अपनी किताबों में मेरा नाम लिखते थे तुम
मुझे ख़त लिखते थे और खुद ही पढ़ते थे तुम
हर अजनबी आहट को मेरा ही आना समझते थे तुम
मेरी तस्वीर लेकर शाम को छत पे खड़े रहते थे तुम
मेरा ख़याल दिल में आते ही "नाशाद" कहीं खो जाते थे तुम
जिन्दगी में बहुत गम है और वक्त बहुत कम है. आइये महफ़िल सजाएं ग़ज़लों की . कविताओं की और कुछ देर के लिए ही सही हम थोडा वक्त निकालकर अपने को तरोताजा कर लें.




चल कहीं चल
चल कहीं चल जहाँ कुछ देर ताज़ा हवा चले
चल कहीं चल जहाँ ग़मों की आंधी ना चले
चल कहीं चल जहाँ खुशियों का उजाला हो
चल कहीं चल जहाँ हर किसी पर ऐतबार हो
चल कहीं चल जहाँ ज़ज्बातों की कदर हो
चल कहीं चल जहाँ बचपन खिलखिलाता हो
चल कहीं चल जहाँ लोरियां सुलाती हों
चल कहीं चल जहाँ जिंदगी की हर साँस ताज़ा हो
चल कहीं चल जहाँ इंसानों में दूरीयाँ ना हो
चल कहीं चल जहाँ रिश्तों में करीबियां हो
चल कहीं चल जहाँ जिंदगी का बसेरा हो
चल कहीं चल जहाँ मौत का सन्नाटा ना हो
चल कहीं चल जहाँ गलियां और चौबारा हो
चल कहीं चल जहाँ नदियाँ और पहाड़ हो
चल कहीं चल जहाँ खुशियाँ बुलाती हो
चल कहीं चल जहाँ उदासीयाँ मुंह छुपाती हो
चल कहीं चल जहाँ अपनों का बसेरा हो
चल कहीं चल जहाँ पुर सूकून लम्हे हो
चल कहीं चल जहाँ करब अंगेज़ उजाले हो
चल कहीं चल जहाँ मुस्कानें बुलाती हो
चल वहीँ चल नाशाद चल वहीँ चल

बचपन का गाँव
वो जो बचपन का गाँव जिसे हम कहीं दूर छोड़ आए
चलो आज फ़िर से उसी गाँव की तरफ़ चला जाए
वो जो पीपल जिसके साए में गुजरती थी हर दोपहर
चलो आज फ़िर उसी पीपल की छाँव में बैठा जाए
वो जो गाँव की गलियां जहाँ हम दौड़ा करते थे दिन भर
चलो फ़िर उन्ही गलियों में बेमतलब घूमा जाए
वो जो अमराइयाँ जिनमे हम चुराया करते थे आम हर रोज़
चलो आज फ़िर उन्ही अमराइयों की तरफ़ चला जाए
वो जो बचपन का साथी हर खेल में जिससे होता था झगडा
चलो आज चलकर उससे गले मिलकर रोया जाए
बहुत हो चुका बेदिल बदिन्तिजाम आज का शहर
चलो फ़िर लौटकर नाशाद अपने गाँव बसा जाए

अपना गलियारा
है याद मुझे वो गलियारा
वो आँगन वो चौबारा
वो घर वो गाँव
वो बा बाउजी का चेहरा
उस आँगन में बा तुम
मुझको खूब खिलाती थी
अच्छाई का सच्चाई का
मुझको पाठ सिखाती थी
सीधी सीधी बातों में तुम
मुझे सीख अच्छी दे जाती थी
हर इंसान में भगवान् है
मुझे तुम रोज़ समझाती थी
वहां सरल जीवन मैं जीता था
भोलेपन की मिटटी में दिल रहता था
गाँव की गलियों में जीवन जी रहा था
बा - बाउजी की मुस्कानों में सारा जहाँ था
फ़िर वो दिन भी आया जब दूर जाना पड़ा
सब कुछ छोड़ सब कुछ भूल दूर जाना पड़ा
बाउजी को हमेशा हमेशा के लिए खोना पड़ा
गाँव गलियां चौबारा ना जाने क्यों छोड़ना पड़ा
कुछ लम्हे फ़िर भी बाकी बिताने को मिले
बा की जिंदगी से कुछ हिस्से मुझे और मिले
कितना खुशनसीब था मैं ; मुझे तीन माँओं ने पाला था
सब कुछ पाकर भी जैसे सब कुछ मैंने खो दिया है
ना जाने मुझे आज फ़िर क्यों मेरा गाँव याद आया है
ना जाने बा बाउजी ने उसे कहाँ छुपाया है
कोई मुझे आज ये बताये मैं क्यों जीवन हूँ हारा
क्यों छूटा है मेरा वो गाँव गलियां वो चौबारा
अपने आँगन से प्यार करो ; अपने गलियारों में खेलो
खुशीयों के तीर चलाओ ; सुख की लहरों से खेलो
जो वक्त आज गुजर रहा है फ़िर ना आएगा दोबारा
तुम तरसोगे आँगन को ; खोजोगे अपना गलियारा

आराधना
पहाडों के आँचल में ; नदियों की कलकल में
पक्षियों की कलरव में ; तारों की झिलमिल में
पलकों की छाँव में ; सपनों के गाँव में
शहरों की गलियों में ; यादों के बसेरों में
फूलों की कलियों में ; सावन के झूलों में
डायरी के भरे पन्नों में ; धुंधली होती तस्वीरों में
याद आती मुलाकातों में ; भूलती हुई यादों में
कभी जो किए थे वादों में ; अटल हमारे इरादों में
किसी को तलाश है तेरी
लौट आने की आस है तेरी
तुम बिन कोई आज भी अधूरा है
सूना किसी का बसेरा है
हर जगह तुझे कोई तलाशता है
हर दुआ में तुझे कोई मांगता है
हर रोज़ तेरी आराधना करता है
हर रोज़ तेरी तलाश करता है
लोग मुझे तेरी तलाश कहते हैं
लोग तुझे मेरी आराधना कहते हैं
आज मैं तुम पर दिल हार आया
चाहे तुम मेरी चंचलता कह लो
चाहे मन की दुर्बलता कह लो
ना जाने दिल क्यूँ मजबूर हो गया
देखा तुम्हें तो सब भूल गया
अज मैं तुम पर दिल हार आया
मैं आंसू हूँ तू आँचल है
मैं प्यासा हूँ तू सावन है
तुम चाहे मुझे दीवाना कह लो
या कोई पागल मस्ताना कह लो
अपना सब कुछ मैं छोड़ आया
मैं अपनी मंजिल तक भुला आया
आज मैं तुम पर दिल हर गया
मैं दिल हूँ तुम धड़कन हो
मैं प्रीत तुम तड़पन हो
तुम चाहे मुझे प्रेम रोगी कह लो
तुम चाहे मुझे मनो रोगी कह लो
तुम्हें याद करते करते सब भूल गया
मैं अपना नाम पता सब भूल गया
आज मैं तुम पर दिल हार गया
मैं जिस्म हूँ तुम जीवन हो
मैं चेहरा हूँ तुम दर्पण हो
तुम चाहे इसे पागलपन कह लो
या इश्क का मतवालापन कह लो
अपने नाम की जगह मैं तेरा नाम बता आया
अपने घर की जगह मैं तेरा पता बता आया
आज मैं तुम पर दिल हार गया
गली गली मैं भटका हूँ
पनघट पनघट मैं तरसा हूँ
तेरी कजरारी आंखों मैं भटका हूँ
अब तुम न मुझे ठुकराना
अब तुम न मुझे तरसाना
तुम चाहे इसे पागलपन कह लो
या तुम्हारे प्रेम का पूजन कह लो
तेरी मुस्कानों पर मैं अपना होश गवां आया
तेरी मासूम अदाओं पर मैं अपना सब कुछ गवां आया
आज मैं तुम पर दिल हार गया