दूर बहुत सवेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
टूट गए हैं ख्वाब सभी
उम्मीदों ने भी दामन छोड़ा है
कितना खुद पर आंसू बहाऊँ
जितना भी बहाऊँ वो थोडा है
जब भी कभी मैं आगे बढा हूँ
नाकामीयों ने रास्ता रोका है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
मंजिलें सब ओझल हो गई
रास्ते भी कहीं खो गए
कभी कभी लगता है अब तो
अपने ख्वाब भी पराये हो गए
नींद नहीं आती रातों में
फिर यादों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
आंसुओं से जाम भर गए
फिर भी प्यास नहीं बुझी
खुद को बन लिया परवाना
पर हर शम्मा है बुझी बुझी
बिन पिए ही कदम लडखडा गए
अब संभलना मुश्किल लगता है
किस तरह आगे बढूँ
आफतों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
मंगलवार, 16 मार्च 2010
सोमवार, 15 मार्च 2010
गुढी पाढवा : भारत का राष्ट्रीय नव वर्ष
गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है .
इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.
गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है . इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.
हाथ की ये लकीरें
कहीं लेकर नहीं जाती है हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत नहीं संवारती है कभी हाथ की ये लकीरें
खुद ही खोज लो अपनी मंजिल अगर पाना है
कभी राह नहीं बतलाती है हाथ की ये लकीरें
कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें
सपनों को तोडती है इरादों को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें
ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें
ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद" तुम्हें कर देगी बरबाद हाथ की ये लकीरें
कहीं लेकर नहीं जाती है हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत नहीं संवारती है कभी हाथ की ये लकीरें
खुद ही खोज लो अपनी मंजिल अगर पाना है
कभी राह नहीं बतलाती है हाथ की ये लकीरें
कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें
सपनों को तोडती है इरादों को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें
ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें
ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद" तुम्हें कर देगी बरबाद हाथ की ये लकीरें
रविवार, 14 मार्च 2010
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाते आज के धारावाहिक
इन दिनों अनगिनत धारावाहिक अलग अलग चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं. इन धारावाहिकों में जिस तरह से हमारी संस्कृति का मखौल उड़ाया जा रहा है वो असहनीय है. सामजिक कुरीतियों को उजागर करना एक अच्छी बात है लेकिन उन कुरितेयों को बढा चढ़ा कर दिखाना कहाँ तक उचित है . दो दो माह तक एक ही घटना को दिखाना किसी की सहनशक्ति का इम्तिहान लेना है . कब कौनसे धारावाहिक की कहानी किधर मुड जाएगी यह शायद उस धारावाहिक का लेखक भी खुद नहीं जानता. बालिका वधु ; ना आना इस देस लाडो; बैरी पिया और ना जाने क्या क्या ? छह छह सात सात साल तक एक ही धारावाहिक को इस तरह से घसीटा जा रहा ही कि जैसे हमारे यहाँ अच्छी और स्वस्थ कहानीयों का अकाल पड़ गया हो. आजकल चल रहे धारावाहिकों में केवल सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों को बढा चढ़ा कर दर्शाया जा रहा है. कभी कभी ऊब सी हो जाती है. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे आजकल के धारावाहिक केवल पैसा कमाने के लिए बनाए जा रहे हैं और दर्शकों से कोई लेना देना नहीं है . फ़िल्मी ड्रामों से भी कहीं अधिक नाटकीयता आ गई है . एक ही परिवार के सदस्यों की आपस में बेहद गिरी हुई दुश्मनी बतलाना लेखकों और निर्माता - निर्देशकों के दिमागी दीवालियापन का सबूत है .भारतीय नारी का जिस तरह से चरित्र हनन किया जा रहा है वो बरदाश्त की हद से बाहर है . कब कौनसी औरत किस पुरुष की पत्नी बनने वाली है कोई नहीं बता सकता. कभी कभी तो कहने इतना भटक जाती है कि लेखक खुद ही अपने को भटका हुआ महसूस करने लग जाता है और आखिर में तंग आकर किसी पात्र को या तो बिना मतलब मार डालता है या उसकी याददाश्त को मिटा देता है .
बात बात पर सडकों पर उतरने वाले तमाम महिला संघटन कहाँ है ? महिला आयोग भी जैसे सो रहा है ? हर धारावाहिक में एक एक नारी का दो दो पुरुषों से सम्बन्ध बताना भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाना नहीं है तो और क्या है ? जिस देश में नारी को देवी मना जाता है उस देश में नारी का यह अपमान भारतीय नारी किस तरह से सहन कर रही है ये भी सोचने वाली बात है .
बात बात पर सडकों पर उतरने वाले तमाम महिला संघटन कहाँ है ? महिला आयोग भी जैसे सो रहा है ? हर धारावाहिक में एक एक नारी का दो दो पुरुषों से सम्बन्ध बताना भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाना नहीं है तो और क्या है ? जिस देश में नारी को देवी मना जाता है उस देश में नारी का यह अपमान भारतीय नारी किस तरह से सहन कर रही है ये भी सोचने वाली बात है .
क्या हमारे चैनलों के मालिक व्यवसाय को लेकर इतने गिर चुके हैं कि पैसे कमाने के लिए वो भारतीय संस्कृति को पूरी तरह से तोड़ मरोड़ कर दिखने पर आमादा है . विश्व हिन्दू परिषद् ; बजरंग दल , श्री राम सेने जैसे तथाकथित सांस्कृतिक संघटन जो कि वेलेनटायन डे मनाने पर पूरे देश में हाय तौबा मचाते हैं वो इस तरह के धारावाहिकों पर खामोश क्यों है ? एक तरफ ये संघटन खुद को भारतीय संस्कृति का ठेकेदार समझते हैं और खुद ही कहते हैं लेकिन इस चरित्र हनन पर इनकी चुप्पी हास्यास्पद है और संदेहजनक भी है. बात बात पर संस्कृति कि दुहाई देने वालों का दोमुंहापन उनकी भी असलियत दिखला रहा है .
इन धारावाहिकों का विरोध इसी इलेक्ट्रोनिक मीडिया से ही संभव है. लेकिन यहाँ भी निराशाजनक स्थिति है . तमाम न्यूज़ चैनल भी इन धारावाहिकों को बढा चढ़ा कर दिखलाते हैं. न्यूज चैनल को अगर बिना मेहनत मसाला मिल जाय तो और क्या चाहिए . बुद्धिजीवी संघटन ही कुछ करें तो करें वर्ना स्थिति बहुत चिंताजनक है. आने वाली पीढ़ी इससे क्या शिक्षा लेगी ये भी बहुत बड़ी चिंता का विषय है . हमारे साहित्य में अनगिनत अच्छी शिक्षाप्रद कहानियाँ और उपन्यास है लेकिन उन पर कोई धारावाहिक नहीं बनाता. सब टीवी पर चल रहा लापतागंज धारावाहिक हमारे उत्कृष्ट साहित्य का श्रेष्ठ उदहारण है .शरद जोशी के व्यंग निबंधों पर आधारित यह धारावाहिक सभी उम्र के दर्शकों द्वारा पसंद किया जा रहा है. अच्छे प्रयास हमेशा सफल होते है बशर्ते ईमानदारी से कोई प्रयास तो करे.
हम उम्मीद करते हैं की आने वाले वक्त में लापतागंज जैसे प्रयास और भी होंगे और हमारी संस्कृति का बेहूदा मखौल उदानेवालों को मुंह की खानी पड़ेगी.
हम उम्मीद करते हैं की आने वाले वक्त में लापतागंज जैसे प्रयास और भी होंगे और हमारी संस्कृति का बेहूदा मखौल उदानेवालों को मुंह की खानी पड़ेगी.
शनिवार, 6 मार्च 2010
जीवन कैसे बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
दिन बीते साल बीते और
बस यूहीं जमाना बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन में पाया बहुत कम पर
बहुत कुछ जैसे खो दिया
मंजिल नहीं मिली अब तक पर
हर रास्ता जैसे खो दिया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
दिन बीते साल बीते और
बस यूहीं जमाना बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन में पाया बहुत कम पर
बहुत कुछ जैसे खो दिया
मंजिल नहीं मिली अब तक पर
हर रास्ता जैसे खो दिया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
आनेवाला कल अच्छा होगा पर
इसी इंतज़ार में आज खो दिया
फिर कभी कहूँगा उसे दिल की बात
सोचते सोचते साथ उसी का छूट गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
अब कुछ ना बचा
अब कुछ ना रहा
अब केवल यादें बाकी है
सन्नाटे हैं चारों ओर
बीती बातें गूंजती है
जो चेहरे हमसे दूर हो गए
वो चेहरे याद आते हैं
बंद कर लो आंख्ने तो
ख़्वाबों में आ जाते है
दूर दूर फैला है एक शून्य
अब मन बहुत अकेला है
जितना जिसके करीब गया मैं
वो उतना ही दूर हो गया
कभी कभी लगता है जैसे
खुद पर से भरोसा उठ गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जैसा चाहा था मैंने पर
वैसा ना मेरा अतीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन कैसे बीत गया
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मैं तेरा हाथ ज़िन्दगी भर थामे खड़ा रहता
तेरे आँचल में सारी उम्र गुजार देता
तेरी आँखों में खुद को बसा लेता
तेरी जुल्फों में खुद को उलझा देता
तेरी मुस्कान पर मैं लुट जाता
तेरी बाहों में सारे गम भुला देता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
तुझे अपने से दूर ना जाने देता
तेरे सारे गम मैं अपना लेता
अपनी सारी खुशीयाँ तुझे दे देता
तेरी राहों में फूल बिछा देता
तुझे अपनी मंजिल बना लेता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मैं तेरा हाथ ज़िन्दगी भर थामे खड़ा रहता
तेरे आँचल में सारी उम्र गुजार देता
तेरी आँखों में खुद को बसा लेता
तेरी जुल्फों में खुद को उलझा देता
तेरी मुस्कान पर मैं लुट जाता
तेरी बाहों में सारे गम भुला देता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
तुझे अपने से दूर ना जाने देता
तेरे सारे गम मैं अपना लेता
अपनी सारी खुशीयाँ तुझे दे देता
तेरी राहों में फूल बिछा देता
तुझे अपनी मंजिल बना लेता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मंगलवार, 2 मार्च 2010
गाँव बहुत याद आएगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
जब भी ढलेगी शाम तो
गाँव बहुत याद आएगा
ना कोई साथ चलेगा
ना कोई अपना लगेगा
जब देंगे लोग धोखा तो
गाँव बहुत याद आयेगा
माना के शहर में
मेले हैं बहुत मगर; जब
खुद को पाओगे अकेला तो
गाँव बहुत याद आएगा
खुशीयों में रहेगा
हर कोई संग यहाँ मगर; जब
छाएंगे ग़मों के बादल तो
गाँव बहुत याद आयेगा
उगते सूरज को
पूजते हैं यहाँ मगर; जब
डूबेगा जब तुम्हारा सूरज तो
गाँव बहुत याद आयेगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
जब भी ढलेगी शाम तो
गाँव बहुत याद आएगा
ना कोई साथ चलेगा
ना कोई अपना लगेगा
जब देंगे लोग धोखा तो
गाँव बहुत याद आयेगा
माना के शहर में
मेले हैं बहुत मगर; जब
खुद को पाओगे अकेला तो
गाँव बहुत याद आएगा
खुशीयों में रहेगा
हर कोई संग यहाँ मगर; जब
छाएंगे ग़मों के बादल तो
गाँव बहुत याद आयेगा
उगते सूरज को
पूजते हैं यहाँ मगर; जब
डूबेगा जब तुम्हारा सूरज तो
गाँव बहुत याद आयेगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
सोमवार, 1 मार्च 2010
यादों की धूप
यादों की तेज धूप में उनकी जुल्फों के साये हैं
इन्ही जुल्फों के साये कई ज़माने बिताये हैं
जब भी बंद की है पलकें हमने उन्हें ही पाया है
आज भी इस कदर वो मेरे दिल में समाये हैं
जब भी उदास होकर हम छतों पर लेटे हैं
बादलों के बीच आकर वो हमेशा मुस्कुराए हैं
काली स्याह रातों में हम जब भी राह भटकाए हैं
उनकी रोशन यादों ने राहों के चिराग जलाये है
सावन के भीगे मौसम में जब जब भी बादल छाए हैं
"नाशाद" करके याद उन्हें हमने खूब आंसू बहाए हैं
यादों की तेज धूप में उनकी जुल्फों के साये हैं
इन्ही जुल्फों के साये कई ज़माने बिताये हैं
जब भी बंद की है पलकें हमने उन्हें ही पाया है
आज भी इस कदर वो मेरे दिल में समाये हैं
जब भी उदास होकर हम छतों पर लेटे हैं
बादलों के बीच आकर वो हमेशा मुस्कुराए हैं
काली स्याह रातों में हम जब भी राह भटकाए हैं
उनकी रोशन यादों ने राहों के चिराग जलाये है
सावन के भीगे मौसम में जब जब भी बादल छाए हैं
"नाशाद" करके याद उन्हें हमने खूब आंसू बहाए हैं
एक पल ठहर जाओ
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
तुम्हारी आँखों में झाँक तो लूं
अपनी किस्मत जान तो लूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
जिसे कभी तुमने लिया था बड़े प्यार से
मेरे उस नाम को फिर से सुन तो लूं
कभी थामा था मैंने जिसे जनम जनम के लिए
उस हाथ को एक पल के लिए थाम तो लूं
जिसे तुमने डाला था मेरे सिर पर बड़े प्यार से
उस आंचल में कुछ देर आंसू बहा तो लूं
दिल में बनाई थी मैंने जो तस्वीर तुम्हारी
उस तस्वीर को सदा के लिए मिटा तो लूं
जिनमे बांधा था तुमने मुझे हमेशा के लिए
उन बंधनों को मैं खुद खोल तो लूं
कभी जो तुमने लिखे थे मेरे लिए बड़े प्यार से
उन खतों को मैं आज तुम्हें लौटा तो दूं
कभी जो हमने किये थे जनम जनम साथ निभाने के
उन वादों से आज़ाद आज मैं तुम्हें कर तो दूं
जिसे रखा था अब तक सीने से लगाकर
तुम्हारे उस दिल को तुम्हे लौटा तो दूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
तुम्हारी आँखों में झाँक तो लूं
अपनी किस्मत जान तो लूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
जिसे कभी तुमने लिया था बड़े प्यार से
मेरे उस नाम को फिर से सुन तो लूं
कभी थामा था मैंने जिसे जनम जनम के लिए
उस हाथ को एक पल के लिए थाम तो लूं
जिसे तुमने डाला था मेरे सिर पर बड़े प्यार से
उस आंचल में कुछ देर आंसू बहा तो लूं
दिल में बनाई थी मैंने जो तस्वीर तुम्हारी
उस तस्वीर को सदा के लिए मिटा तो लूं
जिनमे बांधा था तुमने मुझे हमेशा के लिए
उन बंधनों को मैं खुद खोल तो लूं
कभी जो तुमने लिखे थे मेरे लिए बड़े प्यार से
उन खतों को मैं आज तुम्हें लौटा तो दूं
कभी जो हमने किये थे जनम जनम साथ निभाने के
उन वादों से आज़ाद आज मैं तुम्हें कर तो दूं
जिसे रखा था अब तक सीने से लगाकर
तुम्हारे उस दिल को तुम्हे लौटा तो दूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
तलाशती है आँखें
बीते हुए लम्हे; भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें
अपनों की भीड़ में अक्सर
खुद को तलाशती है आँखें
दुनिया भर के खराबों में
खुशीयाँ तलाशती है आँखें
तन्हाइयों और खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें
हर किसी के चेहरे में
तुम्हें तलाशती है आँखें
बंद पड़े उन दरीचों में
अपने तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलीयों में
यार तलाशती है आँखें
दम तोडती जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें
यारों की सूनी महफ़िलों में
"नाशाद" को तलाशती है आँखें
बीते हुए लम्हे; भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें
अपनों की भीड़ में अक्सर
खुद को तलाशती है आँखें
दुनिया भर के खराबों में
खुशीयाँ तलाशती है आँखें
तन्हाइयों और खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें
हर किसी के चेहरे में
तुम्हें तलाशती है आँखें
बंद पड़े उन दरीचों में
अपने तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलीयों में
यार तलाशती है आँखें
दम तोडती जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें
यारों की सूनी महफ़िलों में
"नाशाद" को तलाशती है आँखें
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
खुद
खुद की आँखों से आंसू बनकर; गिर चुका हूँ मैं
दूसरों की नज़रों से लोग गिराएंगे क्या मुझे
खुद को खुद ही के दिल से कब का निकाल चुका हूँ मैं
औरों के दिलों से लोग निकालेंगे क्या मुझे
खुद ही खुद को कब से सजा दे रहा हूँ मैं
औरों के ज़ुल्मों की सजा क्या देंगे लोग मुझे
खुद ही अपनी मंजिल से कब का भटक चूका हूँ मैं
गैर आकर अपनी राह से भटकायेंगे क्या मुझे
शीशा बनकर कब का टुकडे टुकड़े हो चुका हूँ मैं
झूठी दिलासा देकर लोग जोड़ेंगे क्या मुझे
किसी की याद बनकर तन्हाइयों में खो चुका हूँ मैं
मेरी यादों में बसकर लोग तड़पाएंगे क्या मुझे
खुद की आँखों से आंसू बनकर; गिर चुका हूँ मैं
दूसरों की नज़रों से लोग गिराएंगे क्या मुझे
खुद को खुद ही के दिल से कब का निकाल चुका हूँ मैं
औरों के दिलों से लोग निकालेंगे क्या मुझे
खुद ही खुद को कब से सजा दे रहा हूँ मैं
औरों के ज़ुल्मों की सजा क्या देंगे लोग मुझे
खुद ही अपनी मंजिल से कब का भटक चूका हूँ मैं
गैर आकर अपनी राह से भटकायेंगे क्या मुझे
शीशा बनकर कब का टुकडे टुकड़े हो चुका हूँ मैं
झूठी दिलासा देकर लोग जोड़ेंगे क्या मुझे
किसी की याद बनकर तन्हाइयों में खो चुका हूँ मैं
मेरी यादों में बसकर लोग तड़पाएंगे क्या मुझे
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
तेरा नाम मेरा नाम
कितना अच्छा लगता था उन दिनों
लोग जब लेते थे तेरा नाम मेरा नाम
दीवारों पर यूंही लिख देते थे उन दिनों
लोग जब एक साथ तेरा नाम मेरा नाम
दो दिलों को मिलता देख उन दिनों
लोग याद करते थे तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई गिनता था किसी की याद में तारे
लोग गिनाते थे सभी को तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई लिखता था ग़ज़ल किसी की याद में
लोग गुनगुनाते थे प्यार से तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई दीवाना घूमता था बेमतलब गलीयों में
लोग कहते थे एक दूजे से तेरा नाम मेरा नाम
वक़्त के साथ बदल गयी ज़माने की तस्वीर
साथ ही बिगड़ गयी हम दोनों की तकदीर
अब टूटता है किसी मुफलिस का दिल तो
लोग लेते हैं ख़ामोशी से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई तड़पता है किसी की याद में तो
लोग लेते हैं धीरे से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई सोचता है करने को मोहब्बत तो
लोग याद दिलाते हैं उसे तेरा नाम मेरा नाम

कितना अच्छा लगता था उन दिनों
लोग जब लेते थे तेरा नाम मेरा नाम
दीवारों पर यूंही लिख देते थे उन दिनों
लोग जब एक साथ तेरा नाम मेरा नाम
दो दिलों को मिलता देख उन दिनों
लोग याद करते थे तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई गिनता था किसी की याद में तारे
लोग गिनाते थे सभी को तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई लिखता था ग़ज़ल किसी की याद में
लोग गुनगुनाते थे प्यार से तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई दीवाना घूमता था बेमतलब गलीयों में
लोग कहते थे एक दूजे से तेरा नाम मेरा नाम
वक़्त के साथ बदल गयी ज़माने की तस्वीर
साथ ही बिगड़ गयी हम दोनों की तकदीर
अब टूटता है किसी मुफलिस का दिल तो
लोग लेते हैं ख़ामोशी से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई तड़पता है किसी की याद में तो
लोग लेते हैं धीरे से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई सोचता है करने को मोहब्बत तो
लोग याद दिलाते हैं उसे तेरा नाम मेरा नाम

एक बार पुन: अपनी दो पुरानी रचनाएँ आपके लिए पेश कर रहा हूँ. ये दोनों रचनाएँ मैंने १९८५ में ७ फरवरी के दिन लिखी थी. ७ फरवरी मेरा जन्मदिन भी होता है. सभी घरवालों की याद आ रही थी और दिल पुरानी यादों से भीग गया था. मैं कागज़ और कलम लेकर छत पर आ गया. कुछ सर्द हवाएं थी और आसमान में कुछ घहरे तो कुछ छितराए सफ़ेद बादल. बस इन दोनों रचनाओं का जन्म हो गया. उम्मीद है आपको पसंद आएगी.
तू
तू ही दूर तू ही करीब है
तेरा साथ कितना अजीब है
मेरी दोस्ती भी तुझी से हो
क्योंकि तू ही मेरा रकीब है
है दुआ तू मुझको नसीब हो
फिर अपना अपना नसीब है
=====================================================
फिर तेरी याद

फिर से आई तेरी याद है
ऐ खुदा फिर फ़रियाद है
सावन आया बादल छा गए
फिर से बरसी तेरी याद है
ना मिलोगे तुम तो क्या हुआ
संग मेरे जो अब तेरी याद है
इस जहाँ में सब मुझसे दूर है
सब कुछ मेरा बस तेरी याद है
चाहे ढूंढ ले अब तू सारा जहाँ
ना मिलेगा जैसा ये "नाशाद" है
तू
तू ही दूर तू ही करीब है
तेरा साथ कितना अजीब है
मेरी दोस्ती भी तुझी से हो
क्योंकि तू ही मेरा रकीब है
है दुआ तू मुझको नसीब हो
फिर अपना अपना नसीब है
=====================================================
फिर तेरी याद

फिर से आई तेरी याद है
ऐ खुदा फिर फ़रियाद है
सावन आया बादल छा गए
फिर से बरसी तेरी याद है
ना मिलोगे तुम तो क्या हुआ
संग मेरे जो अब तेरी याद है
इस जहाँ में सब मुझसे दूर है
सब कुछ मेरा बस तेरी याद है
चाहे ढूंढ ले अब तू सारा जहाँ
ना मिलेगा जैसा ये "नाशाद" है
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
और कुछ याद नहीं
तेरी गलीयाँ तेरी महफ़िल
बस और मुझे कुछ याद नहीं
एक बस तू एक बस मैं
बस और मुझे कुछ याद नहीं
चाहा तुझे और पूजा तुझे
अब जीवन मेरा बरबाद नहीं
चाहे तू मिले या ना मिले
अब खुदा से कोई फ़रियाद नहीं
हकीकत में नहीं तो ख़्वाबों में आ
वर्ना जिंदगी मेरी आबाद नहीं
चाहूं जिसे और मुझे मिल जाए
ना पूरी हुई मेरी कोई मुराद नहीं
जाकर मांग लूं खुदा से तुझे
हुई ऐसी कोई तरकीब ईजाद नहीं
तेरे इश्क में हम घरबार भुला दें
ऐसे भी हम "नाशाद" नहीं
तेरी गलीयाँ तेरी महफ़िल
बस और मुझे कुछ याद नहीं
एक बस तू एक बस मैं
बस और मुझे कुछ याद नहीं
चाहा तुझे और पूजा तुझे
अब जीवन मेरा बरबाद नहीं
चाहे तू मिले या ना मिले
अब खुदा से कोई फ़रियाद नहीं
हकीकत में नहीं तो ख़्वाबों में आ
वर्ना जिंदगी मेरी आबाद नहीं
चाहूं जिसे और मुझे मिल जाए
ना पूरी हुई मेरी कोई मुराद नहीं
जाकर मांग लूं खुदा से तुझे
हुई ऐसी कोई तरकीब ईजाद नहीं
तेरे इश्क में हम घरबार भुला दें
ऐसे भी हम "नाशाद" नहीं
ये कैसी मौहब्बत है
ये कैसी मौहब्बत है जहाँ इज़हार करना मना है
ये कैसी तन्हाइयां है जहाँ यादों का आना मना है
ये कैसी नींद है जिसमे यादों का आना मना है
ये कैसे ख्वाब है जिनमे किसी का आना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे ग़मों पर आंसू बहाना मना है
ये कैसा वक़्त है जहाँ हमें खुशीयाँ तलाशना मना है
ये कैसी बहारें है जिनमे गुलों का भी खिलना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे दो दिलों का मिलना मना है
ये कैसा सावन है जिनमे बादलों का बरसना मना है
ये कैसी महफ़िल है जिसमे "नाशाद" का आना मना है
ये कैसी मौहब्बत है जहाँ इज़हार करना मना है
ये कैसी तन्हाइयां है जहाँ यादों का आना मना है
ये कैसी नींद है जिसमे यादों का आना मना है
ये कैसे ख्वाब है जिनमे किसी का आना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे ग़मों पर आंसू बहाना मना है
ये कैसा वक़्त है जहाँ हमें खुशीयाँ तलाशना मना है
ये कैसी बहारें है जिनमे गुलों का भी खिलना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे दो दिलों का मिलना मना है
ये कैसा सावन है जिनमे बादलों का बरसना मना है
ये कैसी महफ़िल है जिसमे "नाशाद" का आना मना है
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
जानूं
मेरे लिए कौन हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मेरे लिए क्या हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
जैसे कोई पूरा हुआ ख्वाब हो तुम
खुदा ने सुन ली वो फरियाद हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
एक लडकी जानी पहचानी-सी हो तुम
जो अपनी ही लगी वो अनजानी हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मेरी हर आरज़ू हो तुम
मेरी हर खुशी हो तुम
मेरी हर धड़कन हो तुम
मेरी जीवन-प्राण हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
तुम ही हो मेरी जानूं
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
याद आता है
किसी की गलियों में गुज़ारा वो जमाना याद आता है
किसी खिड़की का खुलना और किसी का झांकना याद आता है
किसी के साथ वो बंधन अनजाना अब बहुत याद आता है
किसी का रोज वादा करना और ना निभाना याद आता है
किसी का मिलकर और बहाना बनाना बहुत याद आता है
किसी का दूर तलक मेरे साथ चलना बहुत याद आता है
किसी का हर बात पर हंसना और शरमाना याद आता है
किसी को याद करना और उसका सामने आना याद आता है
किसी का अलविदा कहना मुझे अब भी बहुत याद आता है
किसी का भूला हुआ चेहरा अब भी बहुत याद आता है
किसी का हर बात पर हंसना और शरमाना याद आता है
किसी को याद करना और उसका सामने आना याद आता है
किसी का अलविदा कहना मुझे अब भी बहुत याद आता है
किसी का भूला हुआ चेहरा अब भी बहुत याद आता है
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
मैं तुम्हारी याद हूँ
अभी भी तुम्हारी सांसों की महक
मेरे चारों ओर है
अभी भी तुम्हारी हंसी की आवाज़
मेरे जहाँ में समाई है
अभी भी तुम्हारी ना ख़त्म होनेवाली बातें
मेरे कानों में गूंजती है
अभी भी तुम्हारे दिल की धड़कन
मेरे दिल में धड़कती है
अभी भी तुम्हारे होने का अहसास
मेरी आँखों में बसा हुआ है
अभी भी मेरी छाया में
अक्स तुम्हारा छुपा हुआ है
अभी भी तुम्हरे लौट आने की आस
मेरी उम्मीद में जिंदा है
तुम्हारी साँसे लेता हूँ
तुम्हारी बातें बोलता हूँ
तुम्हारी हंसी हँसता हूँ
तुम्हारी याद में जिंदा हूँ
क्योंकि मैं तुम्हारी याद हूँ
मैं तुम्हारी याद हूँ
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