शुक्रवार, 28 मई 2010


















तलाशती है आँखें

बीते लम्हे भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें

अपनों की भीड़ में अक्सर
ख़ुद को तलाशती है ऑंखें
दुनिया भर के वीरानों में
खुशीयाँ तलाशती है आँखें

तन्हाईयों खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें

हर बेगाने चेहरे में
अपनों को तलाशती है आँखें

बंद पड़े उस दरीचे में
किसी  को तलाशती है आँखें

सूनी हो चुकी गलियों में
बिछुडे यार तलाशती है आँखें


हैवानों की इस दुनिया में
इंसान तलाशती है ऑंखें

दम तोड़ती हुई जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें

टूटते हुए सभी रिश्तों में
करीबीयाँ तलाशती है आँखें

शाम ए ग़ज़ल है यारों
नाशाद को तलाशती है आँखें


8 टिप्‍पणियां:

राजेन्द्र मीणा ने कहा…

बहुत खूब ..जीवन भी तो एक तलाश ही है

Rani Khanna ने कहा…

अपनों की भीड़ में अक्सर खुद को तलाशती है आँखें.
नरेशजी; ये हकीकत है आज हम खुद भी नहीं पहचान पाते हैं. बहुत शानदार. आपके लिए दुआएं करती रहूंगी कि आप ऐसी ही अच्छी गज़लें लिखते रहे लिखते रहे.

Aradhana ने कहा…

बहुत ही सुन्दर. दम तोडती ज़िन्दगी में साँसें तलाशती है आँखें. अब क्या तरफ करूँ हर बार. हर रचना जानदार होती है.

Priyamwada Kanwar Sisodia ने कहा…

ढेर सारी बधाईयाँ. एक एक पंक्ति के लिए शुभ-कामनाएं. इतनी खुबसूरत है कि ... बस पढ़ते रहो.

Ajoy Chakroborty ने कहा…

Aapki gazal bahut sundar hai. Zindgee ki aaj kya ahameeyat rah gaye hai; ye aapne bahut sateek likha hai.

Anandita Thakur Singh ने कहा…

अत्यंत सुन्दर. जीवन अब ऐसा ही रह गया है. बस तलाशते रहो और ....

Guruinderjeet SIngh ने कहा…

वाह नरेशजी वाह. दिल भारी हो गया. क्या खूब कहा है आपने "तलाशती है ऑंखें" .

बंद पड़े उस दरीचे में किसी को तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलियों में बिछुडे यार तलाशती है आँखें

Upasana Bohra ने कहा…

जय श्री कृष्ण भाईसाहब. आपने तो जोधपुर की तस्वीरें लगाकर मुझे रुला दिया. आपकी ग़ज़लें तो बहुत ही शानदार है लेकिन साथ लगी तस्वीरें उससे भी जोरदार. मैं भी जोधपुर से ही हूँ. आपकी तरह मुझे भी अपने शहर से बहुत प्यार और लगाव है.