सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
मैं तुम्हारी याद हूँ
अभी भी तुम्हारी सांसों की महक
मेरे चारों ओर है
अभी भी तुम्हारी हंसी की आवाज़
मेरे जहाँ में समाई है
अभी भी तुम्हारी ना ख़त्म होनेवाली बातें
मेरे कानों में गूंजती है
अभी भी तुम्हारे दिल की धड़कन
मेरे दिल में धड़कती है
अभी भी तुम्हारे होने का अहसास
मेरी आँखों में बसा हुआ है
अभी भी मेरी छाया में
अक्स तुम्हारा छुपा हुआ है
अभी भी तुम्हरे लौट आने की आस
मेरी उम्मीद में जिंदा है
तुम्हारी साँसे लेता हूँ
तुम्हारी बातें बोलता हूँ
तुम्हारी हंसी हँसता हूँ
तुम्हारी याद में जिंदा हूँ
क्योंकि मैं तुम्हारी याद हूँ
मैं तुम्हारी याद हूँ
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
तुम्हें भुला ना पाई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
वो तुम्हारी मुस्कान
वो आंखों की भाषा
जिनमें थी प्यार की अभिलाषा
वो ख़त पुराने
जिनमें थी प्यार की परिभाषा
वो सपन सुहाने
वो खनकती आवाज़
वो पहचानी सी आहट
वो मिलन की हर घडी
मैं तुम्हे भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
वो मंदिर की दहलीज
वो अनसुनी प्रार्थनाएं
वो मज़ार पर चादरें
वो लौटी फरियादें
वो पीपल तले वादे
वो जनम जनम के वादे
वो सूने दरीचे
वो खाली राहें
वो अंतिम मिलन पर सुबकती रुलाई
अपनी जुदाई मैं ना समझ पाई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
जब भी चली कभी पुरवाई
मुझे तुम्हारी ही याद आई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
साँसों की कमी लगे है
मंजिल है सामने मगर रास्तों की कमी लगे है
जिंदगी बाकी है मगर साँसों की कमी लगे है
दोस्त तो बहुत है हमारे मगर दुश्मनों की कमी लगे है
दुःख है ज़माने में बहुत मगर खुशीयों की कमी लगे है
बस्तियां तो बहुत है मगर इंसानों की कमी लगे है
हर नाता झूठा है यहाँ सच्चाईयों की कमी लगे है
किसी का दूर जाना भी अब तो करीब आना लगे है
मोहब्बतें बिखरी है यहाँ वहां तलाशों की कमी लगे है
दुआएं करता है हर कोई यहाँ मगर असर की कमी लगे है
महफ़िल में है कई सुखनवर मगर नाशाद की कमी लगे है
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
वे भी लौट आयेंगे
आ गया वसंत सखि;
वे भी लौट आयेंगे
बगिया में खिले फूलों जैसे
सभी के चेहरे खिल जायेंगे
वृक्षों की डालीयाँ फूलों से लद गयी
फूलों की बगिया तितलियों से भर गयी
मुंडेरों पर चहक रही चिड़िया
लो फिर कागा आ गया
उनके आने का जैसे संदेसा आ गया
वे भी लौट आयेंगे
इतने दिनों की तन्हाई के बाद
फिर से दिन मिलन के आयेंगे
सुरमई आँखों में सखि
खुशीयों के आंसू छलक जायेंगे
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
फलाश के वृक्षों पर फिर लालिमा छा गई
उड़ने लगा फिर अबीर गुलाल
रंगों की छठा चहुँ ओर छा गई
अधखुले फूल सभी खिल जायेंगे
लौट आये सभी भंवरे सखि
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
आ गया वसंत सखि;
वे भी लौट आयेंगे
बगिया में खिले फूलों जैसे
सभी के चेहरे खिल जायेंगे
वृक्षों की डालीयाँ फूलों से लद गयी
फूलों की बगिया तितलियों से भर गयी
मुंडेरों पर चहक रही चिड़िया
लो फिर कागा आ गया
उनके आने का जैसे संदेसा आ गया
वे भी लौट आयेंगे
इतने दिनों की तन्हाई के बाद
फिर से दिन मिलन के आयेंगे
सुरमई आँखों में सखि
खुशीयों के आंसू छलक जायेंगे
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
फलाश के वृक्षों पर फिर लालिमा छा गई
उड़ने लगा फिर अबीर गुलाल
रंगों की छठा चहुँ ओर छा गई
अधखुले फूल सभी खिल जायेंगे
लौट आये सभी भंवरे सखि
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
फासला
एक वो भी ज़माना था
जब लिखा करते थे दरख्तों पर नाम तेरा
घने जंगलों की अनजान राहों में
देखा करते थे रास्ता तेरा
दूर उफक में हम कहीं
तलाशा करते थे चेहरा तेरा
खामोश वादीयों में
हम अक्सर पुकारा करते थे नाम तेरा
अब ज़माना बदल गया
और साथ वक़्त भी बीत गया
देखते देखते ही हम
दोनों में फासला हो गया
अब शायद ही कभी हम मिलेंगे
आने वाले दिन तेरी यादों में कटेंगे
अब खोजते हैं उन दरख्तों को
जिन पर तेरा नाम कभी लिखा था
अब खोजते हैं उन राहों को
जिन पर तेरा रास्ता कभी तका था
पतझड़ के सूखे पत्तों की खड़क ही
तेरा आना लगता है
दूर उफक में परिन्दों की परवाज़
तेरा चेहरा दिखलाती है
सूनी वादीयों में झरनों की आवाज़
तेरी हंसी की याद दिलाती है

कितना कुछ बदल गया इन गुज़रे सालों में
कितना फासला हो गया इन दो ज़मानों में
दरिया के दो किनारों का सा अब साथ है हमारा
समंदर तक पहुँचते ही यह साथ भी छूट जायेगा
तब ये दिल हमेशा के लिए तेरी याद में खामोश हो जायेगा
फिर कभी नाशाद को, कोई साथ ना याद आएगा
एक वो भी ज़माना था
जब लिखा करते थे दरख्तों पर नाम तेरा
घने जंगलों की अनजान राहों में
देखा करते थे रास्ता तेरा
दूर उफक में हम कहीं
तलाशा करते थे चेहरा तेरा
खामोश वादीयों में
हम अक्सर पुकारा करते थे नाम तेरा
अब ज़माना बदल गया
और साथ वक़्त भी बीत गया
देखते देखते ही हम
दोनों में फासला हो गया
अब शायद ही कभी हम मिलेंगे
आने वाले दिन तेरी यादों में कटेंगे
अब खोजते हैं उन दरख्तों को
जिन पर तेरा नाम कभी लिखा था
अब खोजते हैं उन राहों को
जिन पर तेरा रास्ता कभी तका था
पतझड़ के सूखे पत्तों की खड़क ही
तेरा आना लगता है
दूर उफक में परिन्दों की परवाज़
तेरा चेहरा दिखलाती है
सूनी वादीयों में झरनों की आवाज़
तेरी हंसी की याद दिलाती है

कितना कुछ बदल गया इन गुज़रे सालों में
कितना फासला हो गया इन दो ज़मानों में
दरिया के दो किनारों का सा अब साथ है हमारा
समंदर तक पहुँचते ही यह साथ भी छूट जायेगा
तब ये दिल हमेशा के लिए तेरी याद में खामोश हो जायेगा
फिर कभी नाशाद को, कोई साथ ना याद आएगा
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
इस रचना से मेरा बहुत अलग लगाव है. इसका एकमात्र कारण यह है कि यह मेरी पहली रचना है. मैंने इसे ४ दिसम्बर १९८२ के दिन लिखा था. उन दिनों मैं बी एस सी द्वितीय वर्ष में था. मैं जोधपुर की लाचू कॉलेज में अध्ययनरत था. एक अलग और यादगार अनुभव था वो. मैंने लिखने के बाद अपने सभी दोस्तों को कॉलेज में सुनाया और इससे पहले कि वे कुछ कहते मैंने कहना शुरू कर दिया कि क्या तुम लोग ऐसा लिख सकते हो ? आज भी उस दिन को याद कर के मेरी आँखें नाम हो जाती है.वे दिन अब कभी लौट कर नहीं आयेंगे; बस युहीं यादों से अपनी तड़पाया करेंगे. कभी कभी मैं यह सोचने लग जाता हूँ और अक्सर सोचा करता हूँ कि हमें हमारा बीता हुआ वक्त हमेशा ज्यादा अच्छा या खुशनुमा क्यूँ लगता है ? जैसे जैसे वक्त गुज़रता जाता है ऐसे लगाने लगता है कि हम पहले कि तरह खुश नहीं है. धीरे धीरे गम बढ़ते हुए क्यूँ प्रतीत होते हैं ? ऐसा क्यूँ लगता है कि हम खुद से ही दूर हो गए हैं ? पहले की तरह हम अपने आप को इतना सहज महसूस क्यों नहीं कर रहे है ? क्या आप के पास इसका कोई ज़वाब है ?
मेरा ख्वाब
दूर पहाड़ों कि गोद में होगा घर हमारा
चारों ओर होगा खुशीयों का नज़ारा
वहां पर ना होगा कभी ग़मों का अँधेरा
खिला रहेगा वहां सदा खुशीयों का सवेरा
दुनिया की हर ख़ुशी होगी हमारी
कोई गम ना होगा दिल को गवारा
खुशीयों के बादल दिल के आसमानों पर छाएंगे
ठंडी हवाओं के संग हम गीत ख्सुही के गायेंगे
मेरा ख्वाब
दूर पहाड़ों कि गोद में होगा घर हमारा
चारों ओर होगा खुशीयों का नज़ारा
वहां पर ना होगा कभी ग़मों का अँधेरा
खिला रहेगा वहां सदा खुशीयों का सवेरा
दुनिया की हर ख़ुशी होगी हमारी
कोई गम ना होगा दिल को गवारा
खुशीयों के बादल दिल के आसमानों पर छाएंगे
ठंडी हवाओं के संग हम गीत ख्सुही के गायेंगे
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010
तुम ना थे

बहार थी; फूल थे, महक थी
तुम ना थे
गलीयाँ थी; मोड़ थे , इंतज़ार था
तुम ना थे
शाम थी ; यादें थी , तनहाइयाँ थी
तुम ना थे
महफ़िल थी ; किस्से थे , ज़िक्र था
तुम ना थे
जुदाई थी ; तड़प थी , दुआएं थीं
तुम ना थे
ख़याल थे ; नींद थी , ख्वाब थे
तुम ना थे
राहें थी ; राही थे , मंजिलें थी
तुम ना थे
दिल था ; आरज़ू थी , उम्मीद थी
तुम ना थे
शेर थे ; ग़ज़ल थी , नाशाद था
तुम ना थे
बस सिर्फ तुम ना थे

बहार थी; फूल थे, महक थी
तुम ना थे
गलीयाँ थी; मोड़ थे , इंतज़ार था
तुम ना थे
शाम थी ; यादें थी , तनहाइयाँ थी
तुम ना थे
महफ़िल थी ; किस्से थे , ज़िक्र था
तुम ना थे
जुदाई थी ; तड़प थी , दुआएं थीं
तुम ना थे
ख़याल थे ; नींद थी , ख्वाब थे
तुम ना थे
राहें थी ; राही थे , मंजिलें थी
तुम ना थे
दिल था ; आरज़ू थी , उम्मीद थी
तुम ना थे
शेर थे ; ग़ज़ल थी , नाशाद था
तुम ना थे
बस सिर्फ तुम ना थे
हाँ यह घर मेरा है
हर एक कोना कुछ कहता है
छत पुरानी शामें याद कराती है
कमरे बा बाऊजी की आवाजें सुनाती है
सीढीयाँ पापा की पदचाप सुनाती है
यहाँ यादों का बसेरा है
जहाँ बीता बचपन मेरा है
हाँ यह घर मेरा है
जहाँ आंधीयां खुशबू लेकर आती है
सुबहें भोर राग सुनाती है
दोपहरें सन्नाटों में गुनगुनाती है
शामें अपनों की महफिलें सजाती है
रातें लोरीयाँ सुनाती है
यहाँ मेरे सभी पुरखों का बसेरा है
हाँ यह घर मेरा है
आरज़ू है हर शाम यहीं बीते
ज़िन्दगी की शाम भी यहीं ढले
हर जनम यहीं मिले
हम सभी हर जनम में यहीं मिले
हर एक कोना कुछ कहता है
छत पुरानी शामें याद कराती है
कमरे बा बाऊजी की आवाजें सुनाती है
सीढीयाँ पापा की पदचाप सुनाती है
यहाँ यादों का बसेरा है
जहाँ बीता बचपन मेरा है
हाँ यह घर मेरा है
जहाँ आंधीयां खुशबू लेकर आती है
सुबहें भोर राग सुनाती है
दोपहरें सन्नाटों में गुनगुनाती है
शामें अपनों की महफिलें सजाती है
रातें लोरीयाँ सुनाती है
यहाँ मेरे सभी पुरखों का बसेरा है
हाँ यह घर मेरा है
आरज़ू है हर शाम यहीं बीते
ज़िन्दगी की शाम भी यहीं ढले
हर जनम यहीं मिले
हम सभी हर जनम में यहीं मिले
यहाँ मेरी रूह का बसेरा है
हाँ यह घर मेरा है
हाँ यह घर मेरा है
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
सपनों में आया करो
जब सामने आते हो तुम
तो शरमा जाती हूँ मैं
साजन, तुम सपनों में आया करो
बहुत कुछ कहना है तुम्हें
तुम्हें देख सब भूल जाती हूँ
तुम सपनों में आया करो
खुद को देखना चाहती हूँ तुम्हारी आंखों में
मिलते ही तुमसे नज़र आंखें झुक जाती है
तुम सपनों में आया करो
थाम कर तुम्हारा हाथ दूर तलक जाना चाहती हूँ मैं
पर ज़माने से घबराती हूँ
तुम सपनों में आया करो
रोजाना मिलने के बहाने अब खोजना मुश्किल है
पर तुम बिन रहना भी अब मुश्किल है
तुम सपनों में आया करो
साजन, तुम सपनों में आया करो
जब सामने आते हो तुम
तो शरमा जाती हूँ मैं
साजन, तुम सपनों में आया करो
बहुत कुछ कहना है तुम्हें
तुम्हें देख सब भूल जाती हूँ
तुम सपनों में आया करो
खुद को देखना चाहती हूँ तुम्हारी आंखों में
मिलते ही तुमसे नज़र आंखें झुक जाती है
तुम सपनों में आया करो
थाम कर तुम्हारा हाथ दूर तलक जाना चाहती हूँ मैं
पर ज़माने से घबराती हूँ
तुम सपनों में आया करो
रोजाना मिलने के बहाने अब खोजना मुश्किल है
पर तुम बिन रहना भी अब मुश्किल है
तुम सपनों में आया करो
साजन, तुम सपनों में आया करो
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
तुमने कहा था
मेरी आँखों के जंगल में राह भूल जाते थे तुम
तुमने कहा था
अपनी किताबों में मेरा नाम लिखते थे तुम
तुमने कहा था
मेरा ज़िक्र आते ही फूल से खिल उठते थे तुम
तुमने कहा था
मेरी राहों में अक्सर पलकें बिछाये रहते थे तुम
तुमने कहा था
मुझे ख़त लिखते थे और खुद ही पढ़ते थे तुम
तुमने कहा था
अपनी हर नींदों में ख्वाब मेरे देखते थे तुम
तुमने कहा था
हर अजनबी आहट को मेरा ही आना समझते थे तुम
तुमने कहा था
हर खिलते हुए फूल में मेरा चेहरा तलाशते थे तुम
तुमने कहा था
मेरी तस्वीर लेकर शाम को छत पे खड़े रहते थे तुम
तुमने कहा था
मुझे मिल कर हमेशा खुद को भूल जाया करते थे तुम
तुमने कहा था
मेरा ख़याल दिल में आते ही "नाशाद" कहीं खो जाते थे तुम
तुमने कहा था "नाशाद"
तुमने ही कहा था
सोमवार, 11 जनवरी 2010
काश कभी मैं समझ पाता
हमारे दिल में उठती हुई लहरों को
काश कभी मैं समझ पाता
उदास होती हुई उन शामों को
लम्बी होती हुई उन रातों को
काश कभी मैं समझ पाता
अधूरी लगती हर मुलाकातों को
होठों पर रूकती हुई उन बातों को
काश कभी मैं समझ पाता
हमारे दिल में बढती हुई उस घबराहट को
मुलाकातों के लिए बढती हुई चाहतों को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी आँखों में बरसते सावन को
हर चेहरे में तुम्हारी तलाश को
काश कभी मैं समझ पाता
हर बात में तुम्हारे उस रूठ जाने को
मेरे मनाते ही तुम्हारे मान जाने को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी किताबों में लिखे मेरे नामों को
तुम तक ना पहुंचे मेरे उन पयामों को
काश कभी मैं समझ पाता
हमारी मुलाकातों पर उठती उंगलीयों को
मुझ पर हंसती तुम्हारी उन सहेलीयों को
काश कभी मैं समझ पाता
तुम्हारी गलियों की तरफ बढ़ते हमारे कदमों को
सुनते ही हमारा नाम तुम्हारा शरमाने को
काश कभी मैं समझ पाता
अलसाई हुई उन दोपहरों को
जलती हुई बरसात की बूंदों को
काश कभी मैं समझ पाता
अंतिम मिलन पर हमारी आँखों के सावन को
जो हम ना कह सके उन सभी बातों को
काश कभी मैं समझ पाता
काश कभी मैं समझ पाता
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
कोई देख रहा है
अब भी संग हूँ मैं तुम सबके जैसे कोई कह रहा है
जीवनपथ पर तुम कभी मत घबराना
थक कर घबराकर तुम मत रुक जाना
चलते जाना चलते जाना
मैं राह दिखलाता रहूँगा
जैसे कोई बोल रहा है
झिलमिल चाँद सितारों में से कोई हमें देख रहा है
गया वक़्त ना अब कभी लौटेगा
जो चल रहा है वो भी ना ठहरेगा
इस उलझन में तुम मत उलझ जाना
मेरे उसूलों को अपनाये रहना
कर्म अपने करते रहना
सभी को तुम अपनाये रखना
सभी को साथ लिए चलते रहना
जीत तुम्हारी ही होगी
मन में ये विश्वास कायम रखना
चुपके से कोई समझा रहा है
हौसला कोई जैसे दे रहा है
कोई हमें देख रहा है
झिलमिल चाँद सितारों में से कोई हमें देख रहा है
अब भी संग हूँ में तुम सबके जैसे कोई कह रहा है
सोमवार, 16 नवंबर 2009
लौट कर आऊँगा
अगर चला गया हूँ तो लौट कर भी आऊँगा
तुम मेरी राहों में नज़रें बिछाकर देखना
ना भूला सकोगे मुझे तुम उम्र भर
मुझे अपनी यादों में बसाकर देखना
हर दरीचे में नज़र आएगा चेहरा मेरा
हर बंद दरीचे को तुम खुलाकर देखना
जब भी खडा पाओ किसी दोराहे तुम खुद को
चला आऊँगा तुम्हें राह दिखलाने
मुझे आवाज़ लगाकर देखना
जिस्म से दूर हो गया हूँ तो क्या
रूह में तुम्हारी समां चुका हूँ मैं
हर कदम पर तुम्हारे साथ रहूँगा
हर जनम में मैं तुम्हें मिलूंगा
मेरा इंतज़ार कर के देखना
महसूस करोगे अपनी हर सांस में तुम सभी
अपने दिल की धडकनों को सुन कर देखना
फिर जनम लेंगे हम
हर जनम मिलेंगे हम
सोमवार, 2 नवंबर 2009
कोई है मेरे दिल में रहता है
अक्सर मेरा दिल मुझसे कहता है
कोई है जो मेरे दिल में रहता है
वो मेरी हर धड़कन में धड़कता है
वो मेरी हर सांस में महकता है
वो मेरी हर ख़ुशी में मुस्कुराता है
वो मेरे हर ग़म में साथ रहता है
कोई है जो मेरे दिल में रहता है
वो मेरी नींदों में सोता है
वो मेरी पलकों में सजता है
वो धुप में छाँव बना रहता है
वो मेरी बातों में बोलता है
वो साया बन मेरे साथ रहता है
वो हर दोराहे पर राह दिखाता है
वो मेरे करीब; बहुत करीब रहकर भी
वो मुझसे दूर रहता है
कोई है जो मेरे दिल में रहता है
दिल जानता है
दिल ये जानता है कि वो आपको नहीं पा सकता
फिर भी वो मानता नहीं है
कदम ये जानते हैं कि आप तक नहीं पहुँच सकते
फिर भी वे रुकते नहीं हैं
हाथ ये जानते हैं कि उनकी दुआओं में वो असर नहीं
फिर भी वे झुकते नहीं है
ऑंखें ये जानती है कि उनकी किस्मत में अब आपका नज़ारा नहीं
लेकिन वे बंद होती नहीं है
हर किसी को उसकी चाहत नहीं मिलती है
हर किसी को ग़मों से राहत नहीं मिलती नहीं है
ऐ खुदा गर ये तेरी दुनिया है
तो ऐसी दुनिया मिटती क्यों नहीं है
गर तू हर वक़्त खुश रहता है तो
हमें हमारी खुशियाँ मिलती क्यूँ नहीं है
दिल ये जानता है कि वो आपको नहीं पा सकता
फिर भी वो मानता नहीं है
कदम ये जानते हैं कि आप तक नहीं पहुँच सकते
फिर भी वे रुकते नहीं हैं
हाथ ये जानते हैं कि उनकी दुआओं में वो असर नहीं
फिर भी वे झुकते नहीं है
ऑंखें ये जानती है कि उनकी किस्मत में अब आपका नज़ारा नहीं
लेकिन वे बंद होती नहीं है
हर किसी को उसकी चाहत नहीं मिलती है
हर किसी को ग़मों से राहत नहीं मिलती नहीं है
ऐ खुदा गर ये तेरी दुनिया है
तो ऐसी दुनिया मिटती क्यों नहीं है
गर तू हर वक़्त खुश रहता है तो
हमें हमारी खुशियाँ मिलती क्यूँ नहीं है
रविवार, 1 नवंबर 2009
यादें
दबे पाँव आती है यादें
कभी सपनों में
कभी हवाओं में
कभी घटाओं में
कभी खुशबूओं में
दबे पाँव आती है यादें
वे हसीं पल
वे सुनहरे दिन
वे महफिलें
वे रौनकें
ले जाती है चुपके से हमें फिर उन दिनों में
जब भी दबे पाँव आती है यादें
अब जब कोई आरजू नहीं
अब जब कोई जुस्तजू नहीं
अब जब कोई आस नहीं
अब जब ओई मुराद नहीं
फिर भी क्यों आती आती है यादें
लेकर वो ही फरियादें
लेकर वो ही वादें
फिर लौट आओ
फिर से इस जहाँ में चले आओ
कोई तुम्हें बुलाता है
कोई आवाज़ लगता है
कोई आंसू बहाता है
कोई दुआओं में मांगता है
कोई सपनों में बुलाता है
कोई आराधना करता है
कोई साधना करता है
कोई कुछ कह रहा है
कोई इंतज़ार कर रहा है
हर रोज़ कहती है मुझे यादें
दबे पांव आती है यादें
अक्सर आती है यादें
यादें किसी की यादें
अब किस से करें फरियादें
यादें पापा की यादें
यादें पापा की यादें
मंगलवार, 4 अगस्त 2009

अब और तुम्हें क्या चाहिए
रंग गया मैं तेरे रंग में अब और तुम्हें क्या चाहिए
बसा लिया तुम्हें पलकों में अब और तुम्हें क्या चाहिए
राँझा होकर भी हीर हो गया अब और तुम्हें क्या चाहिए
तेरी याद में फ़कीर हो गया अब और तुम्हें क्या चाहिए
तेरा प्यार मेरी तकदीर हो गया अब और तुम्हें क्या चाहिए
मेरा चेहरा तेरी तस्वीर हो गया अब और तुम्हें क्या चाहिए
मेरा दिल तुम्हारा घर हो गया अब और तुम्हें क्या चाहिए
तुम्हें पाकर मैं सब हार गया अब और तुम्हें क्या चाहिए

तुम्हें भी तो मेरी याद आती होगी
सोचता हूँ कभी कभी तुम्हें भी तो मेरी याद आती होगी
जब भी तुम सड़क के उस मोड़ से गुजरती होगी
जब भी तनहाइयों में तुम ख़ुद को अकेला पाती होगी
जब भी उस बंद दरीचे को तरसती आंखों से देखती होगी
जब भी मेरे लिखे खतों को तुम दोबारा पढ़ती होगी
जब भी मेरी तस्वीर को तुम चुपके से देखती होगी
इस उम्मीद से के कभी मैं फ़िर गुजरुंगा उस मोड़ से
गली के उस मोड़ पर तुम ठिठक कर रुक जाती होगी
जब भी देखती होगी आईना ख़ुद से ही शर्मा जाती होगी
फ़िर उसी आईने में तुम्हें मेरी शक्ल दिखाई देती होगी
सोचता हूँ कभी कभी तुम्हें भी मेरी याद आती होगी
शनिवार, 1 अगस्त 2009

भूली बिसरी यादें
नज़रों में तो था मगर दिल से दूर था
वो मेरा होकर भी कभी मेरा ना था
बे चराग गलियों में उसकी आवाजें तो थी
दरीचों से झाँका मगर गलियों में कोई न था
उसके जाने के बाद दिल तो बहुत रोया
मगर आंखों में उसके एक आंसू ना था
दूर तलक फैले तो थे उसकी यादों के काले साये
मगर धूप का कहीं नाम ओ निशान तक ना था
नज़रों में तो था मगर दिल से दूर था
वो मेरा होकर भी कभी मेरा ना था
बे चराग गलियों में उसकी आवाजें तो थी
दरीचों से झाँका मगर गलियों में कोई न था
उसके जाने के बाद दिल तो बहुत रोया
मगर आंखों में उसके एक आंसू ना था
दूर तलक फैले तो थे उसकी यादों के काले साये
मगर धूप का कहीं नाम ओ निशान तक ना था
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