गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

हाँ यह घर मेरा है 
















हर एक कोना कुछ कहता है
छत पुरानी शामें याद कराती है
कमरे बा बाऊजी की आवाजें सुनाती है
सीढीयाँ पापा की पदचाप सुनाती है
यहाँ यादों का बसेरा है
जहाँ बीता बचपन मेरा है
हाँ यह घर मेरा है




जहाँ आंधीयां खुशबू लेकर आती है
सुबहें भोर राग सुनाती है
दोपहरें सन्नाटों में गुनगुनाती है
शामें अपनों की महफिलें सजाती है
रातें लोरीयाँ सुनाती है
यहाँ मेरे सभी पुरखों का बसेरा है
हाँ यह घर मेरा है


आरज़ू है हर शाम यहीं बीते
ज़िन्दगी की शाम भी यहीं ढले
हर जनम यहीं मिले
हम सभी  हर जनम में यहीं मिले

यहाँ मेरी रूह का बसेरा है

हाँ यह घर मेरा है
 हाँ यह घर मेरा है 




2 टिप्‍पणियां:

soniya ने कहा…

"haan yeh mera ghar hai" ne mere ghar aur bachpan ki yaad dila di,dhanyaad aapki yeh raschna ne mujhe mere ghar ki aehmiyat feel kara di

manju ने कहा…

Aapki es kavita ne bachpan ki yaade taza kar di,muje apna wo purana ghar yaad aa gaya jaha bachpan m khoob masti ke rang jamaye karte the,purani frnds ki yaad dila di...
Bahut hi aachi kavita h..