ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में उडती जा रही हूँ मैं
सपनों में खोती जा रही हूँ मैं
एक कदम यहाँ तो
एक कदम वहां जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दिल में उठ रही ये कैसी उमंग है
बदन में दौड़ रही ये कैसी तरंग है
मेरे हाथों से आँचल क्यूँ
आज फिसल फिसल जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दूर कहीं दूर जाने को जी चाहता है
सब कुछ भुलाने को जी चाहता है
ना जाने क्यूँ मेरा दिल
संभले फिर बहक बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में ना जाने ये कैसी महक है
नजारों में ना जाने ये कैसी चमक है
यूँ ना मुस्कुराओ तुम
कदम ना कहीं बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
इन राहों में ना अकेली छोड़ जाना
दूर बहुत दूर अब हमसे है ज़माना
ना जाने क्यूँ मेरा दिल आज
रह रह कर घबराये
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
बचपन कहीं खो ना जाये
किताबों के भारी बोझ तले
किताबों के भारी बोझ तले
ऊंचे ख्वाबों के दबाव तले
ये मासूम कहीं दब ना जाये
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
तुम्हें अव्वल ही आना है
नहीं किसी से पीछे रहना है
हर माँ-बाप का यही कहना है
माँ-बापों की इन इच्छाओं से
ये मासूम कहीं सहम ना जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
सबसे ऊंचा हो ओहदा तुम्हारा
सामान्य जीवन नहीं पालकों को गंवारा
ढेर सा पैसा मोटर गाडी और एक बंगला न्यारा
चाहतों की इस ऊंची दौड़ में
ये मासूम कहीं जीना ना भूल जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
खिलौने कम होते जा रहे
मैदानी खेल लुप्त होते जा रहे
मैदान घरों में बदलते जा रहे
किस्से कहानियों से बढ़ती दूरी से
ये बचपन से कहीं दूर ना हो जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाये
आओ हम इनका बचपन बचाएं
इनके चेहरे की मुस्कान लौटाएं
इनके चेहरे की मासूमियत लौटाएं
हम ही इनके दोस्त बन जाए
संग इनके साबुन के बुलबुले उड़ायें
आसमानों में ऊंची पतंगे उड़ायें
संग इनके खेलें हम भी बचपन में लौट जाएँ
इनको फिर से जीना सीखाएं
इनको फिर से इनका बचपन लौटाएं
इनको फिर से इनका बचपन लौटाएं
इनका बचपन कहीं खो ना जाएँ
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
रविवार, 4 अप्रैल 2010
हमसाया
तुम्हारी आँखों में अपना मुकद्दर देखा है मैंने
तेरे चेहरे में जैसे कोई अपना ही देखा है मैंने
मंजिल को अक्सर बहुर दूर देखा है मैंने
साथ तेरे चल कर उसे करीब पाया है मैंने
जब भी सामने आये हो तो अक्सर ये सोचा है मैंने
जागती आँखों से जैसे कोई ख्वाब सा देखा है मैंने
गम-ए-दौरां में खुद को तनहा पाया हो मैंने
साथ तेरा पाकर ज़माना साथ पाया है मैंने
अक्सर खुद से जुदा सा अपना साया पाया है मैंने
साथ जब से हुए हो तुम में ही हमसाया पाया है मैंने
तुम्हारी आँखों में अपना मुकद्दर देखा है मैंने
तेरे चेहरे में जैसे कोई अपना ही देखा है मैंने
मंजिल को अक्सर बहुर दूर देखा है मैंने
साथ तेरे चल कर उसे करीब पाया है मैंने
जब भी सामने आये हो तो अक्सर ये सोचा है मैंने
जागती आँखों से जैसे कोई ख्वाब सा देखा है मैंने
गम-ए-दौरां में खुद को तनहा पाया हो मैंने
साथ तेरा पाकर ज़माना साथ पाया है मैंने
अक्सर खुद से जुदा सा अपना साया पाया है मैंने
साथ जब से हुए हो तुम में ही हमसाया पाया है मैंने
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
हिज्र के दिन
जिनकी तस्वीर थी निगाहों में
उन्हें देखा सिर्फ हमने ख़्वाबों में
ना मिलूँगा अब मैं तुझे खजानों में
गर चाहता है तो ढूंढ खराबों में
ना जंगल में मिले ना ही बागों में
वे सूखे फूल जो रखे थे किताबों में
दरिया में रहकर भी हम रहे प्यासे
अब ढूंढते हैं हम आब सराबों में
शबो- रोजो- माहो-साल इसके आगे क्या गिनुं
तेरे हिज्र के दिनों की गिनती नहीं हिसाबों में
तुझसे मिलूं या बिछुड़ जाऊं हमेशा के लिए
गुज़र गई जिंदगी "नाशाद" इसी दोराहे में
जिनकी तस्वीर थी निगाहों में
उन्हें देखा सिर्फ हमने ख़्वाबों में
ना मिलूँगा अब मैं तुझे खजानों में
गर चाहता है तो ढूंढ खराबों में
ना जंगल में मिले ना ही बागों में
वे सूखे फूल जो रखे थे किताबों में
दरिया में रहकर भी हम रहे प्यासे
अब ढूंढते हैं हम आब सराबों में
शबो- रोजो- माहो-साल इसके आगे क्या गिनुं
तेरे हिज्र के दिनों की गिनती नहीं हिसाबों में
तुझसे मिलूं या बिछुड़ जाऊं हमेशा के लिए
गुज़र गई जिंदगी "नाशाद" इसी दोराहे में
खुदा को भी ले आऊँ
जिंदगी का ये गीत मैं यूहीं गाता चला जाऊं
हर किसी को मैं बस खुश रखता चला जाऊं
गर पड़े कभी पीना किसी दिन कोई ज़हर
बन के नीलकंठ मैं वो ज़हर भी पी जाऊं
गर मिले सभी को कोई भी तरह की सज़ा
बन के राम मैं हँसते हुए वनवास चला जाऊं
गर बरसे कोई आफत सब पर आसमानों से
बन के कृष्ण मैं अपने ऊपर गोवर्धन उठा जाऊं
ना आने दूं कोई भी ग़म मेरे अपनों की तरफ
हर ग़म को हँसते हुए गले लगाता चला जाऊं
गर दे दे खुदा मुझे किसी दिन अपनी जादूगरी
जो भी बिछुड़े हैं हमसे मैं उन्हें फिर लौटा लाऊँ
बाँध लूं मैं खुद को रिश्तों की ऐसी जंजीरों में
गर बुलाए खुदा भी तो मैं उसके पास ना जाऊं
सब को रख लूं एक बनाकर ज़हान को बना दूं मैं ज़न्नत
फिर एक दिन "नाशाद" जाकर खुदा को भी यहाँ ले आऊँ
दूर पिया का गाँव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
सावन की ऋतू जब जब है आई
डसी है दिल को और भी तन्हाई
पिया क्या कभी मेरी याद ना आई
आने में फिर काहे इतनी देर लगाईं
ठहर सा गया जैसे मन का बहाव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
जब से गए है मेरे पिया परदेस
ना कोई चिट्ठी ना कोई सन्देश
कुछ तो खबर दो कब आओगे
इस बिरहन को कितना तड़पाओगे
जीवन में जैसे आ गया कोई ठहराव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
क्या युहीं गुज़रेगी अब सारी उमरिया
ना दिन होंगे सुहाने और ना ही रतियाँ
ताना मारती है अब तो सारी सखियाँ
दिल का गया करार और आँखों से निंदिया
आ जाओ पिया जीवन में बढ़ रहा उलझाव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
सावन की ऋतू जब जब है आई
डसी है दिल को और भी तन्हाई
पिया क्या कभी मेरी याद ना आई
आने में फिर काहे इतनी देर लगाईं
ठहर सा गया जैसे मन का बहाव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
जब से गए है मेरे पिया परदेस
ना कोई चिट्ठी ना कोई सन्देश
कुछ तो खबर दो कब आओगे
इस बिरहन को कितना तड़पाओगे
जीवन में जैसे आ गया कोई ठहराव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
क्या युहीं गुज़रेगी अब सारी उमरिया
ना दिन होंगे सुहाने और ना ही रतियाँ
ताना मारती है अब तो सारी सखियाँ
दिल का गया करार और आँखों से निंदिया
आ जाओ पिया जीवन में बढ़ रहा उलझाव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम थी तो सब रौनक थी
ये दुनिया जैसे कोई जन्नत थी
तुम बिन अब कुछ रास ना आए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम्हारी एक मुस्कान से जैसे
सारा जहाँ खिल उठता था
तुम्हारी आँखों की चमक से जैसे
मेरी राहें रोशन रहती थी
मंजिल लगने लगी है अब दूर
तुम बिन एक कदम भी ना चला जाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
हवाएं तुम्हारे इशारे पर बहती थी
कलियाँ तुम्हें देख खिलती थी
कोयल तुम्हारे संग गाती थी
तुम क्या गई गुलशन से जैसे
बहारे भी अब रूठ गई
तुम नहीं तो जीवन में मेरे
अब कौन बहारें लाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
फागुन अब फिर से आने को है
बौछारें अब रंगों की फिर उड़ने को है
हर प्रीतम के गालों पर
लाल हरा कोई रंग लगाएगा
लेकिन फागुन के दिन साथी
अब मेरा मन बहुत तरसेगा
तुम बिन कौन अब मेरी दुनिया में
फिर से रंग भरे और बरसाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम थी तो सब रौनक थी
ये दुनिया जैसे कोई जन्नत थी
तुम बिन अब कुछ रास ना आए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम्हारी एक मुस्कान से जैसे
सारा जहाँ खिल उठता था
तुम्हारी आँखों की चमक से जैसे
मेरी राहें रोशन रहती थी
मंजिल लगने लगी है अब दूर
तुम बिन एक कदम भी ना चला जाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
हवाएं तुम्हारे इशारे पर बहती थी
कलियाँ तुम्हें देख खिलती थी
कोयल तुम्हारे संग गाती थी
तुम क्या गई गुलशन से जैसे
बहारे भी अब रूठ गई
तुम नहीं तो जीवन में मेरे
अब कौन बहारें लाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
फागुन अब फिर से आने को है
बौछारें अब रंगों की फिर उड़ने को है
हर प्रीतम के गालों पर
लाल हरा कोई रंग लगाएगा
लेकिन फागुन के दिन साथी
अब मेरा मन बहुत तरसेगा
तुम बिन कौन अब मेरी दुनिया में
फिर से रंग भरे और बरसाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
अब मैं जीना सीख गया हूँ
मैं अपनी धुन में रहता था
जो दिल चाहे वो करता था
मैं नहीं किसी की सुनता था
मैं यहाँ वहां भटकता था
सभी कहते थे कि मैं आवारा हूँ
जिसे कुछ ना मिला वो बेचारा हूँ
खुद अपनी किस्मत का मारा हूँ
नहीं किसी काम का मैं नाकारा हूँ
तुम क्या आई मेरे जीवन में
तुमने मुझे बदल डाला
प्रेम के दो घूँट पिला कर तुमने
बन दिया मुझे प्रेम मतवाला
अब मैं सब कुछ भूल गया हूँ
तेरी आँखों की झील में डूब गया हूँ
अब मैं तुम में खोया रहता हूँ
अब तेरी बातें ही सुनता हूँ
तेरी गलीयों में ही भटकता हूँ
तेरे ही सपने देखता हूँ
कहते हैं ये लोग सभी
मैं पहले भी आवारा था
और अब भी आवारा हूँ
मैं तेरे इश्क का मारा हूँ
मैं किसी का आशिक हूँ
और इसलिए नाकारा हूँ
अब दुनिया को कैसे समझाऊँ
अब लोगों को मैं क्या समझाऊँ
कैसे कहूँ मैं आवारा नहीं
कैसे कहूँ मैं नाकारा नहीं
मैं कितना अब बदल गया हूँ
मैं यहाँ वहां की बातें भूल गया हूँ
अब मैं संभालना सीख गया हूँ
किसी को अपना बनाना सीख गया हूँ
हर सांस को जीना सीख गया हूँ
मैं प्रेम करना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
किसी ने भुला दिया है मुझे
शायद किसी ने भुला दिया है आजकल मुझे
तभी तो आती नहीं हिचकियाँ आजकल मुझे
शायद कोई नहीं पुकारता है नींदों में अब मुझे
तभी तो आते नहीं है किसी के ख्वाब अब मुझे
शायद कोई नहीं पढ़ता है अब मेरे लिखे ख़त
तभी तो नामावर नहीं मुस्कुराता है अब देख मुझे
शायद कोई नहीं करता है मेरा ज़िक्र अब कहीं
तभी तो नहीं सुनाता कोई नया अफसाना मुझे
शायद नहीं करता है अब कोई राहों में मेरा इंतज़ार
तभी तो मंजिल नहीं नज़र आती अब करीब मुझे
शायद नहीं पढता है कोई मेरे लिखे शेर महफिलों में
तभी तो "नाशाद" वहां रौनक नहीं नज़र आती मुझे
शायद किसी ने भुला दिया है आजकल मुझे
तभी तो आती नहीं हिचकियाँ आजकल मुझे
शायद कोई नहीं पुकारता है नींदों में अब मुझे
तभी तो आते नहीं है किसी के ख्वाब अब मुझे
शायद कोई नहीं पढ़ता है अब मेरे लिखे ख़त
तभी तो नामावर नहीं मुस्कुराता है अब देख मुझे
शायद कोई नहीं करता है मेरा ज़िक्र अब कहीं
तभी तो नहीं सुनाता कोई नया अफसाना मुझे
शायद नहीं करता है अब कोई राहों में मेरा इंतज़ार
तभी तो मंजिल नहीं नज़र आती अब करीब मुझे
शायद नहीं पढता है कोई मेरे लिखे शेर महफिलों में
तभी तो "नाशाद" वहां रौनक नहीं नज़र आती मुझे
बुधवार, 31 मार्च 2010
तुम्हें पहचान लेता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुमने किया है चुपके से याद मुझे
चमकते चाँद से जान लेता हूँ
मेरी तस्वीर को अकेले में छुआ है तुमने
अपनी बढती धड़कन से जान लेता हूँ
शरमा रही हो मन ही मन में
लचकती डालीयों से जान लेता हूँ
दबे होठों से लिया है तुमने मेरा नाम
हवाओं की खुशबू से जान लेता हूँ
मैंने तुमसे किया है प्यार
मैं तुम पर अपनी जान देता हूँ
खुदा ने तुम सा कोई और ना बनाया
मैं उसे अपना सलाम देता हूँ
हर आशिक अपनी महबूबा को दे तुम्हारा नाम
मैं आज ये ऐलान करता हूँ
मेरा दिल, मेरा प्यार , मेरी हर आरज़ू
आज मैं तुम्हारे नाम करता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुमने किया है चुपके से याद मुझे
चमकते चाँद से जान लेता हूँ
मेरी तस्वीर को अकेले में छुआ है तुमने
अपनी बढती धड़कन से जान लेता हूँ
शरमा रही हो मन ही मन में
लचकती डालीयों से जान लेता हूँ
दबे होठों से लिया है तुमने मेरा नाम
हवाओं की खुशबू से जान लेता हूँ
मैंने तुमसे किया है प्यार
मैं तुम पर अपनी जान देता हूँ
खुदा ने तुम सा कोई और ना बनाया
मैं उसे अपना सलाम देता हूँ
हर आशिक अपनी महबूबा को दे तुम्हारा नाम
मैं आज ये ऐलान करता हूँ
मेरा दिल, मेरा प्यार , मेरी हर आरज़ू
आज मैं तुम्हारे नाम करता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
मंगलवार, 30 मार्च 2010
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
मैं ऐसी भाव-विव्हल हो गई कि
आँखें मेरी सजल हो गई
जाने कितने ही सावन आये
संग अपने तेरी यादें ले लाये
घने बादल फिर खूब बरसाए
पर ऐसी बरसात कभी ना हुई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम्हे खोजा मैंने सितारों में
तुम्हे पुकारा मैंने यादों में
करते करते याद तुम्हे प्रियतम
मैं ना जाने जैसे कहीं खो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
अब ना कभी तुम होना दूर
मेरे ही सामने अब रहना तुम
मुझे जो भी ख़त लिखे थे तुमने
मेरे लिए जैसे वो ही ग़ज़ल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
मैं ऐसी भाव-विव्हल हो गई कि
आँखें मेरी सजल हो गई
जाने कितने ही सावन आये
संग अपने तेरी यादें ले लाये
घने बादल फिर खूब बरसाए
पर ऐसी बरसात कभी ना हुई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम्हे खोजा मैंने सितारों में
तुम्हे पुकारा मैंने यादों में
करते करते याद तुम्हे प्रियतम
मैं ना जाने जैसे कहीं खो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
अब ना कभी तुम होना दूर
मेरे ही सामने अब रहना तुम
मुझे जो भी ख़त लिखे थे तुमने
मेरे लिए जैसे वो ही ग़ज़ल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम बिन रहा ना जाए
ढल गई है शाम अब
पंछी भी घर लौट आये
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारे वादे पर मैं जी रही हूँ
तुम्हारे नाम की साँसें ले रही हूँ
बहुत दूर है गाँव तुम्हारा
अब एक कदम भी चला ना जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारी राहों में फूल बिछाए बैठी हूँ
तुम्हारी यादों के दिए जलाये बैठी हूँ
बहारों के मौसम भी है अब आनेवाले
फिर से चलने लगी है पुरकेंफ़ हवाएं
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
अब ना कभी मैं तुम्हें दूर जाने दूँगी
कैसी भी हो राहें संग तुम्हारे चलूंगी
फिर से छाएंगे बादल और बरसेंगी बरखा
इस बार भी सावन कहीं सूखा ना चला जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
ढल गई है शाम अब
पंछी भी घर लौट आये
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारे वादे पर मैं जी रही हूँ
तुम्हारे नाम की साँसें ले रही हूँ
बहुत दूर है गाँव तुम्हारा
अब एक कदम भी चला ना जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारी राहों में फूल बिछाए बैठी हूँ
तुम्हारी यादों के दिए जलाये बैठी हूँ
बहारों के मौसम भी है अब आनेवाले
फिर से चलने लगी है पुरकेंफ़ हवाएं
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
अब ना कभी मैं तुम्हें दूर जाने दूँगी
कैसी भी हो राहें संग तुम्हारे चलूंगी
फिर से छाएंगे बादल और बरसेंगी बरखा
इस बार भी सावन कहीं सूखा ना चला जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
सोमवार, 29 मार्च 2010
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
जो इस तरह मेरे दिल में समां गए हो
जो इस तरह मेरी दुनिया बदल गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरी साँसों को महका गए हो
जो मेरी आँखों में आकर बस गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरे होठों को एक नई मुस्कान दे गए हो
जो मेरे गालों की लालिमा को और बढा गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो फागुन के रंगों को और भी रंगीन कर गए हो
जो पतझड़ में भी हर तरफ बहारें लेकर आये हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मुझे अब हर तरफ नज़र आने लगे हो
जो मुझे ख्वाबों में भी आकर सताने लगे हो
ना जाने तुम कौन हो
जो अब मुझ को मुझ ही से छीन रहे हो
जो ना जाने किस बंधन में मुझे बाँध रहे हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
जो इस तरह मेरे दिल में समां गए हो
जो इस तरह मेरी दुनिया बदल गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरी साँसों को महका गए हो
जो मेरी आँखों में आकर बस गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरे होठों को एक नई मुस्कान दे गए हो
जो मेरे गालों की लालिमा को और बढा गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो फागुन के रंगों को और भी रंगीन कर गए हो
जो पतझड़ में भी हर तरफ बहारें लेकर आये हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मुझे अब हर तरफ नज़र आने लगे हो
जो मुझे ख्वाबों में भी आकर सताने लगे हो
ना जाने तुम कौन हो
जो अब मुझ को मुझ ही से छीन रहे हो
जो ना जाने किस बंधन में मुझे बाँध रहे हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
कजरारी आँखों वाली लडकी
वो कजरारी आँखों वाली लड़की
अब भी मुझे याद आती है
उसकी कभी ना ख़त्म होनेवाली बातें
अब भी मुझे याद आती है
मैं चाहे सुनूँ ना सुनूँ
वो अपनी हर बात बताती थी
मैं चाहे मानूँ ना मानूँ
वो हर बात पर सलाह देती थी
मैं जब भी छत पर पढने जाता था
वो कंकर फेंक कर सताती थी
मैं जब भी गहरी सोच में होता था
उसे मेरी चिंता सताती थी
जब भी मेरे इम्तिहान नज़दीक आते थे
वो मेरे लिए रोज़ दुआएं मांगती थी
जब भी देखती थी मेरा खिला चेहरा
उसके चेहरे पर भी चमक आ जाती थी
जब मैं वापस लौट रहा था
उसका चेहरा मुरझाया हुआ था
उसकी कजरारी आँखें नाम थी
उसके कदम लडखडा रहे थे
वो कुछ कहना चाह रही थी
मगर उसकी बेहिसाब सिसकीयाँ
उसे शायद रोक रही थी
मैं वापस घर लौट आया
मगर आज तक उसे भुला नहीं पाया
उसकी सिसकीयाँ आज भी मुझे सुनाई देती है
उसकी आवाज़ आज भी मुझे सुनाई देती है
उसकी हंसी मुझे हर वक़्त सुकून देती थी
उसकी बातें मुझमे नया जोश भर देती थी
मैं उसे शायद समझ नहीं पाया
मैं उसकी आँखों को पढ़ नहीं पाया
उसके दिल की बात जान नहीं पाया
वो क्यों मुझे देख खुश हो जाती थी
वो क्यों मेरे लिए दुआएं मांगती थी
वो क्यों मेरी हर ख़ुशी में शामिल हो जाती थी
कहते हैं मोहल्ले के लोग
वो मुझसे प्यार करती थी
मुझसे बे इन्तेहा मौहब्बत करती थी
आज लग रहा है मुझे
वो शायद मुझसे प्यार करती थी
हाँ वो मुझसे प्यार करती थी
वो कजरारी आँखों वाली लड़की
मुझसे प्यार करती थी
रविवार, 28 मार्च 2010
वो शायद दीवाना था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
अक्सर मेरी गलीयों में
वो बेमतलब घूमा करता था
देखकर मुझे दरीचे में खड़ा
वो अक्सर मुस्कुराया करता था
शाम को छत पर आकर वो
मेरा नाम लिखी पतंगे उड़ाता था
ना जाने खाली सफहों पर
कुछ लिखता और खुद ही पढ़कर
मन ही मन जैसे शरमाया करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मुझसे मिलने की वो
अक्सर कोशिश करता था
पर मेरे सामने आते ही वो
ना जाने कहाँ छुप जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मैं उसकी हर बात पर
हंस कर रह जाया करती थी
मेरे हंसने पर वो ना जाने क्यों
कुछ खोया खोया सा हो जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
एक अरसा बीत गया
वो अब दिखाई नहीं देता
मैं उसे अक्सर याद करती हूँ
ना जाने वो कहाँ खो गया
अक्सर उसकी बातें और
वे छोटी मुलाकातें याद करती हूँ
उसका वो मासूम चेहरा
अब भी मेरी आँखों में रहता है
कहती है मेरी सब सहेलीयां
वो मुझसे प्यार करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
लेकिन ना जाने वो क्यों
कुछ भी कहने से डरता था
अब अक्सर सोचती रहती हूँ
वो ऐसा क्यों करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
अक्सर मेरी गलीयों में
वो बेमतलब घूमा करता था
देखकर मुझे दरीचे में खड़ा
वो अक्सर मुस्कुराया करता था
शाम को छत पर आकर वो
मेरा नाम लिखी पतंगे उड़ाता था
ना जाने खाली सफहों पर
कुछ लिखता और खुद ही पढ़कर
मन ही मन जैसे शरमाया करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मुझसे मिलने की वो
अक्सर कोशिश करता था
पर मेरे सामने आते ही वो
ना जाने कहाँ छुप जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मैं उसकी हर बात पर
हंस कर रह जाया करती थी
मेरे हंसने पर वो ना जाने क्यों
कुछ खोया खोया सा हो जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
एक अरसा बीत गया
वो अब दिखाई नहीं देता
मैं उसे अक्सर याद करती हूँ
ना जाने वो कहाँ खो गया
अक्सर उसकी बातें और
वे छोटी मुलाकातें याद करती हूँ
उसका वो मासूम चेहरा
अब भी मेरी आँखों में रहता है
कहती है मेरी सब सहेलीयां
वो मुझसे प्यार करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
लेकिन ना जाने वो क्यों
कुछ भी कहने से डरता था
अब अक्सर सोचती रहती हूँ
वो ऐसा क्यों करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
शनिवार, 27 मार्च 2010
तेरा चेहरा नज़र आता है
जब भी देखता हूँ मैं आईना
मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
मेरी मुस्कान में सनम अब
मुझे तेरा प्यार नज़र आता है
कोई भी लेता हूँ जब मैं नाम
तेरा ही नाम जुबां पर आता है
जिस गली से भी गुजरूँ मैं
मुझे तेरा ही घर नज़र आता है
जब भी किसी से करता हूँ बातें
मुझे तेरी आवाज़ सुने देती है
जब भी खनकती है कोई पायल
मुझे तेरी आहट सुनाई देती है
जब भी शाम को जाता हूँ छत पर
मुझे अपनी मुलाकातें याद आती है
जब भी झूम के बरसता है सावन
मुझे हमारी मोहब्बत याद आती है
जब भी पढता हूँ तेरे लिखे ख़त
मुझे उनमे से तेरी खुशबू आती है
देखता हूँ मैं जब भी तेरी तस्वीर
मुझे मेरा चेहरा नज़र आता है
जब भी देखता हूँ मैं आईना
मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
मेरी मुस्कान में सनम अब
मुझे तेरा प्यार नज़र आता है
कोई भी लेता हूँ जब मैं नाम
तेरा ही नाम जुबां पर आता है
जिस गली से भी गुजरूँ मैं
मुझे तेरा ही घर नज़र आता है
जब भी किसी से करता हूँ बातें
मुझे तेरी आवाज़ सुने देती है
जब भी खनकती है कोई पायल
मुझे तेरी आहट सुनाई देती है
जब भी शाम को जाता हूँ छत पर
मुझे अपनी मुलाकातें याद आती है
जब भी झूम के बरसता है सावन
मुझे हमारी मोहब्बत याद आती है
जब भी पढता हूँ तेरे लिखे ख़त
मुझे उनमे से तेरी खुशबू आती है
देखता हूँ मैं जब भी तेरी तस्वीर
मुझे मेरा चेहरा नज़र आता है
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
भूल ना जाना
पीपल की छाँव को
बचपन के गाँव को
सावन के झूलों को
कागज़ की नांव को
भूल ना जाना
बाबा की डांट को
मां की लोरीयों को
दादा की सीख को
दादी की दुलार को
भूल ना जाना
धुल उड़ाती गलीयों को
फूलों पर बैठी तितलीयों को
खेतों में लहराती फसलों को
पनघट पर बतियाती सखियों को
भूल ना जाना
बचपन के यारों को
मुस्कुराते दरीचों को
अपनों की महफ़िलों को
सपनों की दुनिया को
भूल ना जाना
शहर की भीड़ - भाड़ में
दौलत पाने की चाह में
रोज़ नई मंजिल की तलाश में
पुरानी सुहानी यादों को
भूल ना जाना
लोगों की भीड़ में कहीं खो ना जाना
खुद को ही कहीं भूल ना जाना
अपनों से दूर नहीं हो जाना
घर लौट आने की राह भूल ना जाना
" नाशाद " कहीं भटक ना जाना
जिंदगी को कहीं भूल ना जाना
पीपल की छाँव को
बचपन के गाँव को
सावन के झूलों को
कागज़ की नांव को
भूल ना जाना
बाबा की डांट को
मां की लोरीयों को
दादा की सीख को
दादी की दुलार को
भूल ना जाना
धुल उड़ाती गलीयों को
फूलों पर बैठी तितलीयों को
खेतों में लहराती फसलों को
पनघट पर बतियाती सखियों को
भूल ना जाना
बचपन के यारों को
मुस्कुराते दरीचों को
अपनों की महफ़िलों को
सपनों की दुनिया को
भूल ना जाना
शहर की भीड़ - भाड़ में
दौलत पाने की चाह में
रोज़ नई मंजिल की तलाश में
पुरानी सुहानी यादों को
भूल ना जाना
लोगों की भीड़ में कहीं खो ना जाना
खुद को ही कहीं भूल ना जाना
अपनों से दूर नहीं हो जाना
घर लौट आने की राह भूल ना जाना
" नाशाद " कहीं भटक ना जाना
जिंदगी को कहीं भूल ना जाना
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