रविवार, 14 मार्च 2010

मैं तो मीरा हो गई 

तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई

एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई

तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई

हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई

तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई



  

1 टिप्पणी:

awadhesh pratap ने कहा…

क्या बात है नरेशजी ! मीरा के चरित्र को आपने इतनी अच्छी तरह से समझा और फिर श्याम को उलाहना प्रीतम के माध्यम से. क्या कल्पना की है ! बहुत ही सुन्दर ! क्या प्रवाह है !!!!

हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई

यह हिस्सा तो इस रचना की जान है. कभी राधा पर भी लिखिएगा. मुझे पूरा विश्वास है आप के मन में राधाजी का भी ख़याल ज़रूर आया होगा. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.