शनिवार, 10 अप्रैल 2010

तेरी निशानीयाँ 

हर तरफ फ़ैली है तेरी ही निशानीयाँ
मेर प्यार की निशानीयाँ

वो ख़त जो पहले पहल
तुमने मुझे लिखे थे
वो तस्वीरें जो मैंने चुपके से
तुमसे चुरा ली थी
वो बातें जो अक्सर तुम
मुझसे करती रहती थी
वो खुशबू जो हमेशा
तुमसे पहले आ जाती थी
वो सुकून जो तुम्हारी
एक झलक से मिलता था
वो पहला एहसास जब तुमने
मेरे बालों को छुआ था
वो यादगार लम्हा जब तुमने
मेरा प्यार कुबूला था
वो तड़प जो तेरे जाने के बाद
मुझे महसूस होती थी
वो तेरे ख्वाब जो अक्सर
मुझे रातों में आते थे


हर तरफ फ़ैली है तेरी ही निशानीयाँ 
मेर प्यार की निशानीयाँ 

मेरे चारों ओर फ़ैली तेरी खुशबु 
हर तरफ गूंजती तेरी आवाज़ 
तुम्हारे क़दमों की मीठी आहट 
रह रहकर जैसे कह रही है 
तुम अभी अभी शायद गई हो 
नहीं ; नहीं 
रह रहकर यह कह रही है
तुम बस अभी आनेवाली हो
बस अभी आनेवाली हो  


2 टिप्‍पणियां:

Gurminder Kaur ने कहा…

आज पहली बार मैंने आपकी नज़्म पढ़ी. बहुत ही अच्छी लगी. मैं भी लिखती रहती हूँ. लेकिन खुद ही पढ़ती हूँ . आपकी शैली बहुत अच्छी लगी. ऐसा लगा जैसे कोई मेरे सामने बैठ कर खुद ही कह रहा हो. बड़ा चंगा लग्गा जी.

sikandar ने कहा…

वो खुशबू जो हमेशा
तुमसे पहले आ जाती थी

ये तो लखनवी तहजीब हुई कि माशूका को इतनी इज्जत बख्शी जा राही है. उसकी खुशबु से पहचान लेना . सलामत रहो नाशाद साहब क़यामत तक और क़यामत कभी ना आये.