010
तलाशती है आँखें
बीते लम्हे भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें
अपनों की भीड़ में अक्सर
ख़ुद को तलाशती है ऑंखें
खुशीयाँ तलाशती है आँखें
तन्हाईयों खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें
हर बेगाने चेहरे में
अपनों को तलाशती है आँखें
बंद पड़े उस दरीचे में
किसी को तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलियों में
बिछुडे यार तलाशती है आँखें
हैवानों की इस दुनिया में
इंसान तलाशती है ऑंखें
दम तोड़ती हुई जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें
टूटते हुए सभी रिश्तों में
करीबीयाँ तलाशती है आँखें
शाम ए ग़ज़ल है यारों
मंगलवार, 25 मई 2010
यह रचना भी मेरे दिल के बहुत करीब है. इसका कारण एक सच्ची घटना है. घटना करीब चार साल पुरानी है. मैं गर्मी की छुट्टीयों में जोधपुर गाया हुआ था. उन दिनों ही इस रचना की पहली पंक्ति का जन्म हुआ था. यह रचना बहुत ही अजीब हालात में मैंने लिखी थी. मेरा कॉलेज के ज़माने का मित्र करीब बीस साल बाद मुझसे मिला. हम दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि जब दो दोस्त इतने लम्बे अरसे के बाद मिल रहे हो तो कैसा माहौल हो जाता है. अपनी पुरानी बातों को याद किया. फिर जब मैंने उससे यह पुछा कि घर में सब कैसे हैं तो उसका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया. उसने कहा कि वो अकेला ही है और शादी नहीं हुई है. बहुत कुरेदने के बाद उसने सारी बात बताई. उसने बताया कि उसकी पहचान एक लड़की से हुई थी. दोनों अक्सर आमने सामने आ जाते. यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा. उस लड़की के चेहरे से ऐसा लगने लगा था जैसे वो उसे कुछ कहना चाहती है लेकिन मेरे इस दोस्त को उसका चेहरा पढना नहीं आया. मेरे मित्र की जयपुर में नौकरी लग गई और वो वहां चला गया करीब दो साल बाद जब वो वापस लौटा तो उसकी ममेरी बहन से यह पता चला कि वो लड़की उससे प्यार करती थी और इजहार करना चाहती थी लेकिन मेरे मित्र की बेरुखी या नासमझी से वो यह सब कह नहीं पाई. उस लड़की ने अपने घरवालों से यह बात बताई लेकिन लड़का दूसरी जाति का होने कि वजह से यह रिश्ता नामंजूर कर दिया गया. उस लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं और कर दी गई. उस लड़की ने यह सारी बात मेरे मित्र की ममेरी बहन को शादी के बाद बताई. मेरे मित्र की ममेरी बहन का ससुराल भी उदयपुर था जहाँ उस लड़की की शादी हुई थी. जब मेरे मित्र को यह सारी बात पता चली तो उसे जबरदस्त धक्का लगा. वो कई दिन तक गुमसुम रहा और उसे अपनी नासमझी पर बहुत गुस्सा भी आया वो बहुत पछताया लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकता था. उसे खुद भी यह अंदाजा नहीं था कि इस घटना का सदमा उसे ऐसे हालात की तरफ ले जाएगा कि उसे शादी के नाम से ही नफ़रत हो जायेगी. इसी के चलते उसने आज तक शादी नहीं की है और वो आज भी अकेला जयपुर में ही रह रहा है. मैं उस रात सारे वक्त जगाता रहा और उसके बारे में ही सोचता रहा. उस वक्त मेरे दिल में केवल एक ही पंक्ति आई कि "काश वो समझ पाता" धीरे धीरे समय गुजरता गया. कुछ दिन पहले मुझे एक बार फिर उस मित्र के साथ घटी वो घटना याद आई और साथ ही वो पंक्ति भी. बस उसी वक्त इस रचना का जन्म हो गया.
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी आँखों में उठते सवालों को
हमारे दिल में उठती हुई लहरों को
काश कभी मैं समझ पाता
उदास होती हुई उन शामों को
लम्बी होती हुई उन रातों को
काश कभी मैं समझ पाता
अधूरी लगती हर मुलाकातों को
होठों पर रूकती हुई उन बातों को
काश कभी मैं समझ पाता
हमारे दिल में बढती हुई उस घबराहट को
मुलाकातों के लिए बढती हुई चाहतों को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी आँखों में बरसते सावन को
हर चेहरे में तुम्हारी तलाश को
काश कभी मैं समझ पाता
हर बात में तुम्हारे उस रूठ जाने को
मेरे मनाते ही तुम्हारे मान जाने को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी किताबों में लिखे मेरे नामों को
तुम तक ना पहुंचे मेरे उन पयामों को
काश कभी मैं समझ पाता
हमारी मुलाकातों पर उठती उंगलीयों को
मुझ पर हंसती तुम्हारी उन सहेलीयों को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी गलियों की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को
सुनते ही हमारा नाम तुम्हारा शरमाने को
काश कभी मैं समझ पाता
अलसाई हुई उन दोपहरों को
जलती हुई बरसात की बूंदों को
काश कभी मैं समझ पाता
अंतिम मिलन पर हमारी आँखों के सावन को
जो हम ना कह सके उन सभी बातों को
काश कभी मैं समझ पाता
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