मंगलवार, 25 मई 2010

यह रचना भी मेरे दिल के बहुत करीब है. इसका कारण एक सच्ची घटना है. घटना करीब चार साल पुरानी है. मैं गर्मी की छुट्टीयों में जोधपुर गाया हुआ था. उन दिनों ही इस रचना की पहली पंक्ति का जन्म हुआ था. यह रचना बहुत ही अजीब हालात में मैंने लिखी थी. मेरा कॉलेज के ज़माने का मित्र करीब बीस साल बाद मुझसे मिला. हम दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि जब दो दोस्त इतने लम्बे अरसे के बाद मिल रहे हो तो कैसा माहौल हो जाता है. अपनी पुरानी बातों को याद किया. फिर जब मैंने उससे यह पुछा कि घर में सब कैसे हैं तो उसका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया. उसने कहा कि वो अकेला ही है और शादी नहीं हुई है. बहुत कुरेदने के बाद उसने सारी बात बताई. उसने बताया कि उसकी पहचान एक लड़की से हुई थी. दोनों अक्सर आमने सामने आ जाते. यह सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा. उस लड़की के चेहरे से ऐसा लगने लगा था जैसे वो उसे कुछ कहना चाहती है लेकिन मेरे इस दोस्त को उसका चेहरा पढना नहीं आया. मेरे मित्र की जयपुर में नौकरी लग गई और वो वहां चला गया  करीब दो साल बाद जब वो वापस लौटा तो उसकी ममेरी बहन से यह पता चला कि वो लड़की उससे प्यार करती थी और इजहार करना चाहती थी लेकिन मेरे  मित्र की बेरुखी या नासमझी से वो यह सब कह नहीं पाई. उस लड़की  ने अपने घरवालों से यह बात बताई लेकिन लड़का दूसरी जाति का होने कि वजह से यह रिश्ता नामंजूर कर दिया गया. उस लड़की की शादी उसकी मर्जी के खिलाफ कहीं और कर दी गई. उस लड़की ने यह सारी बात मेरे मित्र की ममेरी बहन को शादी के बाद बताई. मेरे मित्र की ममेरी बहन  का ससुराल भी उदयपुर   था  जहाँ उस लड़की की शादी हुई थी. जब मेरे मित्र को यह सारी बात पता चली तो उसे जबरदस्त धक्का लगा. वो कई दिन तक गुमसुम रहा और उसे अपनी नासमझी पर बहुत गुस्सा भी आया वो बहुत पछताया  लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकता था. उसे खुद भी यह अंदाजा नहीं था कि इस घटना का सदमा उसे ऐसे हालात की तरफ ले जाएगा कि उसे शादी के नाम से ही नफ़रत हो जायेगी. इसी के चलते उसने आज तक शादी नहीं की है और वो आज भी अकेला जयपुर में ही रह रहा है. मैं उस रात सारे वक्त जगाता रहा और उसके बारे में ही सोचता रहा. उस वक्त मेरे दिल में केवल एक ही पंक्ति आई कि "काश वो समझ पाता"  धीरे धीरे समय गुजरता गया. कुछ दिन पहले मुझे एक बार फिर उस मित्र के साथ घटी वो घटना याद आई और साथ ही वो पंक्ति भी. बस उसी वक्त इस रचना का जन्म हो गया.























काश कभी मैं समझ पाता 

तुम्हारी आँखों में उठते सवालों को 
हमारे दिल में उठती हुई  लहरों को
काश कभी मैं समझ पाता

उदास होती हुई उन शामों को
लम्बी होती हुई उन रातों को
काश कभी मैं समझ पाता

अधूरी लगती हर मुलाकातों को
होठों पर रूकती हुई उन बातों को
काश कभी मैं समझ पाता

हमारे दिल में बढती हुई उस घबराहट  को
मुलाकातों के लिए बढती हुई चाहतों को
काश कभी मैं समझ पाता

तुम्हारी आँखों में बरसते सावन को
हर चेहरे  में  तुम्हारी  तलाश  को
काश कभी मैं समझ पाता

हर बात में तुम्हारे उस रूठ जाने को
मेरे मनाते  ही तुम्हारे मान जाने को
काश कभी मैं समझ पाता

तुम्हारी किताबों में लिखे मेरे नामों को
तुम तक ना पहुंचे मेरे उन पयामों को
काश कभी मैं समझ पाता

हमारी मुलाकातों पर उठती उंगलीयों को
मुझ पर हंसती तुम्हारी उन सहेलीयों को
काश कभी मैं समझ पाता

तुम्हारी गलियों की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को
सुनते ही हमारा नाम तुम्हारा शरमाने को
काश कभी मैं समझ पाता

अलसाई हुई उन दोपहरों को
जलती हुई बरसात की बूंदों को
काश कभी मैं समझ पाता

अंतिम मिलन पर हमारी आँखों के सावन को
जो हम ना कह सके उन सभी बातों को
काश कभी मैं समझ पाता
काश कभी मैं समझ पाता

18 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

waah lajawaab rachna aur roomaani chitra sanyojan

Rani Khanna ने कहा…

ग़ज़ल भी सुन्दर है और साथ के चित्र भी. आपने अपने मित्र की मन:स्थिति को जिस तरह से महसूस किया वो बहुत ही लाजवाब है. आपकी रचनाएं दिल के करीब लगने लगी है अब. बहुत सारी बधाईयाँ

तुम्हारी किताबों में लिखे मेरे नामों को
तुम तक ना पहुंचे मेरे उन पयामों को
काश कभी मैं समझ पाता

Kamalkant ने कहा…

होठों पर रूकती हुई बातों को --- वाह भैय्या. कितना जबरदस्त लिखा है!!!! मौहब्बत को बहुत करीब से महसूस किया जा सकता है आपकी इस ग़ज़ल में.

Priyamwada Kanwar Sisodia ने कहा…

ग़ज़ल अत्यंत ही सुन्दर. हर पंक्ति खुद बोलती है.इस तरह से किसी का दिल न टूटे कभी. भाईसा; क्या आपकी नहीं लगा आपका दोस्त कमजोर निकला. इस तरह से जिन्दगी को नहीं जिया करते .

Gurminder Kaur ने कहा…

एक एक सांस में दर्द जैसे भर आया. कितना दर्द और पछतावा है इसमें --
हम ना कह सके उन सभी बातों को
काश कभी मैं समझ

Aradhana ने कहा…

हर एक शेर में महबूब ने जो अफसोस दिखाया है वो समझने के लायक है. अब तो हर कोई ये समझ जाये कि मौहब्बत कब होती है.

Prem Kishan ने कहा…

एक बहुत ही दुखदायी घटना लेकिन इस घटना ने एक बहुत ही संवेदनशील ग़ज़ल को जनम दे दिया. नरेशजी; दाद देनी होगी आपकी सोच की. आपने बेहद अच्छी ग़ज़ल लिख दी है.

Sweety Singh ने कहा…

Nareshji; Your friend was wrong. Acording to me he himself is responsible for this situation. But I like the gazal. Bahut khoobsoorat hai.
Below lines represent the true Indian culture -
हमारी मुलाकातों पर उठती उंगलीयों को
मुझ पर हंसती तुम्हारी उन सहेलीयों को
काश कभी मैं समझ पाता

Purnima Sareen ने कहा…

यह सही है कि ऐसी घटना जिंदगी की दिशा बदल देती है लेकिन कोई इस तरह से अपनी जिंदगी को बरबाद कर ले;बहुत बुरा लगता है. नरेशजी; क्या आप अपने दोस्त के इस निर्णय से इत्तफाक रखते हो? आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा. ग़ज़ल तो आपने गज़ब की लिखी है. अपने आप में एक कहानी कहनेवाली ग़ज़ल.

Anupama ने कहा…

आपकी ग़ज़ल नि:संदेह बहुत ही कामयाब ग़ज़ल है; लेकिन आपके दोस्त ने ऐसा क्यूँ किया? मेरी समझ से बाहर है. जब वो एक लड़की ना मन पढने में नाकाम रहा तो उसे ऐसा नहीं करना चाहिये था. अगर उस लडकी को यह पाता चल जाय कि आपका दोस्त अभी तक कुंवारा है तो उस लडकी पर क्या बीतेगी? आप क्या सोचते हो आपके दोस्त के फैसले पर?

Sadhanaa ने कहा…

ग़ज़ल में इतना दर्द है कि कुछ लिखने की ताकत ही नहीं बची

Sooraj Bagrodiya ने कहा…

क्या लिखा है आपने! आपने किसी दूसरे के टूटे हुए दिल के बारे में इतना सोच कि आपकी कलम में भी उसके जैसा ही दर्द पैदा हो गया. मेरी बहुत ही दिल से निकल रही शुभ-कामनाएं.

Varsha Dogra ने कहा…

इस ग़ज़ल का हर एक लफ्ज जैसे आंसुओं में डूबा हुआ लग रहा है. खुदा किसी को किसी से जुदा ना करे.

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

अंतिम मिलन पर हमारी आँखों के सावन कोजो हम ना कह सके उन सभी बातों कोकाश कभी मैं समझ पाताकाश कभी मैं समझ पाता

ग़ज़ल भी सुन्दर है और साथ के चित्र भी
वाह ! प्यार और असमंजस का अच्छा संजोग किया है आपने ....अच्छा लिखते हो यार ...लिखते रहो ... मेरी शुभकामनाये आपके साथ है
http://athaah.blogspot.com/

Anandita Thakur Singh ने कहा…

नाशाद साहब, आदाब. आपके ब्लॉग की लगभग सारी पोस्ट्स पढ़ डाली एक ही सांस में. बहुत ही अच्छा लगा. आपकी दर्दीली भाषा और अभिव्यक्ति बहुत ही जबरदस्त है. मुझे कहीं कोई कमी नजर नहीं आई. आपका अपनी जन्मभूमि के प्रति लगाव मुझे मोहित और प्रभावित कर गया. मुझे भी अपना बचपन, गाँव और तमाम रिश्तेदार याद आ गए. आपको बहुत शुभ-कामनाएं.

Kusum Rani Jha ने कहा…

आपकी शायद ये सब से ज्यादा दर्द में डूबी हुई ग़ज़ल है. पछतावे की सभी हदों को पार करती हुई और अपनी महबूबा से मिलन न होने के गम को दर्शाती हुई ग़ज़ल. लेकिन नरेशजी; आपके दोस्त ने ऐसा क्यूँ किया? वो थोड़े वक्त में सामान्य होकर अपनी जिंदगी फिर से शुरू कर सकता था किसी नए जीवन साथी के साथ. आपकी खुद की क्या राय है इस बारे में? औरों ने भी यह सवाल पुचा है. आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा नरेशजी.

नरेश चन्द्र बोहरा ने कहा…

आप सब की तरह मैं भी यही मानता हूँ कि मेरा मित्र गलत था. वो अपनी जिन्दगी को नई राह से आरम्भ कर सकता था. उसने उसके लिए अपने आप को बरबाद कर डाला जिसे उसने कभी वास्तविकता में चाहा ही नहीं. ये बात और है कि उस लड़की ने उसे चाहा था ;लेकिन आज वो भी तो सब कुछ भुलाकर अपनी नई दुनिया में सुखी ही होगी. मेरे मित्र का यह निर्णय मेरी समझ से परे है लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि उसके दिल पर शायद बहुत गहरा असर कर गया ये खुलासा और वो कमजोर हो गया होगा. अंतिम सच यह है कि दो मासूम दिल जिन्होंने इक दूजे को चाहा था मिल ना सके. काश दोनों समझ पाते तो यूँ रास्ते जुदा ना हो पाते.

manju ने कहा…

aapke dost ko wo sasb bhula kar aage badh jana tha ............
bahut aachi rachna h dil se mahsoos ho jaisi..