बुधवार, 23 मई 2012


मन अब इक जंगल सा हो गया



मन अब इक जंगल सा हो गया 

सिर्फ  यादों का  बसेरा रह गया 

नहीं रही अब तेरी आवाजें 

तेरा अहसास ही रह गया 

मन अब इक जंगल सा हो गया 



बीते हुए वक्त से बादल 

तेरी यादों की तरह बरसता सावन 

तेरी बातों सी शीतल पवन 

तेरा एहसास ही रह गया 

मन अब इक जंगल सा हो गया 



तेरी आहटों सी पगडंडीयाँ
तेरी मुस्कराहट से खिलते फूल 

तेरे आँचल सी खिलती बहारें 

तेरा एहसास ही रह गया 

मन अब इक जंगल सा हो गया 



तेरे खतों से बिखरे हुए सूखे पत्ते 

तेरी हंसी की तरह बहती कोई नदी 

मेरे मन की तरह ढलती हुई शाम 

तेरा एहसास ही रह गया 

मन अब इक जंगल सा हो गया 


मन अब इक जंगल सा हो गया 



= नरेश नाशाद 



गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

किस्मत ने हमें उलझनें दी अब उनका हल ढूंढते हैं
चलते रहे सहराओं में  अब  हर जगह जल ढूंढते हैं

काट डाले सभी पेड़ पौधे और घर बसा लिए इंसानों ने
अब भूख मिटाने के लिए बंज़र ज़मीं में फसल ढूंढते हैं

दिया था खुदा ने इक छोटा सा प्यारा सा घर गाँवों में
आकर हैवानों की बस्ती में अब रहने को महल ढूंढते है

थी हवाओं में अपनेपन की खुशबू दिलकश था नजारा
अब पत्थरों के इस शहर में इन्सां की चहल पहल ढूंढते हैं

छोड़ आए सभी अपनों को दूर अपने गाँव में हम कहीं
आकर शहर में नाशाद अब तो हम खुद को ही ढूंढते हैं  


बुधवार, 25 जनवरी 2012

किसी की याद आती रही


मेरी तनहाईयाँ मुझे सताती रही
गुमसुम हवाएं लोरीयाँ सी सुनाती रही
सन्नाटों को चीरती
किसी की याद आती रही

मेरी कलम सफ़ेद कागजों पर
लिख लिखकर कुछ याद दिलाती रही
सूखे हुए लबों पर जैसे
कोई बात आती रही जाती रही
किसी की याद आती रही

बीते हुए पल कभी ना लौटेंगे
ना ही लौटेंगे दूर जानेवाले
दोपहर में तेज हवाएं गली में
जैसे धूल सी उडाती रही
किसी की याद आती रही

सूखे पत्तों की सरसराहट मुझे
किसी की आहट याद दिलाती रही
मेरी ऊँगलियाँ रेत पर जैसे
मेरी किस्मत लिखती रही मिटाती रही
किसी  की याद आती रही



सोमवार, 19 दिसंबर 2011


             बर्फ सी मौहब्बत 

शायद किसी बर्फ की सी थी तुम्हारी मौहब्बत
जो कुछ ही दिनों में पिघलकर कहीं दूर बह गई 

कुछ यादें ही थी तुम्हारी मेरी किस्मत में शायद
वो भी वक्त की आंधी में रेत सी कहीं दूर उड़ गई

तन्हाईयों में ही साथ था तुम्हारा; मेरे ख्यालों में 
सन्नाटों के आते ही तन्हाई भी कहीं गुम हो गई 

डायरी के पन्नों में थी सिमटी तेरी कुछ मुलाकातें
उन पन्नों के पलटते ही वो भी कहीं पीछे छूट गई 

नाशाद इक खुशबू की तरह थी तुम्हारी याद शायद
हवा के चलते ही उड़कर वो भी कहीं और चली गई 



शुक्रवार, 2 दिसंबर 2011

             लम्हे 

वो लम्हे जब वक्त भी ठहर गया था 
नाशाद अलविदा जब तुमने कहा था
इस जुदाई से चाँद भी हिल गया था 
बादलों के बीच वो भी छुप गया था 
खामोशी ही कर रही थी बातें मुझ से 
तुमने तो कह अलविदा सब कह दिया था


उस मोड़ पर तुम राह बदल चले गए थे 

सफ़र में मुझे तनहा छोड़ गए थे 
मैं ये सोच रहा था ये राह कहाँ तक है
मंजिल का सफ़र अब क़यामत तक है
वो लम्हे बर्फ की तरह जम गए थे 
आँखों के आंसू भी जैसे वहीँ थम गए थे 
    

मुझे अब भी याद है वो लम्हे वो मोड़ 
जहाँ हम आखिरी बार मिले थे 
सोचता हूँ जुदाई ही ज़रिया था मिलने का 
हम चलते रहे थे दरिया के दो किनारों जैसे 
साथ साथ मगर इक दूजे से जुदा जुदा 
मिलकर समंदर में ही शायद हम मिल सकें 
नाशाद तब ही हम साथ साथ चल सकें  


बुधवार, 16 नवंबर 2011


आवारा दोपहरें 

याद है अभी भी वो आवारा दोपहरें 
तेरी तलाश में वो आवारा दोपहरें 

हर मोड़ पर तेरी राह तकना 
हर आहट में तेरे आने का धोखा होना 
पर अगले ही पल दिल का बैठ जाना 
याद है अभी भी वो आवारा दोपहरें 

वो बेमतलब तेरी गलीयों से गुज़रना
वो तेरे इक नज़ारे के लिए घंटों ठहरना 
तेरी मुस्कान पर सारी थकान भुला देना 
याद है अभी भी वो आवारा दोपहरें 

मुझे याद है अभी भी वो आवारा दोपहरें 
कभी ना भूलेगी वो आवारा दोपहरें 
= नरेश नाशाद 



शनिवार, 10 सितंबर 2011


उठ कर चल दे जानिब-ए-मंजिल तू 

उठ कर चल दे जानिब-ए-मंजिल तू 
किसी ईशारे का इंतज़ार ना कर तू 
खुद ही तराश पहाड़ों में उसकी सूरत
किसी करिश्मे का इंतजार ना कर तू 

हर तरफ पथरीली राहें  ही मिलेगी
खुशनुमा राह का इंतजार ना कर तू 
बढा अपने हाथों को आस्मां की तरफ 
उसके आने का इंतजार ना कर तू  

लिख ले अपने हाथों में खुद अपनी किस्मत 
लकीरों को पढने का इंतज़ार ना कर तू
लिख कोई नई ग़ज़ल और पढ़ ले नाशाद 
शम्मां के जलने का इंतज़ार ना कर तू 

खुद ही रोशन हो सज जायेगी महफ़िल  
जब गूंजेगी तेरी आवाज़ हर तरफ 
ढूंढ कोई लाजवाब शेर औ ग़ज़ल नाशाद
किसी और के पढने का इंतज़ार ना कर तू  



गुरुवार, 8 सितंबर 2011

जिंदगी जैसे थम गई है 

आज अचानक लगता है मुझे जैसे 
किसी मोड़ पर आकर यादें ठहर गई 
इसी मोड़ पर मैंने कुछ खोया था 
दिल अन्दर ही अन्दर बहुत रोया था 
कोई जो चलता रहा सदीयों तक साथ हमारे 
इसी मोड़ से हमसे  दूर हो गया था 

जिसकी करीबी का अहसास मुझे हर पल था 
जिसका साया हर कड़ी धूप में मेरे सर था 
मेरी सांसें उसी के दम पर चलती थी 
मेरी जिंदगी उसी के इर्द-गिर्द रहती थी 
वो अहसास वो साथ बहुत दूर हो गया है 

दिल उसकी याद में बहुत रोया 
मगर आँखों से कोई कतरा बाहर नहीं आया 
आंसू जैसे जम चुके थे 
साँसें जैसे कहीं थम चुकी थी 
आज ऐसा लगता है नाशाद 
जिंदगी थम सी गई है 
राह तो है मगर मंजिल कहीं गुम गई है 
जिस्म है  मौजूद इस जहां में 
मगर रूह मेरी कहीं दूर हो गई है 
ऐ मेरे खुदा  मेरे जन्मदाता 
आपके बिना दिन छोटे और रातें लम्बी हो गई है 
मैं जिंदा हूँ मगर जिंदगी कहीं खो गई है 
नाशाद मेरी जिंदगी कहीं खो गई है 

( हमारे पापा की दूसरी पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें श्रद्धांजलि ) 



रविवार, 8 मई 2011

यह कविता मेरी मम्मी के चरणों में अर्पित कर रहा हूँ. मेरी मम्मी जिनकी ऑंखें हम तीनों भाईयों के लिए सपने देखती हैं. जिनका दिल हमारे पूरे परिवार के लिए धडकता है. जिनकी मुस्कान हमें हर वक्त हिम्मत दिलाती है और यह कहती है कि जीवन में कभी हार मत स्वीकारना. जीतना ही जीवन है.

माँ

इस धरती पर भगवान का रूप है माँ
जीवन के इस सफ़र में ठंडी छाँव है माँ

माँ, दुखों की कड़ी धुप में
शीतलता का एहसास है
माँ, अगर हमारे पास है तो
सारे जहाँ की खुशीयाँ पास है

माँ के आँचल में जैसे
हर फूल की खुशबू है
माँ की गोद में जैसे
हर उलझन का हल है

माँ की मुस्कान में जैसे
खुदा खुद मुस्कुराता है
माँ के दुलार से जैसे
हर चमन में बहार है

माँ की ममता से जैसे
सारी दुनिया पलती है
माँ की आँखों में जैसे
तीनों लोकों का ज्ञान है

इन आँखों में कभी आंसू ना आए
इन होठों से कभी मुस्कान ना जाए
इस आँचल पर कोई आंच ना आए
चाहे हमसे हर ख़ुशी छिन जाए

माँ से दूर कभी कोई लाल ना जाए
चाहे सारी दुनिया से साथ छूट जाए
= नरेश नाशाद


सोमवार, 18 अप्रैल 2011

मेरा गाँव कहीं खो गया है 


कभी कभी मुझे लगता है जैसे 
सुख तो मिला पर चैन खो गया है 

दोस्त तो मिलें है हमें बहुत मगर 
अपनापन जैसे कहीं खो गया है 

हर ऐश-ओ-आराम मिल गए हमें 
मगर मन जैसे कहीं भटक गया है 

दौलत शोहरत बहुत मिली सभी को 
इंसान का मोल लेकिन घट गया है
शहरों की चकाचोंध में ऐ नाशाद 
मेरा गाँव कही जैसे खो सा गया है 
मेरा गाँव कहीं जैसे खो सा गया है 


शनिवार, 9 अप्रैल 2011

ये ना जाने कोई 

कितना लम्बा ये सफ़र है
ये ना जाने कोई
कहाँ तक अब ये डगर है
ये ना जाने कोई

कौन देखेगा कल की सहर
ये ना जाने कोई
किसकी है ये आखिरी शब
ये ना जाने कोई

कब तक हवाएं साथ है
ये ना जाने कोई
कब तक सूरज में आग है
ये ना जाने कोई

कब तक चाँद में शीतलता है
ये ना जाने कोई
कब तक सितारों का कारवाँ है
ये ना जाने  कोई

कब तक कदमों की चाल है
ये ना जाने कोई
कब तक सभी को ये आस है
ये ना जाने कोई

कब तक हम यहाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक ये जहां है
ये ना जाने कोई

कब तक  दुआओं में असर है
ये ना जाने कोई
कब तक उसकी हम पर नज़र है
ये ना जाने कोई

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

दरख़्त पर तेरा नाम 

उस दरख़्त पर मैंने तेरा नाम लिखा था 
जो अब शायद सुख चुका है 
नहीं आते उस पर अब हरे पत्ते 
नहीं बैठते उस पर अब परिंदे
नहीं आता कोई अब उसकी छाँव के लिए
तुम भी नहीं देखते उस सूखे दरख़्त को 
एक  नाकामयाब मौहब्बत के निशानी को 
नाशाद मैं आज भी वहीँ खडा हूँ 
वो सूखा दरख़्त भी वहीँ खडा है 
लेकिन उस पर तुम्हारा नाम आज भी खुदा है
मैं हर रोज पढता हूँ तुम्हारे नाम को
मैं हर रोज देखता हूँ उस दरख़्त को 
जो शायद एकमात्र निशानी है हमारी मौहब्बत की 
वो दरख़्त जिस पर मैंने तुम्हारा नाम लिखा था 
तेरे नाम के साथ अपना मुकद्दर भी लिख दिया था  


गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

क्या खबर थी कि इक दिन ऐसा मंज़र भी आएगा
वो होगा मेरे सामने मगर  मुझसे नज़र चुराएगा

जिसके साथ चले थे दूर तलक जानिब-ए-मंजिल हम 
इक दिन वो किसी और राह हम ही से दूर हो जाएगा

जिसे देखा करते थे हम हर रात अपने ख़्वाबों में
नाशाद वो कोई और के ख़्वाबों  की ताबीर हो जाएगा 

जिंदगी की किताब के हर सफ्हे पर था जिसका नाम
नाम उसका एक दिन कहीं लिखा हुआ देखा जाएगा

लोग कहते थे जिसे नाशाद इक इंसान बहुत ही अच्छा है
क्या खबर थी वो इक दिन शान-ए-मयकदा हो जाएगा  

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

कोई चेहरा

कोई चेहरा जो अब तक निगाहों में हैं
कोई ख्वाब जो अब तक नींदों  में है

कोई मुलाकात जो अब तक यादों में है
कोई जज्बात जो अब तक दिल में है

कोई चाहत जो आज भी यूँहीं ज़िंदा है
कोई दिल जो टूट जाने से शर्मिंदा है

कोई मोड़ जो आज भी वहीँ खडा है
कोई सफ़र जो आज भी वहीँ रुका है

कोई शाम जो आज भी उदास है
कोई जिसकी आज भी तलाश है

कोई जिस के आने की आज भी आस है
कोई चेहरा जो आज भी कहीं आसपास है

कोई चेहरा जो अब तक निगाहों में है
कोई ख्वाब जो अब तक नींदों में है

बुधवार, 15 दिसंबर 2010

मैं तुम्हारी याद हूँ 

अभी भी तुम्हारी सांसों की महक
मेरे चारों ओर है
अभी भी तुम्हारी हंसी की आवाज़
मेरे जहाँ में समाई है

अभी भी तुम्हारी ना ख़त्म होनेवाली बातें
मेरे कानों में गूंजती है
अभी भी तुम्हारे दिल की धड़कन
मेरे दिल में धड़कती है

अभी भी तुम्हारे होने का अहसास
मेरी आँखों में बसा हुआ है
अभी भी मेरी छाया में
अक्स तुम्हारा छुपा हुआ है

अभी भी तुम्हरे लौट आने की आस
मेरी उम्मीद में जिंदा है

तुम्हारी साँसे लेता हूँ
तुम्हारी बातें बोलता हूँ
तुम्हारी हंसी हँसता हूँ
तुम्हारी याद में जिंदा हूँ
क्योंकि मैं तुम्हारी याद हूँ
मैं तुम्हारी याद हूँ


रविवार, 12 दिसंबर 2010

छोटे छोटे लम्हात --

"अजब जहां है ये , सब कुछ मिलता है मगर प्यार नहीं मिलता
सारा शहर भरा है ऊंची ऊंची इमारतों से 
मगर इनमे कोई मुस्कुराता चेहरा नहीं मिलता 
लोग तो बहुत दिखते हैं यहाँ वहां मगर
कोई सच्चा दोस्त नहीं मिलता
चलो नाशाद गाँव ही चलकर रहा जाय
अब तो शहर में हमारा मन नहीं लगता " 
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जिंदगी को जिंदगी कहना आसां ना था 
पीकर ज़हर भी कहना पडा आब-ए-हयात 
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सजा लो ग़ज़लों की महफ़िल
दोस्ती की शमा जला लो
प्यार से पढ़ दो कोई भी ग़ज़ल
नाशाद खुद-ब-खुद आ जायेंगे
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"जिंदगी का सफ़र कभी इतना सख्त ना था
तेरे दर का रास्ता कभी इतना लंबा ना था
सूरज की रौशनी भी अन्धेरा लगने लगी है
नाशाद अब तो मंजिल ही ओझल होने लगी है "

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हर दरीचे में तुझे ही तलाशते हैं
हर चेहरे में तुझे ही देखते हैं
लोग कहते हैं दीवाना हमको
नाशाद हम तो जिंदगी को ढूंढते हैं 

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कोई ये बता दे उनके चेहरे पर नकाब का मतलब
क्या हमसे खुद को छुपाये जा रहे हैं  
या फिर हमपे नज़र रखी जा रही है
नाशाद यही उलझन दिन-रात खाए जा रही है

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ज़माने की हवा खराब है
नाशाद खुद को बचा कर रखिये 
लोगों की नज़रें खराब है
रुख पर अपने नकाब रखिये 
राह-ए-मंजिल में अन्धेरा है बहुत 
यादों के चराग जलाए रखिये

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मेरा सबसे पहला लिखा शेर आपको बताना चाहता हूँ-- 
कौन कहता है आजकल कि अकेले हैं हम
मेरे साथ हैं मेरी तनहाईयाँ और मेरे गम 
( लिखने का  समय - अगस्त १९८१ ) 
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किस से उम्मीद करें यहाँ ,  हर कोई उम्मीद में बैठा है
किस का इंतज़ार करें यहाँ ,हर कोई इंतज़ार में बैठा है 
किस को कहें अपना यहाँ , हर कोई जब खुद को ढूंढ रहा है
किस से पूछें अब राह-ए-मंजिल, हर कोई मंजिल भूल चुका है
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वो कोई और है जो मुझमे बसा है
मैं कोई और हूँ जो सामने आया हूँ
वक्त ने मुझे सताया है 
चाहत ने मुझे बहकाया है
कुछ और पाने की चाह में मैं बदल गया हूँ
कुछ अच्छा सा नाम था मेरा
जो अब बदल गया है
अपना नाम तक भूल गया हूँ 
बस नाशाद नाम याद आया है 
वो कोई और है जो मुझमे बसा है
मैं कोई और हूँ जो सामने आया हूँ
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दिल है बहुत ही छोटा-सा मगर ज़माने ने दिए हैं गम बहुत 
कोई ना समझ सका हमें, हमने तो सभी  को समझा बहुत 
दिल में है फिक्र और मौहब्बत और सभी को चाहते है बहुत 
नाशाद क्या कहें किसी से ज़माने ने हमको सताया बहुत

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जुबां खामोश रहती है
निगाहें बात करती है
जब मैं उठकर चलता हूँ
मंजिल मिलने को तरसती है
= नरेश नाशाद


शुक्रवार, 10 दिसंबर 2010











कुछ छोटे छोटे सफ़हे --



और कुछ नहीं था अपना मेरे दिल के सिवा   
तेरे इश्क में नाशाद वो भी हार गया 
तेरी इक नजर क्या पड़ी मुझ पर
मैं तुझ पर आज सब कुछ हार गया  

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जब वो सामने होते हैं
हर मंज़र बहार होता है
जब वो करीब होते हैं
तो दिल को करार होता है
यूहीं होता है नाशाद जब
किसी को किसी से प्यार होता है 

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घटाओं में जिसका चेहरा छिपा है
हवाओं में जिसकी महक घुली है
बहारों में जिसकी मस्ती छाई है 
वो मौहब्बत किसी में नज़र आई है
जिसे देखा था अक्सर ख़्वाबों में
वो सूरत आज सामने नज़र आई है 

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यूँ सामने आकर ना 
तुम मिला करो हमसे
हमें हया आ जाती है
बस ख़्वाबों में आया करो 
जब हम नींद में सोये रहते हैं

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मैंने उनमे क्या देखा
बस अपना मुकद्दर देखा
मैंने उनकी आँखों में
प्यार का समंदर देखा
उनकी झील सी आँखों में
मैंने देखा और दिल डूब गया 
जंगल सी उनकी आँखों में
नाशाद जैसे राह ही भूल गया 

= नरेश नाशाद 









गुरुवार, 9 दिसंबर 2010

 मेरी तरह अकेला

मेरी तरह वहाँ कोई अकेला ना था
धूप में मेरा कहीं साया तक नहीं था

सुनसान थी राहें उसके घर की मगर
उसकी यादों का कारवां  मेरे संग था

हर तरफ थी खामोशीयाँ और थी तन्हाईयाँ
याद आती उसकी बातों से सफ़र आसां था

वक्त की धूल ने मिटा दिए थे सभी रास्ते
उसके बदन की खुशबू उसके दर का रास्ता था 

बुझी हुई थी शम्मां महफ़िल में भी कोई ना था
फ़कत एक था नाशाद और एक खाली सफहा था

बुधवार, 8 दिसंबर 2010


धुंधली यादें 

यादें भी धुंधली हो जाती है
जब वक्त की धूल जम जाती है
किसी की याद का झोंका जब आता है
तस्वीरों से धूल उड़ जाती है

याद आते हैं कुछ चेहरे
जो कभी हमारे सामने थे
जो कभी हमारे साथ थे
एक एक लम्हा याद आता है
हर एक लम्हा रुला जाता है

वक्त क्यूँ बीत जाता है
आखिर कोई क्यूँ दूर हो जाता है
आखिर कोई क्यूँ दूर हो जाता है 


गुरुवार, 4 नवंबर 2010

मैं जब चलता हूँ

जुबां खामोश रहती है  और  निगाहें बात करती है
मैं उठकर चल देता हूँ मंजिल मिलने को तरसती है

हवाएं झूम जाती है और घटाएं खुलकर बरसती है
जब मैं मुस्कुराता हूँ सभी कलियाँ खिल जाती है  

धूप भी छाँव बन जाती है और तपिश सुकून दे जाती है 
देख लूँ आसमां की तरफ तो उस की मेहरबानी हो जाती है

जब भी कारवां-ए-नाशाद किसी भी गली से गुज़रता है  
हर दरीचा खुल जाता है गलीयाँ गुलज़ार हो जाती है 

शम्मां खुद रोशन हो जाती है हर महफ़िल जवां हो जाती है 
जब भी नाशाद की उस महफ़िल में ग़ज़लें गूँज  जाती है