शनिवार, 18 जुलाई 2009


बचपन का गाँव

वो जो बचपन का गाँव जिसे हम कहीं दूर छोड़ आए

चलो आज फ़िर से उसी गाँव की तरफ़ चला जाए


वो जो पीपल जिसके साए में गुजरती थी हर दोपहर

चलो आज फ़िर उसी पीपल की छाँव में बैठा जाए

वो जो गाँव की गलियां जहाँ हम दौड़ा करते थे दिन भर

चलो फ़िर उन्ही गलियों में बेमतलब घूमा जाए

वो जो अमराइयाँ जिनमे हम चुराया करते थे आम हर रोज़

चलो आज फ़िर उन्ही अमराइयों की तरफ़ चला जाए

वो जो बचपन का साथी हर खेल में जिससे होता था झगडा

चलो आज चलकर उससे गले मिलकर रोया जाए


बहुत हो चुका बेदिल बदिन्तिजाम आज का शहर

चलो फ़िर लौटकर नाशाद अपने गाँव बसा जाए

1 टिप्पणी:

manju ने कहा…

Hello ji,
bachpan ki mithi yade jise hum kabhi nahi bhool sakte.bahut aachi kavita h.