बुधवार, 14 अप्रैल 2010

मुझ से मौहब्बत कर ले 

खुद को आज़ाद तू कशमकश-ए-जिंदगी से कर ले
भुला दे इस जहाँ को और मुझ से मौहब्बत कर ले

दूर बहुत है मंजिल और कठिन है बहुत रहगुज़र भी
मंजिल खुद ही मिल जायेगी तू मुझे हमसफ़र कर ले

काली लम्बी रातों में यादों के चिराग भी काम ना आयेंगे
जला ले मेरी मौहब्बत के चिराग रोशन अपनी राहें कर ले

भर दूंगा हर रंग जिंदगी का  तेरी महफिलें सज जायेंगी
खुद को बना  ले  तू  शम्मां और  मुझे तू परवाना कर ले

जो गुज़र गए हैं लम्हे "नाशाद" वो ना कभी लौट कर आयेंगे
ढूंढ मुझमे खुशनुमा लम्हा  खुद को ख़ुशी से तरबतर कर ले   

9 टिप्‍पणियां:

Randhir Singh Suman ने कहा…

मंजिल खुद ही मिल जायेगी तू मुझे हमसफ़र कर ले.nice

Unknown ने कहा…

जो गुज़र गए हैं लम्हे "नाशाद" वो ना कभी लौट कर आयेंगे
ढूंढ मुझमे खुशनुमा लम्हा खुद को ख़ुशी से तरबतर कर ले
जिंदगी की हकीकत यही है. या तो इंसान खुद को बदल दे या फिर कोई ऐसा साथी तलाशे जो उसे बदल दे. बहुत गहरी बात कही है. कोई अपनी जिंदगी की जंग जब हार जाता है तो उसे इसी तरह से तैयार किया जाना चाहिये. जिंदगी को समझना तो कोई आप से सीखे नाशाद साहब. मैं आपसे उम्र में करीब पन्दरह साल बड़ा हूँ लेकिन आपसे सीखना शुरू कर दिया है. मैं दिल से कह रहा हूँ आप बहुत नाम कमाओगे. आप एक बेहतरीन इंसान है जिसका दिल मानसरोवर जितना पाक है.खुदा आपको महफूज रखे.

Unknown ने कहा…

बहुत खूबसूरत और एकदम ताजगी का अहसास दिलाने वाली. धन्यवाद ऐसी रचना के लिए.

अनाम ने कहा…

बहुत ही जानदार ग़ज़ल है. एक एक शेर असरदार है भैय्या. बहुत शुभकामनाएं . कमलकांत सहाय

PRAN SHARMA ने कहा…

SUNDAR AUR SAHAJ BHAVABHIVYAKTI
KE LIYE MEREE BADHAAEE SWEEKAR
KIJIYE.

Unknown ने कहा…

क्या खूब लिखी है. बहुत अच्छी लगी जी. किसी को भी प्रेरित कर सकती है. हारे हुए के लिए एक जोशीली ग़ज़ल.

Unknown ने कहा…

खुद को बना ले तू शम्मां और मुझे तू परवाना कर ले

जो गुज़र गए हैं लम्हे "नाशाद" वो ना कभी लौट कर आयेंगे
ढूंढ मुझमे खुशनुमा लम्हा खुद को ख़ुशी से तरबतर कर ले

इन तीन लाइनों ने पूरी ग़ज़ल में जान डाल दी है. क्या महफ़िल जमी है !

V Singh ने कहा…

काली लम्बी रातों में यादों के चिराग भी काम ना आयेंगे
जला ले मेरी मौहब्बत के चिराग रोशन अपनी राहें कर ले
एक बहुत ही प्रेरणादायक ग़ज़ल. सब कुछ भुलाकर मौहब्बत करो और जिंदगी को जीना सीखो. शुभकामनाएं

Unknown ने कहा…

दूर बहुत है मंजिल और कठिन है बहुत रहगुज़र भी
मंजिल खुद ही मिल जायेगी तू मुझे हमसफ़र कर ले
ऐसा हमसफ़र मिल जाना बहुत मुश्किल है. कदम कदम पर धोखे हैं नरेशजी. सच्चा हमसफ़र मिलना किस्मतवालों की ही नसीब में होता है. आपने लेकिन बहुत सुन्दर लिखा है नरेशजी.