गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

धीरे धीरे

आ रहे हैं वो मेरे करीब
धीरे धीरे
बढ़ रही है धडकनें मेरी
धीरे धीरे

महकने लगी है हवाएं
धीरे धीरे
बरसने लगी है घटाएं
धीरे धीरे

वो भी समझेंगे मुझे
धीरे धीरे
इश्क का होगा असर
धीरे धीरे

अच्छा लगने लगूंगा उन्हें
धीरे धीरे
हो जायेंगे एक दिन वो मेरे
धीरे धीरे

6 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

Surya Vikramjeet ने कहा…

Wah bhaisahab wah. Kya baat hai!!!! Dekhiye aashiq kitni ummeed se kah raha hai --
achcha lagne lagunga unhe dhire dhire;
ho jayenge ek din wo mere dhire dhire.

bahut kam shabd lekin bahut hi goodh arth hai aapki in pankteyon me. Mujhe lagta hai ye aapki ab tak ki sarvashresth rachna hai bhaisahab. Dil se dua hai aap aisa hi likhte rahenge.

Neelam ने कहा…

Dheerey dheerey. kewal do shabf lekin kitni gharaai aa gayo hai poori rachna me. Aapki ek aur shaandaar aur dil ko choo lenewali rachna. Dhanywaad. hamari dher saari shubh-kamanayen Nareshji. Bas yoohin likhtey raheeye aur dher sara likhtey raheeye.

manju ने कहा…

dhire dhire,sabdh hi aisa h jo khud bahut takta rakhta h,

awadhesh pratap ने कहा…

आपके चाहने वालों की तादाद बढ़ने लगी है धीरे धीरे
आपकी रचनाओं का असर होने लगा है धीर धीरे
मगर ये भी बढ़ता जाएगा धीरे धीरे
सब पर आप छा जाओगे धीरे धीरे
सभी अच्छे लगाने लगोगे धीरे धीरे
हम भी शायद बन जाए आप जैसे धीर धीरे
लगता है आप मुस्कुरा रहे हो नरेशजी धीरे धीरे

सीधे शब्द लेकिन सीधे दिल में उतर गए हैं . वाह नरेशजी वाह

Gurminder Kaur ने कहा…

क्या बात है नाशादजी !!!!!!!!!!!!!
दारजी कह रहे हैं कि इतनी छोटे शेरों वाली ये बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल है. लाजवाब है. एक शब्द "धीरे" दो बार इस्तेमाल करते ही कितना सुहावना बन पडा है ना. भौत सोंणी है जी.

वो भी समझेंगे मुझे
धीरे धीरे
इश्क का होगा असर
धीरे धीरे