शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
















अब मैं जीना सीख गया हूँ 
मैं अपनी धुन में रहता था
जो दिल चाहे वो करता था
मैं नहीं किसी की सुनता था
मैं यहाँ वहां भटकता था

सभी कहते थे कि मैं आवारा हूँ
जिसे कुछ ना मिला वो बेचारा हूँ
खुद अपनी किस्मत का मारा हूँ
नहीं किसी काम का मैं नाकारा हूँ

तुम क्या आई मेरे जीवन में
तुमने मुझे बदल डाला
प्रेम के दो घूँट पिला कर तुमने
बन दिया मुझे प्रेम मतवाला

अब मैं  सब कुछ भूल  गया हूँ
तेरी आँखों की झील में डूब गया हूँ

अब मैं तुम में खोया रहता हूँ
अब तेरी बातें ही सुनता हूँ
तेरी गलीयों में ही भटकता हूँ
तेरे ही सपने देखता हूँ

कहते हैं ये लोग सभी
मैं पहले भी आवारा था
और अब भी आवारा हूँ
मैं तेरे इश्क का मारा हूँ
मैं किसी का आशिक हूँ
और इसलिए नाकारा हूँ 

अब दुनिया को कैसे समझाऊँ
अब लोगों को मैं क्या समझाऊँ

कैसे कहूँ मैं आवारा नहीं
कैसे कहूँ मैं नाकारा नहीं

मैं कितना अब बदल गया हूँ
मैं यहाँ वहां की बातें भूल गया हूँ
अब मैं संभालना सीख गया हूँ
किसी को अपना बनाना सीख गया हूँ
हर सांस को जीना सीख गया हूँ
मैं प्रेम करना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ


गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

किसी ने भुला दिया है मुझे

शायद किसी ने भुला दिया है आजकल  मुझे
तभी तो आती नहीं हिचकियाँ आजकल मुझे

शायद कोई नहीं पुकारता है नींदों में अब मुझे
तभी तो आते नहीं है किसी के ख्वाब अब मुझे

शायद  कोई  नहीं  पढ़ता है  अब  मेरे लिखे ख़त
तभी तो नामावर नहीं मुस्कुराता है अब देख मुझे 

शायद कोई नहीं करता है मेरा ज़िक्र अब कहीं
तभी तो नहीं सुनाता कोई  नया अफसाना मुझे

शायद नहीं करता है अब कोई राहों में मेरा इंतज़ार
तभी तो मंजिल  नहीं नज़र  आती  अब करीब मुझे

शायद नहीं पढता है कोई मेरे लिखे शेर महफिलों में
तभी तो "नाशाद" वहां रौनक  नहीं नज़र आती मुझे 

धीरे धीरे

आ रहे हैं वो मेरे करीब
धीरे धीरे
बढ़ रही है धडकनें मेरी
धीरे धीरे

महकने लगी है हवाएं
धीरे धीरे
बरसने लगी है घटाएं
धीरे धीरे

वो भी समझेंगे मुझे
धीरे धीरे
इश्क का होगा असर
धीरे धीरे

अच्छा लगने लगूंगा उन्हें
धीरे धीरे
हो जायेंगे एक दिन वो मेरे
धीरे धीरे

बुधवार, 31 मार्च 2010

तुम्हें पहचान लेता हूँ 

चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ

तुमने किया है चुपके से याद मुझे
चमकते चाँद से जान लेता हूँ
मेरी तस्वीर को अकेले में छुआ है तुमने
अपनी बढती धड़कन से जान लेता हूँ

शरमा रही हो मन ही मन में
लचकती डालीयों से जान लेता हूँ
दबे होठों से लिया है तुमने मेरा नाम
हवाओं की खुशबू से जान लेता हूँ

मैंने तुमसे किया है प्यार
मैं तुम पर अपनी जान देता हूँ
खुदा ने तुम सा कोई और ना बनाया
मैं उसे अपना सलाम देता हूँ

हर आशिक अपनी महबूबा को दे तुम्हारा नाम
मैं आज ये ऐलान करता हूँ
मेरा दिल, मेरा प्यार , मेरी हर आरज़ू
आज मैं तुम्हारे नाम करता हूँ

चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ

मंगलवार, 30 मार्च 2010

आँखें मेरी सजल हो गई 

तुम क्या सामने आये प्रियतम
मैं ऐसी भाव-विव्हल हो गई कि
आँखें मेरी सजल हो गई

जाने कितने ही सावन आये
संग अपने तेरी यादें ले लाये
घने बादल फिर खूब बरसाए
पर ऐसी बरसात कभी ना हुई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई

तुम्हे खोजा मैंने सितारों में
तुम्हे पुकारा मैंने यादों में
करते करते याद तुम्हे प्रियतम
मैं ना जाने जैसे कहीं खो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई

अब ना कभी तुम होना दूर
मेरे ही सामने अब रहना तुम
मुझे जो भी ख़त लिखे थे तुमने
मेरे लिए जैसे वो ही ग़ज़ल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई

तुम बिन रहा ना जाए 

ढल गई है शाम अब
पंछी भी घर लौट आये
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए

तुम्हारे वादे पर  मैं  जी रही हूँ
तुम्हारे नाम की साँसें ले रही हूँ
बहुत दूर है गाँव तुम्हारा
अब एक कदम भी चला ना जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए

तुम्हारी राहों में फूल बिछाए बैठी हूँ
तुम्हारी यादों के दिए जलाये बैठी हूँ
बहारों के मौसम भी है अब आनेवाले
फिर से चलने लगी है पुरकेंफ़ हवाएं
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए

अब ना कभी मैं तुम्हें दूर जाने दूँगी
कैसी भी हो राहें संग तुम्हारे चलूंगी
फिर से छाएंगे बादल और बरसेंगी बरखा
इस बार भी सावन कहीं सूखा ना चला जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए 

सोमवार, 29 मार्च 2010

ना जाने तुम कौन हो 

ना जाने तुम कौन हो
जो इस तरह मेरे दिल में समां गए हो
जो इस तरह मेरी दुनिया बदल गए हो

ना जाने तुम कौन हो
जो मेरी  साँसों को  महका  गए  हो
जो मेरी आँखों में आकर बस गए हो

ना जाने तुम कौन हो
जो मेरे होठों को  एक  नई मुस्कान दे गए हो
जो मेरे गालों की लालिमा को और बढा गए हो 

ना जाने तुम कौन हो
जो फागुन के रंगों को और भी रंगीन कर गए हो
जो पतझड़ में भी हर तरफ बहारें लेकर आये हो

ना जाने तुम कौन हो
जो मुझे अब  हर तरफ  नज़र आने लगे हो
जो मुझे ख्वाबों में भी आकर सताने लगे हो

ना जाने तुम कौन हो
जो अब  मुझ को  मुझ ही से  छीन रहे हो
जो ना जाने किस बंधन में मुझे बाँध रहे हो 

ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो




















कजरारी आँखों वाली लडकी 


वो कजरारी आँखों वाली लड़की 
अब भी मुझे याद आती है 
उसकी कभी ना ख़त्म होनेवाली बातें 
अब भी मुझे याद आती है 


मैं चाहे सुनूँ ना सुनूँ 
वो अपनी हर बात बताती थी 
मैं चाहे मानूँ ना मानूँ
वो हर बात पर सलाह देती थी 


मैं जब भी छत पर पढने जाता था 
वो कंकर फेंक कर सताती थी 
मैं जब भी गहरी सोच में होता था 
उसे मेरी चिंता सताती थी 


जब भी मेरे इम्तिहान नज़दीक आते थे 
वो मेरे लिए रोज़ दुआएं मांगती थी 
जब भी देखती थी मेरा खिला चेहरा 
उसके चेहरे पर भी चमक आ जाती थी 


जब मैं वापस लौट रहा था 
उसका चेहरा मुरझाया हुआ था 
उसकी कजरारी आँखें नाम थी 
उसके कदम लडखडा रहे थे 
वो कुछ कहना चाह रही थी 
मगर उसकी बेहिसाब सिसकीयाँ 
उसे शायद रोक रही थी


मैं  वापस घर लौट आया 
मगर आज तक उसे भुला नहीं पाया 


उसकी सिसकीयाँ आज भी मुझे सुनाई देती है 
उसकी आवाज़  आज  भी  मुझे सुनाई देती है


उसकी  हंसी मुझे हर वक़्त सुकून देती थी 
उसकी बातें मुझमे नया जोश भर देती थी 


मैं उसे शायद समझ नहीं पाया 
मैं उसकी आँखों को पढ़ नहीं पाया 
उसके दिल की बात जान नहीं पाया 


वो क्यों मुझे देख खुश हो जाती थी 
वो क्यों मेरे लिए दुआएं मांगती थी 
वो क्यों मेरी हर ख़ुशी में शामिल हो जाती थी 


कहते हैं मोहल्ले के लोग 
वो मुझसे प्यार करती थी
मुझसे  बे इन्तेहा मौहब्बत करती थी 


आज लग रहा है मुझे 
वो शायद मुझसे प्यार करती थी 
हाँ वो मुझसे प्यार करती थी 
वो कजरारी आँखों वाली लड़की 
मुझसे प्यार करती थी 



रविवार, 28 मार्च 2010

वो शायद दीवाना था 

वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
अक्सर मेरी गलीयों में
वो बेमतलब घूमा करता था
देखकर मुझे दरीचे में खड़ा
वो अक्सर मुस्कुराया करता था

शाम को छत पर आकर वो
मेरा नाम लिखी पतंगे उड़ाता था
ना जाने खाली सफहों पर
कुछ लिखता और खुद ही पढ़कर
मन ही मन जैसे शरमाया करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था

मुझसे मिलने की वो
अक्सर कोशिश करता था
पर मेरे सामने आते ही वो
ना जाने कहाँ छुप जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था

मैं उसकी हर बात पर
हंस कर रह जाया करती थी
मेरे हंसने पर वो ना जाने क्यों
कुछ खोया खोया सा हो जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था

एक अरसा बीत गया
वो अब दिखाई नहीं देता
मैं उसे अक्सर याद करती हूँ
ना जाने वो कहाँ खो गया
अक्सर उसकी बातें और
वे छोटी मुलाकातें याद करती हूँ

उसका वो मासूम चेहरा
अब भी मेरी आँखों में रहता है
कहती है मेरी सब सहेलीयां
वो मुझसे प्यार करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था 

लेकिन ना जाने वो क्यों
कुछ भी कहने से डरता था
अब अक्सर सोचती रहती हूँ
वो ऐसा क्यों करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था 


तुम अच्छे लगते हो 

तुम अच्छे लगते हो
मुझे तुम अच्छे लगते हो

जब भी मुस्कुराते हो तो
और भी अच्छे लगते हो

जब भी रूठ जाते हो तो
बहुत अच्छे लगते हो

जब भी गुस्साते हो तो
बहुत ही अच्छे लगते हो

लेकिन जब भी शर्माते हो तो
सबसे अच्छे लगते हो

तुम अच्छे लगते हो
मुझे तुम अच्छे लगते हो




शनिवार, 27 मार्च 2010

तेरा चेहरा नज़र आता है 

जब भी देखता हूँ मैं आईना
मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
मेरी मुस्कान में सनम अब
मुझे तेरा प्यार नज़र आता है

कोई भी लेता हूँ जब मैं नाम
तेरा ही नाम जुबां पर आता है
जिस गली से भी गुजरूँ मैं
मुझे तेरा ही घर नज़र आता है

जब भी किसी से करता हूँ बातें
मुझे तेरी आवाज़ सुने देती है
जब भी खनकती है कोई पायल
मुझे तेरी आहट सुनाई देती है

जब भी शाम को जाता हूँ छत पर
मुझे अपनी मुलाकातें याद आती है
जब भी झूम के बरसता है सावन
मुझे हमारी मोहब्बत याद आती है

जब भी पढता हूँ तेरे लिखे ख़त
मुझे उनमे से तेरी खुशबू आती है
देखता हूँ मैं जब भी तेरी तस्वीर
मुझे मेरा चेहरा नज़र आता है 

शुक्रवार, 26 मार्च 2010

भूल ना जाना 
















पीपल की छाँव को
बचपन के गाँव को
सावन के झूलों को
कागज़ की नांव को
भूल ना जाना

बाबा की डांट को
मां की लोरीयों को
दादा की सीख को
दादी की दुलार को
भूल ना जाना

धुल उड़ाती गलीयों को
फूलों पर बैठी तितलीयों को
खेतों में लहराती फसलों को
पनघट पर बतियाती सखियों को
भूल ना जाना

बचपन के यारों को
मुस्कुराते दरीचों को
अपनों की महफ़िलों को
सपनों की दुनिया को
भूल ना जाना

शहर की भीड़ - भाड़ में
दौलत पाने की चाह में
रोज़ नई मंजिल की तलाश में
पुरानी सुहानी यादों को
भूल ना जाना

लोगों की भीड़ में कहीं खो ना जाना
खुद को ही कहीं भूल ना जाना
अपनों से दूर नहीं हो जाना
घर लौट आने की राह भूल ना जाना
" नाशाद " कहीं भटक ना जाना
जिंदगी को कहीं भूल ना जाना 


बुधवार, 24 मार्च 2010

ये ना जाने कोई 

कितना लम्बा ये सफ़र है
ये ना जाने कोई
कहाँ तक अब ये डगर है
ये ना जाने कोई

कौन देखेगा कल की सहर
ये ना जाने कोई
किसकी है ये आखिरी शब
ये ना जाने कोई

कब तक हवाएं साथ है
ये ना जाने कोई
कब तक सूरज में आग है
ये ना जाने कोई

कब तक चाँद में शीतलता है
ये ना जाने कोई
कब तक सितारों का कारवाँ है
ये ना जाने  कोई

कब तक कदमों की चाल है
ये ना जाने कोई
कब तक सभी को ये आस है
ये ना जाने कोई

कब तक हम यहाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक ये जहां है
ये ना जाने कोई

कब तक  दुआओं में असर है
ये ना जाने कोई
कब तक उसकी हम पर नज़र है
ये ना जाने कोई



 
तू क्यों मौन है 

मैंने सुना था तू
हम सब को बनाता है
हम सब को तारता है 
हम सब को पालता है
हम सब को खुश रखता है
हम सब का अन्नदाता है
हम सब का घर बसाता है
हम सब के दुःख दूर करता है
हम सब के बिगड़े काम बनाता है
हम सब की राहें आसान करता है
हम सब को भवसागर पार कराता है

पर अक्सर मैंने
लोगों को भूख से तड़पते  देखा है
लोगों को खून के आंसू बहाते देखा है
लोगों के घर उजड़ते देखा है
लोगों को खाली पेट सोते देखा है
लोगों को रोते बिलखते देखा है
लोगों को ग़मों के समंदर में डूबते देखा है
लोगों को टूटते बिखरते देखा है
लोगों को राहों में भटकते बिछुड़ते देखा है
लोगों को बिना कारण मरते देखा है
लोगों को अपनों के लिए तरसते देखा है
लोगों को छोटी सी ख़ुशी के लिए तरसते देखा है

ये मैंने तेरा कैसा संसार देखा है
क्या सभी की किस्मत में तूने यही सब लिखा है
क्या सचमुच ये संसार तेरी ही देन है
क्या सभी जिंदगी जैसे लम्बी काली रैन है

मेरे इन सवालों पर तू क्यों मौन है
बता तू क्यों मौन है

मंगलवार, 23 मार्च 2010

वो नहीं मिला 

यूँ तो जिंदगी में हमें बहुत कुछ मिला
मगर जो चाहा था हमें वो नहीं मिला

खोजते रहे मगर मंजिल का रास्ता नहीं मिला
जीवन भर यही  बस  चलता  रहा  सिलसिला

ना कह सकता हूँ खुद से कि हमें मौका नहीं मिला
अपनी बात कहने  का  हमें हौसला  ही नहीं मिला

किस्मत का साथ तो "नाशाद" हमें हर वक्त ही मिला
खुद ही ना दे सके अपना साथ अब किससे करें गिला


रविवार, 21 मार्च 2010

मैं 

आँखें है कहीं खोई खोई
चेहरा है उलझा उलझा
जिंदगी का जैसे मसला कोई
आज तक हो नहीं सुलझा

दिल कहीं रहता है मेरा
धड़कन कहीं और है खोई
मंजिल है सामने खड़ी पर
रास्ता अभी तक कोई नहीं सूझा

खयाल एक तरफ जा रहे
इरादे चल दिए हैं और कहीं
कदम डगमग डगमग हो रहे
जीवन का हर एक तार है उलझा

जिस्म बिखरा है टुकड़े टुकड़े
जुड़ेगा कैसे ये ना जाने कोई
रातें होती है सभी की काली
यहाँ दिन भी है उलझा उलझा

आँखें है कहीं खोई खोई
चेहरा है उलझा उलझा 
जिंदगी का जैसे मसला कोई 
आज तक हो नहीं सुलझा 


गुरुवार, 18 मार्च 2010

गरीबों का मज़ाक उड़ाती मायावती 

पिछले दो दिनों से मायावती ने जो कुछ भी किया है वो सिर्फ और सिर्फ गरीबों का मज़ाक उड़ाया है. जिस देश में आज भी लगभग बीस फीसदी लोग दो वक्त कि रोटी भी ठीक ढंग से नहीं जुटा पाते. लगभग तीस फीसदी लोगों के पास अपने तन को ठीक ढंग से ढकने के लिए कपडे नहीं है ; एक तिहाई जनता के पास अपना कोई मकान नहीं है और बेरोजगारी को कोई हिसाब नहीं है औए भ्रस्टाचार की फांस दिन दूनी रात चौगुनी कसती जा राही है   उस देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री अगर ऐसी हरकत करे तो ये बड़े ही शर्म की बात है. कहने को वो खुद को दलित की बेटी कहती है लेकिन सारा खेल दौलत का ही खेलती है. खुले आम लोगों से चंदा लेने में इन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती. कृपालुजी महाराज के आश्रम  में हुई भगदड़ से मरे लोगों को मुआवजा ठुकराते हुए उसने यह कहा कि सरकारी खजाने में पैसे नहीं है और कल की रैली पर करोड़ों खर्च  हुए हैं.  ये रुपये कहाँ से आये. बरेली जल रहा है .कत्ले आम मचा हुआ है लेकिन मायावती नोटों की माला पहनने में और अपना स्वागत - सत्कार कराने में मशगूल है . मुख्यमंत्री के तलुए चाटने वाले प्रदेश के मंत्री उपर से यह कह  रहे हैं कि अब वे हमेशा बहनजी ( ? ) को नोटों की ही माला पहनाएंगे. हद हो गई पद लोलुपता और जी हुजूरी की.
इसी मायावती ने कभी ब्राह्मणों को लात मारने की बात कही थी और आज वही ब्राह्मण वर्ग उसी मायावती के पैरों में शरण लिए हुए हैं. कम से कम ब्राह्मन समाज से यह उम्मीद किसी को भी ना थी . यह महिला किसी भी सरकारी कर्मचारी को जब चाहे तब थप्पड़ मार देती है और कोई चूं तक नहीं करता. इस प्रदेश के मंत्री और एम् एल ए खुले आम सरकारी कर्मचारियों को धमकाते हैं और कभी कभी उनका क़त्ल भी कर देते हैं और प्रदेश कि जनता खामोश देखती रह जाती है. विरोधी पार्टीयाँ भी केवल एक दो दिन थोडासा हंगामा करने के पश्चात वापस जैसे कि सो जाती है. 
आजकल के नेता कितने ढीठ और उद्दंड हो चुके हैं कि उन्हें किसी बात की कोई फ़िक्र नहीं है ; कानून  का कोई डर नहीं है. कहते हैं ना कि नंगे को किस बात की शर्म.  हमारे नेता तो इसके भी एक कदम आगे निकल चुके हैं . वे नंगे होकर सडकों पर उतरते हैं और लोगों  को यह कहते हैं कि अपनी आँखें बंद कर लो हम नंगे होकर निकल रहे हैं .
भारत का लोकतंत्र ऐसे नेताओं के हवाले रहा तो फिर इस देश का भगवान् ही मालिक है . करोड़ों रुपये खर्च कर के खुद के पुतले बनवाना हमारे देश की लोकतंत्र व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है. गंगा तथा यमुना जैसी महान नदीयाँ जिस प्रदेश में एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है उस प्रदेश की मुख्यमंत्री के ऐसे कृत्य गरीब लोगों की बेबसी के साथ लिया गया एक क्रूर मजाक है. उत्तर प्रदेश में रोजगार के अवसर ना के बराबर है तभी तो हर साल लाखों लोग देश के अन्य दूसरे राज्यों में जा जाकर रोजगार तलाश रहे हैं और मायावती अखबारों में करोडो रुपये खर्च कर के विज्ञापन देती है कि राज्य का चौमुखा विकास हो चुका है और जनता खुशहाल है . 
क्या यही भारत देश का भविष्य है ? क्या अब भारत इन भ्रष्ट और उद्दंड नेताओं का गुलाम हो चुका है ? क्या इस देश की जनता जो पहले अंग्रेजों की गुलाम थी और  अब इन नेताओं की  गुलामी हमेशा के लिए करती रहेगी ? इन सवालों का जवाब जनता को खुद तलाशना होगा और खुद ही कुछ करना होगा क्योंकि हम किसी भी राजनितिक दल से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस व्यवस्था में कोई सुधार ला पायेगा. 

मंगलवार, 16 मार्च 2010

दूर बहुत सवेरा है

रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है

टूट गए हैं ख्वाब सभी
उम्मीदों ने भी दामन छोड़ा है
कितना खुद पर आंसू बहाऊँ
जितना भी बहाऊँ वो थोडा है
जब भी कभी मैं आगे बढा हूँ
नाकामीयों ने रास्ता रोका है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है

मंजिलें सब ओझल हो गई
रास्ते भी कहीं खो गए
कभी  कभी लगता है अब तो
अपने ख्वाब भी पराये हो गए
नींद नहीं आती रातों में
फिर यादों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है

आंसुओं से जाम भर गए
फिर भी प्यास नहीं बुझी
खुद को बन लिया परवाना
पर हर शम्मा है बुझी बुझी 
बिन पिए ही कदम लडखडा गए
अब संभलना मुश्किल लगता है

किस तरह आगे बढूँ
आफतों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है 
और दूर बहुत सवेरा है


सोमवार, 15 मार्च 2010

गुढी पाढवा : भारत का राष्ट्रीय नव वर्ष 

गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि  अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत  एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि  हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे  भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है .




इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.


हाथ की ये लकीरें 

कहीं लेकर नहीं जाती है  हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत  नहीं संवारती  है  कभी हाथ की ये लकीरें

खुद ही खोज लो अपनी मंजिल  अगर पाना है
कभी राह  नहीं बतलाती है  हाथ की ये लकीरें

कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें

सपनों  को तोडती है  इरादों  को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें

ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें

ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद"  तुम्हें कर देगी  बरबाद हाथ की ये लकीरें