रविवार, 20 जून 2010

आज फादर्स डे है. आज हम यह फादर्स डे हमारे पापा के बिना पहली बार मना रहे हैं. हमारे पापा; हमारे जन्मदाता भले ही आज हमारे बीच में जिस्मानी तौर से मौजूद नहीं है लेकिन वो हममे; हमारे जिस्म में मौजूद हैं. उनकी रूह हममे समां चुकी है. हर सांस में हमें उनका एहसास होता है. हर धड़कन में उनकी मौजूदगी महसूस होती है. वे हमसे  कभी जुदा नहीं होंगे. जो दिल में बस जाता है / जो रूह में समां जाता है; वो कभी भी जुदा नहीं हो सकता. हमारी आँखें उनके ही ख्वाब देखती हैं. उनके लिए एक बहुत ही छोटा  सा प्रयास भर है ये कविता. जो मैं उनके चरणों में श्रद्धांजलि स्वरुप प्रस्तुत कर रहा हूँ.


मैं आपको नमन करता हूँ

ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ

भरकर आँखों में आंसू
मैं स्मरण आपको करता हूँ
सदा रहना हम में समाये
मैं आपसे निवेदन करता हूँ

अपनी सारी खुशीयाँ
अपनी सारी इच्छाएं
अपने सारे सपने
अपना शेष जीवन
मैं आपको अर्पण करता हूँ




हर जनम आपसे हम मिलें
हर जनम हमें आपसे मिलें
हर जनम हम यूहीं साथ रहें
हर जनम ये घर यूहीं आबाद रहे
हे परम पिता परमेश्वर
मैं तुमसे आज ये मांगता  हूँ

आपकी बतलाई राह पर चलेंगे
आपकी हर सीख याद रखेंगे
जो भी रह गए आपके ख्वाब अधूरे
उन्हें पूरा करने का
मैं आज प्रण करता हूँ
जो भी राह दिखलाई थी आपने
उसकी ओर मैं आज गमन करता हूँ

ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ

32 टिप्‍पणियां:

Rani Khanna ने कहा…

आपकी यह कविता अत्यंत ही भावपूर्ण है नरेशजी. आपके पापा अवश्य ही आपको हर जनम मिलेंगे. ये प्रार्थना मैं भी परमेश्वर से करती हूँ. आपकी यह रचना हर पिता के लिए उनके बच्चों का प्रेम दर्शाने वाली है.

Capt Jeetendra Nadkarni ने कहा…

मुझे आपके पापा की यह खबर नहीं थी. मेरी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजली. आपकी कविता की एक एक पंक्ति आपके अथाह प्रेम को साफ दिखा रही है. आपका सारा परिवार हर जनम में एक ही रहेगा. .

Upasana Bohra ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना. तस्वीर से ही गुण दिख रहे हैं पापाजी के. उनकी मुस्कान प्रेम की निशानी लग रही है.

Aradhana ने कहा…

आपने एक ऐसी रचना रची है जो हर बेटी या बेटा अपने पापा को सुनाना चाहेगा/ चाहेगी. पापा कभी भी अपने बच्चों को गलत राह नहीं बतला सकते, आप उनकी राह चल पड़े हो तो आपको सफलता और मंजिल ज़रूर मिलेगी.

Niharika Choudhry ने कहा…

ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ
पूर्णतया से सफल प्रयास है. यह कविता एक सच्ची श्रद्धांजलि है. आँखें भर आई पढ़ते पढ़ते.

Neelam ने कहा…

कोई शब्द नहीं मिल रहे. इसे पढ़कर सब कुछ याद आ जाता है. एक मार्गदर्शक के बिना जीवन कितना बदल जाता है नरेशजी.

Prem Kishan ने कहा…

लाजवाब है ये कविता. प्रेम और लगाव से ओतप्रोत. प्रभु आपके पापा को हर जनम आपके साथ ही रखेगा. ये मेरा अटल विश्वास है.

Gurminder Kaur ने कहा…

अब कुछ और दिमाग में नहीं आ रहा. बस इसे पढना और फिर आंसू रोकने में असफल होना. इस कविता का यह असर है. जितनी भी तारीफ करूँ कम ही रहेगी.

Shyam Manohar ने कहा…

एक एक शब्द प्रेम के मोतीयों को रिश्ते की डोर में गुंथा हुआ लग रहा है.सुन्दरता के साथ साथ अटूट प्रेम और एक कमी को दर्शाता हुआ एक सफल प्रयास

Sweety Singh ने कहा…

आज के दिन यह रचना और भी ज्यादा भावनाओं में बहा ले जाती है. आपको बहुत बहुत बधाई. आपके पापा को हम भी उतना ही याद करते हैं जितना कि आप. उनका चेहर देखिये कितना खुश नजर आ रहा है. बस आप उन्हीं से प्रेरणा लेकर ऐसे ही मुस्कुराते रहिएगा नरेशजी. हमें आपकी रचनाओं का बेसब्री से इंतज़ार रहता है.

Varsha Dogra ने कहा…

बड़ी सुन्दर और दिल से प्रेम को उजागर करती कविता.

Priyamwada Kanwar Sisodia ने कहा…

नरेश भाईसा. हम आपके दर्द को अच्छी तरह से समझ सकते हैं. आपकी कविता बहुत ही अच्छी है. बहुत सुन्दर शब्द और प्रस्तुति उतनी ही सुन्दर और भावपूर्ण.

Anandita Thakur Singh ने कहा…

अतिसुन्दर. दिल से लिखी गई रचना. एक ईमानदार और प्रयास. बहुत बधाई नरेशजी.

Kanchan Tiwari ने कहा…

पापा को मेरा भी सच्चे दिल से नमन और वंदन. आपकी कविता बेहद प्रशंसनीय है.

PRAN SHARMA ने कहा…

MARMSPRSHEE RACHNA KE LIYE MEREE
BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA.

Yadwinder Singh ने कहा…

आपकी कविता पढने के बाद मुझे यह अहसास हुआ कि भले ही हर दिन परिवार दिवस होना चाहिये, लेकिन एक दिन अलग से ऐसा हो जब हम किसी रिश्ते को विस्तार से समझें और समझाएं. आपकी यह कविता आपकी अब तक की सर्वश्रेस्थ है.

Teena Bhatt ने कहा…

आधी कविता पढने के बाद ही मैं रो पड़ी. एक बार बहुत खालीपन हो जाता है जब पापा का स्थान रिक्त हो जाता है. उनकी नसीहतें; मजाकें और समय समय पर चेतावानीयाँ हमें रह रहकर याद आती है और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर देती है. यह रचना दिल को छु गई.

Sadhanaa ने कहा…

हर बेटे / बेटी को यह कविता अपने पापा को सुनानी चाहिये. बेहद सुन्दर कविता है.

Guruinderjeet Singh ने कहा…

आपने यह कविता अपने पापा के लिए लिखी है. आपका अपने पापा के प्रति आदर और प्यार तथा कविता में शब्दों का चुनाव मुझे रोने को मजबूर कर गया. मुझे भी अपने बाबूजी याद आ गए. बरसों बीत चुके हैं उस घटना को लेकिन आपकी इस कविता ने वक्त का फासला जैसे कम कर दिया. आपकी कवितायें बहुत भावना से भरी हुई होती है.

Anupama ने कहा…

मैं साधना की बात से सहमत हूँ कि -- हर बेटे / बेटी को यह कविता अपने पापा को सुनानी चाहिये.

Purnima Sareen ने कहा…

तस्वीरें बताती है कि कितने जिन्दा दिल थे आपके पापा. आपकी कविता भी उतनी ही अच्छी और सुन्दर है. बहुत ही भरे दिल से शुभ-कामना.

Kanchan Tiwari ने कहा…

पिता एक ऐसा सहारा होते हैं जो हर समय अपने बच्चों को संभाले रखते हैं. आपके पिताजी की मुस्कान बहुत मासूम है.

Koel Kapoor ने कहा…

नरेशजी; बहुत दिनों के बाद आज आपका ब्लॉग देखा. इसके लिए सॉरी; लेकिन आज की कविता तो बहुत ही दिल को छु लेने वाली है.

Saeeda Warsi ने कहा…

बेहतरीन. किसी के भी दिल में उतर जायेगी ये रचना.

अजय कुमार झा ने कहा…

मैं शायद आज पहली बार ही आपके ब्लोग पर पहुंचा हूं यदि ये कहूं कि बस ठिठक कर रह गया । सुंदर कलेवर और सुंदर रचना बहुत ही खूब ।

Kusum Rani Jha ने कहा…

अपने जन्मदाता को नमन और वंदन आपने जिस कविता के माध्यम से किया है वो अतुलनीय है. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है. इस हिस्से को तो बार बार पढने को दिल करता रहा -
भरकर आँखों में आंसू
मैं स्मरण आपको करता हूँ
सदा रहना हम में समाये
मैं आपसे निवेदन करता हूँ

Vivek Singh ने कहा…

आपकी अन्य रचनाएँ भी मैंने पढ़ी है लेकिन इसे पढने के बाद मैं कुछ टिप्पणी लिखें के लिए मजबूर हो गया. आपने बहुत ही खूब कविता लिखी है. आंसू रोकने में मैं नाकाम रहा. सदा रहना हम में समाये मैं आपसे निवेदन करता हूँ. ये पंक्ति पढ़कर कोई ना रोये ये हो ही नहीं सकता.
मैं साधना की बात से सहमत हूँ कि -- हर बेटे / बेटी को यह कविता अपने पापा को सुनानी चाहिये.

Kamalkant ने कहा…

कल ही इसे पढ़ा लिया था लेकिन हिम्मत नहीं हुई कि कुछ टिप्पणी लिखूं. मेरे बाबूजी ( पापा ) भी करीब दो साल पहले हमें छोड़कर चाले गए हैं. मैं इस दर्द और कानी को बहुत करीब से महसूस कर सकताहूं भैया. ऐसा लगने लगता है जैसे सर से साया उठ गया हो. राह बतानेवाला रूठ गया हो.

Swastika Vyas ने कहा…

आपकी हर रचना सुन्दर होती है. रिश्तों और बंधनों को बहुत अच्छा समझाते हो अपनी रचनाओं में. ये तो सबसे अलग है. बहुत सुन्दर रचना.

Sadanand Raghav ने कहा…

अथाह प्रेम और दर्द लिए एक शानदार कविता. नरेशजी आपको बहुत बहुत बधाई. आपके पापा निश्चित ही स्वर्ग से देखकर आप पर गर्व कर रहे होंगे कि आपने उन्हें इस तरह से अपने दिल में बसा रखा है. आप ने हर बेटे और पिता के दिल को छुआ है. साधुवाद नरेशजी साधुवाद,

manjul ने कहा…

ओ हमारे जन्मदाता
मैं आपको नमन करता हूँ
शीश को अपने झुकाकर
मैं आपका वंदन करता हूँ
apne janam data ke liye kitni aachi lines h waise sabhi lines bahut aachi h dil ko chune wali..

नरेश चन्द्र बोहरा ने कहा…

मेरे इस छोटे से प्रयास को आपने सराहा इसके लिए मैं सभी का आभार मानता हूँ. मेरा ये मनाना है कि जहाँ माँ का प्यार विशाल बरगद की ठंडी छाँव है तो पिता का प्यार सुनहरी धुप है. हम ना तो धुप के बगैर और ना ही छाँव के बगैर जी सकते हैं. दोनों का एक सामान ही महत्व है. मत-पिता के प्यार और मार्गदर्शन के बिना इंसान अधुरा रहता है. परम पिता परमेश्वर हर बच्चे को माता-पिता का प्यार किस्मत में लिखे. बस यही एकमात्र प्रार्थना है.
आप सभी की लगातार आती टिप्पणीयों ने मेरा हौसला बहुत बढाया है