मंजिल मिल गई हो जैसे
वो मुझे देख रहे हैं कुछ ऐसे
उन्हें मंजिल मिल गई हो जैसे
उनकी तस्वीर लग रही है कुछ ऐसे
बस मुझसे अभी बोल पड़ेगी वो जैसे
उसने मेरा हाथ थाम लिया कुछ ऐसे
जनम जनम का हमारा साथ हो जैसे
बरसों बाद उसे देख लगा कुछ ऐसे
पहली बार ही हम मिल रहे हों जैसे
दिल में है बहुत बातें पर वो खामोश है कुछ ऐसे
ज़जीरों ने उनकी जुबां को जकड लिया हो जैसे
उनकी गलीयों की तरफ कदम बढे कुछ ऐसे
हम अपने ही घर की तरफ जा रहे हों जैसे
"नाशाद" ना आये महफिलों में तो लगे कुछ ऐसे
शाम-ए-ग़ज़ल है पर शम्मा ही ना जली हो जैसे
सोमवार, 12 अप्रैल 2010
रविवार, 11 अप्रैल 2010
वो मेरा हो जाएगा
देखना एक दिन वो भी मेरा हो जाएगा
मेरे घर का पता उसका पता हो जाएगा
आज चुरा रहा है नज़र पर देखना एक दिन
वो मुझे देखकर शरमायेगा मुस्कुराएगा
आज कर रहा है वो मुझसे नफ़रत पर देखना
मेरी याद में तड़पता फिर वो भी नजर आयेगा
इस कदर छा जाएगा मेरा भी जादू उस पर
जागती आँखों से मेरे सपने देखने लग जाएगा
चल रहा है आज वो अकेला अपने ही रास्ते पर
एक दिन शामिल वो मेरे कारवां में हो जाएगा
उसको बसा लूँगा "नाशाद" दिल में इस कदर
देखना वो हो जाएगा मैं और मैं वो हो जाऊंगा
देखना एक दिन वो भी मेरा हो जाएगा
मेरे घर का पता उसका पता हो जाएगा
आज चुरा रहा है नज़र पर देखना एक दिन
वो मुझे देखकर शरमायेगा मुस्कुराएगा
आज कर रहा है वो मुझसे नफ़रत पर देखना
मेरी याद में तड़पता फिर वो भी नजर आयेगा
इस कदर छा जाएगा मेरा भी जादू उस पर
जागती आँखों से मेरे सपने देखने लग जाएगा
चल रहा है आज वो अकेला अपने ही रास्ते पर
एक दिन शामिल वो मेरे कारवां में हो जाएगा
उसको बसा लूँगा "नाशाद" दिल में इस कदर
देखना वो हो जाएगा मैं और मैं वो हो जाऊंगा
शनिवार, 10 अप्रैल 2010
तेरी निशानीयाँ
हर तरफ फ़ैली है तेरी ही निशानीयाँ
मेर प्यार की निशानीयाँ
वो ख़त जो पहले पहल
तुमने मुझे लिखे थे
वो तस्वीरें जो मैंने चुपके से
तुमसे चुरा ली थी
वो बातें जो अक्सर तुम
मुझसे करती रहती थी
वो खुशबू जो हमेशा
तुमसे पहले आ जाती थी
वो सुकून जो तुम्हारी
एक झलक से मिलता था
वो पहला एहसास जब तुमने
मेरे बालों को छुआ था
वो यादगार लम्हा जब तुमने
मेरा प्यार कुबूला था
वो तड़प जो तेरे जाने के बाद
मुझे महसूस होती थी
वो तेरे ख्वाब जो अक्सर
मुझे रातों में आते थे
हर तरफ फ़ैली है तेरी ही निशानीयाँ
मेर प्यार की निशानीयाँ
वो ख़त जो पहले पहल
तुमने मुझे लिखे थे
वो तस्वीरें जो मैंने चुपके से
तुमसे चुरा ली थी
वो बातें जो अक्सर तुम
मुझसे करती रहती थी
वो खुशबू जो हमेशा
तुमसे पहले आ जाती थी
वो सुकून जो तुम्हारी
एक झलक से मिलता था
वो पहला एहसास जब तुमने
मेरे बालों को छुआ था
वो यादगार लम्हा जब तुमने
मेरा प्यार कुबूला था
वो तड़प जो तेरे जाने के बाद
मुझे महसूस होती थी
वो तेरे ख्वाब जो अक्सर
मुझे रातों में आते थे
हर तरफ फ़ैली है तेरी ही निशानीयाँ
मेर प्यार की निशानीयाँ
मेरे चारों ओर फ़ैली तेरी खुशबु
हर तरफ गूंजती तेरी आवाज़
तुम्हारे क़दमों की मीठी आहट
रह रहकर जैसे कह रही है
तुम अभी अभी शायद गई हो
नहीं ; नहीं
रह रहकर यह कह रही है
तुम बस अभी आनेवाली हो
बस अभी आनेवाली हो
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
अभी बाकी है
सूखे हुए उन फूलों में अभी भी खुशबूएं बाकी है
जिनमे रखे थे फूल वे किताबें खुलना अभी बाकी है
लौट आया सावन पर घटाओं का छा जाना अभी बाकी है
बरस रही है घटाएं पर तेरी जुल्फों का बिखरना अभी बाकी है
ढल गई है शाम पर तेरी यादों का आना अभी बाकी है
दिल लगा है डूबने पर अश्कों का आना अभी बाकी है
आ गई है बहारें मगर कलियों का चटकना अभी बाकी है
खिलने लगे है फूल मगर तेरा मुस्कुराना अभी बाकी है
मिल तो गई हैं राहें मगर मंजिल तक पहुंचना अभी बाकी है
आ गई तेरी गलीयाँ मगर तेरा दरीचा खुलना अभी बाकी है
थक गया है मुसाफिर मगर उम्मीदों का टूटना अभी बाकी है
ढलती जा रही है शाम मगर सूरज का डूबना अभी बाकी है
हो गए हैं ज़ख्म बहुत पुराने मगर उनका भरना अभी बाकी है
दिल में लगी है बहुत चोटें मगर उसका टूटना अभी बाकी है
तोड़ लिए हों लोगों ने नाते मगर तेरा साथ अभी बाकी है
आजमाए सभी दोस्त मगर रकीबों को आजमाना अभी बाकी है
सज संवर गईं हैं महफिलें मगर तेरा आना अभी बाकी है
पढ़ लिए सभी ने शेर मगर "नाशाद" का पढना अभी बाकी है
सूखे हुए उन फूलों में अभी भी खुशबूएं बाकी है
जिनमे रखे थे फूल वे किताबें खुलना अभी बाकी है
लौट आया सावन पर घटाओं का छा जाना अभी बाकी है
बरस रही है घटाएं पर तेरी जुल्फों का बिखरना अभी बाकी है
ढल गई है शाम पर तेरी यादों का आना अभी बाकी है
दिल लगा है डूबने पर अश्कों का आना अभी बाकी है
आ गई है बहारें मगर कलियों का चटकना अभी बाकी है
खिलने लगे है फूल मगर तेरा मुस्कुराना अभी बाकी है
मिल तो गई हैं राहें मगर मंजिल तक पहुंचना अभी बाकी है
आ गई तेरी गलीयाँ मगर तेरा दरीचा खुलना अभी बाकी है
थक गया है मुसाफिर मगर उम्मीदों का टूटना अभी बाकी है
ढलती जा रही है शाम मगर सूरज का डूबना अभी बाकी है
हो गए हैं ज़ख्म बहुत पुराने मगर उनका भरना अभी बाकी है
दिल में लगी है बहुत चोटें मगर उसका टूटना अभी बाकी है
तोड़ लिए हों लोगों ने नाते मगर तेरा साथ अभी बाकी है
आजमाए सभी दोस्त मगर रकीबों को आजमाना अभी बाकी है
सज संवर गईं हैं महफिलें मगर तेरा आना अभी बाकी है
पढ़ लिए सभी ने शेर मगर "नाशाद" का पढना अभी बाकी है
तू और ........
तेरी मुस्कान से होती है सुबहें
तेरी खुशबु को तरसती है दोपहरें
तेरे नाम से महकती है शामें
तेरी यादों से सजती है रातें
तेरे क़दमों से चलता है ज़माना
तेरी अदाओं से बदलते हैं मौसम
तेरी हया से अदब है ज़माने में
तेरी आँखों से नशा है पैमाने में
तेरे आने से सजती है महफ़िलें
तेरे इशारे से जलती है शम्में
तेरी आवाज से शायरी है जिंदा
तेरे होने से ही "नाशाद" है जिंदा
तेरी मुस्कान से होती है सुबहें
तेरी खुशबु को तरसती है दोपहरें
तेरे नाम से महकती है शामें
तेरी यादों से सजती है रातें
तेरे क़दमों से चलता है ज़माना
तेरी अदाओं से बदलते हैं मौसम
तेरी हया से अदब है ज़माने में
तेरी आँखों से नशा है पैमाने में
तेरे आने से सजती है महफ़िलें
तेरे इशारे से जलती है शम्में
तेरी आवाज से शायरी है जिंदा
तेरे होने से ही "नाशाद" है जिंदा
गुरुवार, 8 अप्रैल 2010
जिंदगी जैसी जिंदगी
वो जिंदगी ही शायद जिंदगी जैसी लगती थी
हर तरफ ख़ुशी ही ख़ुशी औ रौनकें होती थी
दिन भी थे सुहाने और रातें भी हसीन होती थी
तेरे साथ जब रहगुज़र एक खुशनुमा सफ़र थी
फरिश्तों जैसे लोग थे मौहब्बत सबके दिल में थी
नफरतें जैसे कोई किसी दूसरे जहाँ में बसती थी
तेरी खुशबू से गलीयाँ जैसे गुलज़ार रहती थी
हर महफ़िल तेरी शिरकत से रोशन रहती थी
खयाल हवाओं में उड़ते मंजिलें राहें देखती थी
जुबां खामोश रहती थी निगाहें बात करती थी
बारिशों की बूंदें संगीत स्वर लहरीयाँ लगती थी
सर्दीयों के सन्नाटों से दिलों में हूक सी उठती थी
तुम्हें देखे बगैर हमारी जिंदगी अधूरी लगती थी
नाशाद हर चेहरे में तुम्हारी सूरत ही दिखती थी
वो जिंदगी ही शायद जिंदगी जैसी लगती थी
हर तरफ ख़ुशी ही ख़ुशी औ रौनकें होती थी
दिन भी थे सुहाने और रातें भी हसीन होती थी
तेरे साथ जब रहगुज़र एक खुशनुमा सफ़र थी
फरिश्तों जैसे लोग थे मौहब्बत सबके दिल में थी
नफरतें जैसे कोई किसी दूसरे जहाँ में बसती थी
तेरी खुशबू से गलीयाँ जैसे गुलज़ार रहती थी
हर महफ़िल तेरी शिरकत से रोशन रहती थी
खयाल हवाओं में उड़ते मंजिलें राहें देखती थी
जुबां खामोश रहती थी निगाहें बात करती थी
बारिशों की बूंदें संगीत स्वर लहरीयाँ लगती थी
सर्दीयों के सन्नाटों से दिलों में हूक सी उठती थी
तुम्हें देखे बगैर हमारी जिंदगी अधूरी लगती थी
नाशाद हर चेहरे में तुम्हारी सूरत ही दिखती थी
वो मेरे होते जा रहे हैं
हालात अब हमारे बदलते नज़र आ रहे हैं
धीरे धीरे अब वो मेरे होते जा रहे है
हमें देखते ही उन्हें हम पर आता था गुस्सा
अब हमें देखकर वो धीरे से मुस्कुरा रहे हैं
उन्हें नहीं मालूम था कभी हमारे घर का पता
वो अब हमारी गलीयों की तरफ आ रहे हैं
वो हमें देखते ही कर लेते थे बंद हर दरीचा
वो खड़े अब उन्ही दरीचों में हमें निहार रहे हैं
ना करते थे वो कभी ज़िक्र अपनी महफिलों में
वहां अब वो नाशाद के शेर पढ़े जा रहे हैं
हालात अब हमारे बदलते नज़र आ रहे हैं
धीरे धीरे अब वो मेरे होते जा रहे है
हमें देखते ही उन्हें हम पर आता था गुस्सा
अब हमें देखकर वो धीरे से मुस्कुरा रहे हैं
उन्हें नहीं मालूम था कभी हमारे घर का पता
वो अब हमारी गलीयों की तरफ आ रहे हैं
वो हमें देखते ही कर लेते थे बंद हर दरीचा
वो खड़े अब उन्ही दरीचों में हमें निहार रहे हैं
ना करते थे वो कभी ज़िक्र अपनी महफिलों में
वहां अब वो नाशाद के शेर पढ़े जा रहे हैं
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में उडती जा रही हूँ मैं
सपनों में खोती जा रही हूँ मैं
एक कदम यहाँ तो
एक कदम वहां जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दिल में उठ रही ये कैसी उमंग है
बदन में दौड़ रही ये कैसी तरंग है
मेरे हाथों से आँचल क्यूँ
आज फिसल फिसल जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दूर कहीं दूर जाने को जी चाहता है
सब कुछ भुलाने को जी चाहता है
ना जाने क्यूँ मेरा दिल
संभले फिर बहक बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में ना जाने ये कैसी महक है
नजारों में ना जाने ये कैसी चमक है
यूँ ना मुस्कुराओ तुम
कदम ना कहीं बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
इन राहों में ना अकेली छोड़ जाना
दूर बहुत दूर अब हमसे है ज़माना
ना जाने क्यूँ मेरा दिल आज
रह रह कर घबराये
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में उडती जा रही हूँ मैं
सपनों में खोती जा रही हूँ मैं
एक कदम यहाँ तो
एक कदम वहां जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दिल में उठ रही ये कैसी उमंग है
बदन में दौड़ रही ये कैसी तरंग है
मेरे हाथों से आँचल क्यूँ
आज फिसल फिसल जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
दूर कहीं दूर जाने को जी चाहता है
सब कुछ भुलाने को जी चाहता है
ना जाने क्यूँ मेरा दिल
संभले फिर बहक बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
हवाओं में ना जाने ये कैसी महक है
नजारों में ना जाने ये कैसी चमक है
यूँ ना मुस्कुराओ तुम
कदम ना कहीं बहक जाए
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
इन राहों में ना अकेली छोड़ जाना
दूर बहुत दूर अब हमसे है ज़माना
ना जाने क्यूँ मेरा दिल आज
रह रह कर घबराये
ये तुम मुझे कहाँ ले आये
बचपन कहीं खो ना जाये
किताबों के भारी बोझ तले
किताबों के भारी बोझ तले
ऊंचे ख्वाबों के दबाव तले
ये मासूम कहीं दब ना जाये
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
तुम्हें अव्वल ही आना है
नहीं किसी से पीछे रहना है
हर माँ-बाप का यही कहना है
माँ-बापों की इन इच्छाओं से
ये मासूम कहीं सहम ना जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
सबसे ऊंचा हो ओहदा तुम्हारा
सामान्य जीवन नहीं पालकों को गंवारा
ढेर सा पैसा मोटर गाडी और एक बंगला न्यारा
चाहतों की इस ऊंची दौड़ में
ये मासूम कहीं जीना ना भूल जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाए
खिलौने कम होते जा रहे
मैदानी खेल लुप्त होते जा रहे
मैदान घरों में बदलते जा रहे
किस्से कहानियों से बढ़ती दूरी से
ये बचपन से कहीं दूर ना हो जाए
इनका बचपन कहीं खो ना जाये
आओ हम इनका बचपन बचाएं
इनके चेहरे की मुस्कान लौटाएं
इनके चेहरे की मासूमियत लौटाएं
हम ही इनके दोस्त बन जाए
संग इनके साबुन के बुलबुले उड़ायें
आसमानों में ऊंची पतंगे उड़ायें
संग इनके खेलें हम भी बचपन में लौट जाएँ
इनको फिर से जीना सीखाएं
इनको फिर से इनका बचपन लौटाएं
इनको फिर से इनका बचपन लौटाएं
इनका बचपन कहीं खो ना जाएँ
सोमवार, 5 अप्रैल 2010
रविवार, 4 अप्रैल 2010
हमसाया
तुम्हारी आँखों में अपना मुकद्दर देखा है मैंने
तेरे चेहरे में जैसे कोई अपना ही देखा है मैंने
मंजिल को अक्सर बहुर दूर देखा है मैंने
साथ तेरे चल कर उसे करीब पाया है मैंने
जब भी सामने आये हो तो अक्सर ये सोचा है मैंने
जागती आँखों से जैसे कोई ख्वाब सा देखा है मैंने
गम-ए-दौरां में खुद को तनहा पाया हो मैंने
साथ तेरा पाकर ज़माना साथ पाया है मैंने
अक्सर खुद से जुदा सा अपना साया पाया है मैंने
साथ जब से हुए हो तुम में ही हमसाया पाया है मैंने
तुम्हारी आँखों में अपना मुकद्दर देखा है मैंने
तेरे चेहरे में जैसे कोई अपना ही देखा है मैंने
मंजिल को अक्सर बहुर दूर देखा है मैंने
साथ तेरे चल कर उसे करीब पाया है मैंने
जब भी सामने आये हो तो अक्सर ये सोचा है मैंने
जागती आँखों से जैसे कोई ख्वाब सा देखा है मैंने
गम-ए-दौरां में खुद को तनहा पाया हो मैंने
साथ तेरा पाकर ज़माना साथ पाया है मैंने
अक्सर खुद से जुदा सा अपना साया पाया है मैंने
साथ जब से हुए हो तुम में ही हमसाया पाया है मैंने
शनिवार, 3 अप्रैल 2010
हिज्र के दिन
जिनकी तस्वीर थी निगाहों में
उन्हें देखा सिर्फ हमने ख़्वाबों में
ना मिलूँगा अब मैं तुझे खजानों में
गर चाहता है तो ढूंढ खराबों में
ना जंगल में मिले ना ही बागों में
वे सूखे फूल जो रखे थे किताबों में
दरिया में रहकर भी हम रहे प्यासे
अब ढूंढते हैं हम आब सराबों में
शबो- रोजो- माहो-साल इसके आगे क्या गिनुं
तेरे हिज्र के दिनों की गिनती नहीं हिसाबों में
तुझसे मिलूं या बिछुड़ जाऊं हमेशा के लिए
गुज़र गई जिंदगी "नाशाद" इसी दोराहे में
जिनकी तस्वीर थी निगाहों में
उन्हें देखा सिर्फ हमने ख़्वाबों में
ना मिलूँगा अब मैं तुझे खजानों में
गर चाहता है तो ढूंढ खराबों में
ना जंगल में मिले ना ही बागों में
वे सूखे फूल जो रखे थे किताबों में
दरिया में रहकर भी हम रहे प्यासे
अब ढूंढते हैं हम आब सराबों में
शबो- रोजो- माहो-साल इसके आगे क्या गिनुं
तेरे हिज्र के दिनों की गिनती नहीं हिसाबों में
तुझसे मिलूं या बिछुड़ जाऊं हमेशा के लिए
गुज़र गई जिंदगी "नाशाद" इसी दोराहे में
खुदा को भी ले आऊँ
जिंदगी का ये गीत मैं यूहीं गाता चला जाऊं
हर किसी को मैं बस खुश रखता चला जाऊं
गर पड़े कभी पीना किसी दिन कोई ज़हर
बन के नीलकंठ मैं वो ज़हर भी पी जाऊं
गर मिले सभी को कोई भी तरह की सज़ा
बन के राम मैं हँसते हुए वनवास चला जाऊं
गर बरसे कोई आफत सब पर आसमानों से
बन के कृष्ण मैं अपने ऊपर गोवर्धन उठा जाऊं
ना आने दूं कोई भी ग़म मेरे अपनों की तरफ
हर ग़म को हँसते हुए गले लगाता चला जाऊं
गर दे दे खुदा मुझे किसी दिन अपनी जादूगरी
जो भी बिछुड़े हैं हमसे मैं उन्हें फिर लौटा लाऊँ
बाँध लूं मैं खुद को रिश्तों की ऐसी जंजीरों में
गर बुलाए खुदा भी तो मैं उसके पास ना जाऊं
सब को रख लूं एक बनाकर ज़हान को बना दूं मैं ज़न्नत
फिर एक दिन "नाशाद" जाकर खुदा को भी यहाँ ले आऊँ
दूर पिया का गाँव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
सावन की ऋतू जब जब है आई
डसी है दिल को और भी तन्हाई
पिया क्या कभी मेरी याद ना आई
आने में फिर काहे इतनी देर लगाईं
ठहर सा गया जैसे मन का बहाव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
जब से गए है मेरे पिया परदेस
ना कोई चिट्ठी ना कोई सन्देश
कुछ तो खबर दो कब आओगे
इस बिरहन को कितना तड़पाओगे
जीवन में जैसे आ गया कोई ठहराव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
क्या युहीं गुज़रेगी अब सारी उमरिया
ना दिन होंगे सुहाने और ना ही रतियाँ
ताना मारती है अब तो सारी सखियाँ
दिल का गया करार और आँखों से निंदिया
आ जाओ पिया जीवन में बढ़ रहा उलझाव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
सावन की ऋतू जब जब है आई
डसी है दिल को और भी तन्हाई
पिया क्या कभी मेरी याद ना आई
आने में फिर काहे इतनी देर लगाईं
ठहर सा गया जैसे मन का बहाव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
जब से गए है मेरे पिया परदेस
ना कोई चिट्ठी ना कोई सन्देश
कुछ तो खबर दो कब आओगे
इस बिरहन को कितना तड़पाओगे
जीवन में जैसे आ गया कोई ठहराव है
दूर बहुत दूर मेरे पिया का गाँव है
क्या युहीं गुज़रेगी अब सारी उमरिया
ना दिन होंगे सुहाने और ना ही रतियाँ
ताना मारती है अब तो सारी सखियाँ
दिल का गया करार और आँखों से निंदिया
आ जाओ पिया जीवन में बढ़ रहा उलझाव है
दूर बहुत दूर सखि मेरे पिया का गाँव है
राह में ना कोई पनघट ना पीपल की छाँव है
शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम थी तो सब रौनक थी
ये दुनिया जैसे कोई जन्नत थी
तुम बिन अब कुछ रास ना आए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम्हारी एक मुस्कान से जैसे
सारा जहाँ खिल उठता था
तुम्हारी आँखों की चमक से जैसे
मेरी राहें रोशन रहती थी
मंजिल लगने लगी है अब दूर
तुम बिन एक कदम भी ना चला जाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
हवाएं तुम्हारे इशारे पर बहती थी
कलियाँ तुम्हें देख खिलती थी
कोयल तुम्हारे संग गाती थी
तुम क्या गई गुलशन से जैसे
बहारे भी अब रूठ गई
तुम नहीं तो जीवन में मेरे
अब कौन बहारें लाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
फागुन अब फिर से आने को है
बौछारें अब रंगों की फिर उड़ने को है
हर प्रीतम के गालों पर
लाल हरा कोई रंग लगाएगा
लेकिन फागुन के दिन साथी
अब मेरा मन बहुत तरसेगा
तुम बिन कौन अब मेरी दुनिया में
फिर से रंग भरे और बरसाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम थी तो सब रौनक थी
ये दुनिया जैसे कोई जन्नत थी
तुम बिन अब कुछ रास ना आए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
तुम्हारी एक मुस्कान से जैसे
सारा जहाँ खिल उठता था
तुम्हारी आँखों की चमक से जैसे
मेरी राहें रोशन रहती थी
मंजिल लगने लगी है अब दूर
तुम बिन एक कदम भी ना चला जाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
हवाएं तुम्हारे इशारे पर बहती थी
कलियाँ तुम्हें देख खिलती थी
कोयल तुम्हारे संग गाती थी
तुम क्या गई गुलशन से जैसे
बहारे भी अब रूठ गई
तुम नहीं तो जीवन में मेरे
अब कौन बहारें लाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
फागुन अब फिर से आने को है
बौछारें अब रंगों की फिर उड़ने को है
हर प्रीतम के गालों पर
लाल हरा कोई रंग लगाएगा
लेकिन फागुन के दिन साथी
अब मेरा मन बहुत तरसेगा
तुम बिन कौन अब मेरी दुनिया में
फिर से रंग भरे और बरसाए
कैसे कोई तुम्हें भुलाए
अब मैं जीना सीख गया हूँ
मैं अपनी धुन में रहता था
जो दिल चाहे वो करता था
मैं नहीं किसी की सुनता था
मैं यहाँ वहां भटकता था
सभी कहते थे कि मैं आवारा हूँ
जिसे कुछ ना मिला वो बेचारा हूँ
खुद अपनी किस्मत का मारा हूँ
नहीं किसी काम का मैं नाकारा हूँ
तुम क्या आई मेरे जीवन में
तुमने मुझे बदल डाला
प्रेम के दो घूँट पिला कर तुमने
बन दिया मुझे प्रेम मतवाला
अब मैं सब कुछ भूल गया हूँ
तेरी आँखों की झील में डूब गया हूँ
अब मैं तुम में खोया रहता हूँ
अब तेरी बातें ही सुनता हूँ
तेरी गलीयों में ही भटकता हूँ
तेरे ही सपने देखता हूँ
कहते हैं ये लोग सभी
मैं पहले भी आवारा था
और अब भी आवारा हूँ
मैं तेरे इश्क का मारा हूँ
मैं किसी का आशिक हूँ
और इसलिए नाकारा हूँ
अब दुनिया को कैसे समझाऊँ
अब लोगों को मैं क्या समझाऊँ
कैसे कहूँ मैं आवारा नहीं
कैसे कहूँ मैं नाकारा नहीं
मैं कितना अब बदल गया हूँ
मैं यहाँ वहां की बातें भूल गया हूँ
अब मैं संभालना सीख गया हूँ
किसी को अपना बनाना सीख गया हूँ
हर सांस को जीना सीख गया हूँ
मैं प्रेम करना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ
मैं अब जीना सीख गया हूँ
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
किसी ने भुला दिया है मुझे
शायद किसी ने भुला दिया है आजकल मुझे
तभी तो आती नहीं हिचकियाँ आजकल मुझे
शायद कोई नहीं पुकारता है नींदों में अब मुझे
तभी तो आते नहीं है किसी के ख्वाब अब मुझे
शायद कोई नहीं पढ़ता है अब मेरे लिखे ख़त
तभी तो नामावर नहीं मुस्कुराता है अब देख मुझे
शायद कोई नहीं करता है मेरा ज़िक्र अब कहीं
तभी तो नहीं सुनाता कोई नया अफसाना मुझे
शायद नहीं करता है अब कोई राहों में मेरा इंतज़ार
तभी तो मंजिल नहीं नज़र आती अब करीब मुझे
शायद नहीं पढता है कोई मेरे लिखे शेर महफिलों में
तभी तो "नाशाद" वहां रौनक नहीं नज़र आती मुझे
शायद किसी ने भुला दिया है आजकल मुझे
तभी तो आती नहीं हिचकियाँ आजकल मुझे
शायद कोई नहीं पुकारता है नींदों में अब मुझे
तभी तो आते नहीं है किसी के ख्वाब अब मुझे
शायद कोई नहीं पढ़ता है अब मेरे लिखे ख़त
तभी तो नामावर नहीं मुस्कुराता है अब देख मुझे
शायद कोई नहीं करता है मेरा ज़िक्र अब कहीं
तभी तो नहीं सुनाता कोई नया अफसाना मुझे
शायद नहीं करता है अब कोई राहों में मेरा इंतज़ार
तभी तो मंजिल नहीं नज़र आती अब करीब मुझे
शायद नहीं पढता है कोई मेरे लिखे शेर महफिलों में
तभी तो "नाशाद" वहां रौनक नहीं नज़र आती मुझे
बुधवार, 31 मार्च 2010
तुम्हें पहचान लेता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुमने किया है चुपके से याद मुझे
चमकते चाँद से जान लेता हूँ
मेरी तस्वीर को अकेले में छुआ है तुमने
अपनी बढती धड़कन से जान लेता हूँ
शरमा रही हो मन ही मन में
लचकती डालीयों से जान लेता हूँ
दबे होठों से लिया है तुमने मेरा नाम
हवाओं की खुशबू से जान लेता हूँ
मैंने तुमसे किया है प्यार
मैं तुम पर अपनी जान देता हूँ
खुदा ने तुम सा कोई और ना बनाया
मैं उसे अपना सलाम देता हूँ
हर आशिक अपनी महबूबा को दे तुम्हारा नाम
मैं आज ये ऐलान करता हूँ
मेरा दिल, मेरा प्यार , मेरी हर आरज़ू
आज मैं तुम्हारे नाम करता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
तुमने किया है चुपके से याद मुझे
चमकते चाँद से जान लेता हूँ
मेरी तस्वीर को अकेले में छुआ है तुमने
अपनी बढती धड़कन से जान लेता हूँ
शरमा रही हो मन ही मन में
लचकती डालीयों से जान लेता हूँ
दबे होठों से लिया है तुमने मेरा नाम
हवाओं की खुशबू से जान लेता हूँ
मैंने तुमसे किया है प्यार
मैं तुम पर अपनी जान देता हूँ
खुदा ने तुम सा कोई और ना बनाया
मैं उसे अपना सलाम देता हूँ
हर आशिक अपनी महबूबा को दे तुम्हारा नाम
मैं आज ये ऐलान करता हूँ
मेरा दिल, मेरा प्यार , मेरी हर आरज़ू
आज मैं तुम्हारे नाम करता हूँ
चन्दन सी महक है तुम्हारी
मैं दूर से ही जान लेता हूँ
कदमों की आहट से तुम्हारी
मैं तुम्हें पहचान लेता हूँ
मंगलवार, 30 मार्च 2010
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
मैं ऐसी भाव-विव्हल हो गई कि
आँखें मेरी सजल हो गई
जाने कितने ही सावन आये
संग अपने तेरी यादें ले लाये
घने बादल फिर खूब बरसाए
पर ऐसी बरसात कभी ना हुई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम्हे खोजा मैंने सितारों में
तुम्हे पुकारा मैंने यादों में
करते करते याद तुम्हे प्रियतम
मैं ना जाने जैसे कहीं खो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
अब ना कभी तुम होना दूर
मेरे ही सामने अब रहना तुम
मुझे जो भी ख़त लिखे थे तुमने
मेरे लिए जैसे वो ही ग़ज़ल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
मैं ऐसी भाव-विव्हल हो गई कि
आँखें मेरी सजल हो गई
जाने कितने ही सावन आये
संग अपने तेरी यादें ले लाये
घने बादल फिर खूब बरसाए
पर ऐसी बरसात कभी ना हुई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम्हे खोजा मैंने सितारों में
तुम्हे पुकारा मैंने यादों में
करते करते याद तुम्हे प्रियतम
मैं ना जाने जैसे कहीं खो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
अब ना कभी तुम होना दूर
मेरे ही सामने अब रहना तुम
मुझे जो भी ख़त लिखे थे तुमने
मेरे लिए जैसे वो ही ग़ज़ल हो गई
तुम क्या सामने आये प्रियतम
आँखें मेरी सजल हो गई
तुम बिन रहा ना जाए
ढल गई है शाम अब
पंछी भी घर लौट आये
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारे वादे पर मैं जी रही हूँ
तुम्हारे नाम की साँसें ले रही हूँ
बहुत दूर है गाँव तुम्हारा
अब एक कदम भी चला ना जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारी राहों में फूल बिछाए बैठी हूँ
तुम्हारी यादों के दिए जलाये बैठी हूँ
बहारों के मौसम भी है अब आनेवाले
फिर से चलने लगी है पुरकेंफ़ हवाएं
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
अब ना कभी मैं तुम्हें दूर जाने दूँगी
कैसी भी हो राहें संग तुम्हारे चलूंगी
फिर से छाएंगे बादल और बरसेंगी बरखा
इस बार भी सावन कहीं सूखा ना चला जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
ढल गई है शाम अब
पंछी भी घर लौट आये
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारे वादे पर मैं जी रही हूँ
तुम्हारे नाम की साँसें ले रही हूँ
बहुत दूर है गाँव तुम्हारा
अब एक कदम भी चला ना जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
तुम्हारी राहों में फूल बिछाए बैठी हूँ
तुम्हारी यादों के दिए जलाये बैठी हूँ
बहारों के मौसम भी है अब आनेवाले
फिर से चलने लगी है पुरकेंफ़ हवाएं
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
अब ना कभी मैं तुम्हें दूर जाने दूँगी
कैसी भी हो राहें संग तुम्हारे चलूंगी
फिर से छाएंगे बादल और बरसेंगी बरखा
इस बार भी सावन कहीं सूखा ना चला जाए
लौट आओ तुम भी सजना
अब तुम बिन रहा ना जाए
सोमवार, 29 मार्च 2010
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
जो इस तरह मेरे दिल में समां गए हो
जो इस तरह मेरी दुनिया बदल गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरी साँसों को महका गए हो
जो मेरी आँखों में आकर बस गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरे होठों को एक नई मुस्कान दे गए हो
जो मेरे गालों की लालिमा को और बढा गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो फागुन के रंगों को और भी रंगीन कर गए हो
जो पतझड़ में भी हर तरफ बहारें लेकर आये हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मुझे अब हर तरफ नज़र आने लगे हो
जो मुझे ख्वाबों में भी आकर सताने लगे हो
ना जाने तुम कौन हो
जो अब मुझ को मुझ ही से छीन रहे हो
जो ना जाने किस बंधन में मुझे बाँध रहे हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
जो इस तरह मेरे दिल में समां गए हो
जो इस तरह मेरी दुनिया बदल गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरी साँसों को महका गए हो
जो मेरी आँखों में आकर बस गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मेरे होठों को एक नई मुस्कान दे गए हो
जो मेरे गालों की लालिमा को और बढा गए हो
ना जाने तुम कौन हो
जो फागुन के रंगों को और भी रंगीन कर गए हो
जो पतझड़ में भी हर तरफ बहारें लेकर आये हो
ना जाने तुम कौन हो
जो मुझे अब हर तरफ नज़र आने लगे हो
जो मुझे ख्वाबों में भी आकर सताने लगे हो
ना जाने तुम कौन हो
जो अब मुझ को मुझ ही से छीन रहे हो
जो ना जाने किस बंधन में मुझे बाँध रहे हो
ना जाने तुम कौन हो
ना जाने तुम कौन हो
कजरारी आँखों वाली लडकी
वो कजरारी आँखों वाली लड़की
अब भी मुझे याद आती है
उसकी कभी ना ख़त्म होनेवाली बातें
अब भी मुझे याद आती है
मैं चाहे सुनूँ ना सुनूँ
वो अपनी हर बात बताती थी
मैं चाहे मानूँ ना मानूँ
वो हर बात पर सलाह देती थी
मैं जब भी छत पर पढने जाता था
वो कंकर फेंक कर सताती थी
मैं जब भी गहरी सोच में होता था
उसे मेरी चिंता सताती थी
जब भी मेरे इम्तिहान नज़दीक आते थे
वो मेरे लिए रोज़ दुआएं मांगती थी
जब भी देखती थी मेरा खिला चेहरा
उसके चेहरे पर भी चमक आ जाती थी
जब मैं वापस लौट रहा था
उसका चेहरा मुरझाया हुआ था
उसकी कजरारी आँखें नाम थी
उसके कदम लडखडा रहे थे
वो कुछ कहना चाह रही थी
मगर उसकी बेहिसाब सिसकीयाँ
उसे शायद रोक रही थी
मैं वापस घर लौट आया
मगर आज तक उसे भुला नहीं पाया
उसकी सिसकीयाँ आज भी मुझे सुनाई देती है
उसकी आवाज़ आज भी मुझे सुनाई देती है
उसकी हंसी मुझे हर वक़्त सुकून देती थी
उसकी बातें मुझमे नया जोश भर देती थी
मैं उसे शायद समझ नहीं पाया
मैं उसकी आँखों को पढ़ नहीं पाया
उसके दिल की बात जान नहीं पाया
वो क्यों मुझे देख खुश हो जाती थी
वो क्यों मेरे लिए दुआएं मांगती थी
वो क्यों मेरी हर ख़ुशी में शामिल हो जाती थी
कहते हैं मोहल्ले के लोग
वो मुझसे प्यार करती थी
मुझसे बे इन्तेहा मौहब्बत करती थी
आज लग रहा है मुझे
वो शायद मुझसे प्यार करती थी
हाँ वो मुझसे प्यार करती थी
वो कजरारी आँखों वाली लड़की
मुझसे प्यार करती थी
रविवार, 28 मार्च 2010
वो शायद दीवाना था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
अक्सर मेरी गलीयों में
वो बेमतलब घूमा करता था
देखकर मुझे दरीचे में खड़ा
वो अक्सर मुस्कुराया करता था
शाम को छत पर आकर वो
मेरा नाम लिखी पतंगे उड़ाता था
ना जाने खाली सफहों पर
कुछ लिखता और खुद ही पढ़कर
मन ही मन जैसे शरमाया करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मुझसे मिलने की वो
अक्सर कोशिश करता था
पर मेरे सामने आते ही वो
ना जाने कहाँ छुप जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मैं उसकी हर बात पर
हंस कर रह जाया करती थी
मेरे हंसने पर वो ना जाने क्यों
कुछ खोया खोया सा हो जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
एक अरसा बीत गया
वो अब दिखाई नहीं देता
मैं उसे अक्सर याद करती हूँ
ना जाने वो कहाँ खो गया
अक्सर उसकी बातें और
वे छोटी मुलाकातें याद करती हूँ
उसका वो मासूम चेहरा
अब भी मेरी आँखों में रहता है
कहती है मेरी सब सहेलीयां
वो मुझसे प्यार करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
लेकिन ना जाने वो क्यों
कुछ भी कहने से डरता था
अब अक्सर सोचती रहती हूँ
वो ऐसा क्यों करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
अक्सर मेरी गलीयों में
वो बेमतलब घूमा करता था
देखकर मुझे दरीचे में खड़ा
वो अक्सर मुस्कुराया करता था
शाम को छत पर आकर वो
मेरा नाम लिखी पतंगे उड़ाता था
ना जाने खाली सफहों पर
कुछ लिखता और खुद ही पढ़कर
मन ही मन जैसे शरमाया करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मुझसे मिलने की वो
अक्सर कोशिश करता था
पर मेरे सामने आते ही वो
ना जाने कहाँ छुप जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
मैं उसकी हर बात पर
हंस कर रह जाया करती थी
मेरे हंसने पर वो ना जाने क्यों
कुछ खोया खोया सा हो जाता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
एक अरसा बीत गया
वो अब दिखाई नहीं देता
मैं उसे अक्सर याद करती हूँ
ना जाने वो कहाँ खो गया
अक्सर उसकी बातें और
वे छोटी मुलाकातें याद करती हूँ
उसका वो मासूम चेहरा
अब भी मेरी आँखों में रहता है
कहती है मेरी सब सहेलीयां
वो मुझसे प्यार करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
लेकिन ना जाने वो क्यों
कुछ भी कहने से डरता था
अब अक्सर सोचती रहती हूँ
वो ऐसा क्यों करता था
वो एक पागल लड़का
जो शायद दीवाना था
शनिवार, 27 मार्च 2010
तेरा चेहरा नज़र आता है
जब भी देखता हूँ मैं आईना
मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
मेरी मुस्कान में सनम अब
मुझे तेरा प्यार नज़र आता है
कोई भी लेता हूँ जब मैं नाम
तेरा ही नाम जुबां पर आता है
जिस गली से भी गुजरूँ मैं
मुझे तेरा ही घर नज़र आता है
जब भी किसी से करता हूँ बातें
मुझे तेरी आवाज़ सुने देती है
जब भी खनकती है कोई पायल
मुझे तेरी आहट सुनाई देती है
जब भी शाम को जाता हूँ छत पर
मुझे अपनी मुलाकातें याद आती है
जब भी झूम के बरसता है सावन
मुझे हमारी मोहब्बत याद आती है
जब भी पढता हूँ तेरे लिखे ख़त
मुझे उनमे से तेरी खुशबू आती है
देखता हूँ मैं जब भी तेरी तस्वीर
मुझे मेरा चेहरा नज़र आता है
जब भी देखता हूँ मैं आईना
मुझे तेरा चेहरा नज़र आता है
मेरी मुस्कान में सनम अब
मुझे तेरा प्यार नज़र आता है
कोई भी लेता हूँ जब मैं नाम
तेरा ही नाम जुबां पर आता है
जिस गली से भी गुजरूँ मैं
मुझे तेरा ही घर नज़र आता है
जब भी किसी से करता हूँ बातें
मुझे तेरी आवाज़ सुने देती है
जब भी खनकती है कोई पायल
मुझे तेरी आहट सुनाई देती है
जब भी शाम को जाता हूँ छत पर
मुझे अपनी मुलाकातें याद आती है
जब भी झूम के बरसता है सावन
मुझे हमारी मोहब्बत याद आती है
जब भी पढता हूँ तेरे लिखे ख़त
मुझे उनमे से तेरी खुशबू आती है
देखता हूँ मैं जब भी तेरी तस्वीर
मुझे मेरा चेहरा नज़र आता है
शुक्रवार, 26 मार्च 2010
भूल ना जाना
पीपल की छाँव को
बचपन के गाँव को
सावन के झूलों को
कागज़ की नांव को
भूल ना जाना
बाबा की डांट को
मां की लोरीयों को
दादा की सीख को
दादी की दुलार को
भूल ना जाना
धुल उड़ाती गलीयों को
फूलों पर बैठी तितलीयों को
खेतों में लहराती फसलों को
पनघट पर बतियाती सखियों को
भूल ना जाना
बचपन के यारों को
मुस्कुराते दरीचों को
अपनों की महफ़िलों को
सपनों की दुनिया को
भूल ना जाना
शहर की भीड़ - भाड़ में
दौलत पाने की चाह में
रोज़ नई मंजिल की तलाश में
पुरानी सुहानी यादों को
भूल ना जाना
लोगों की भीड़ में कहीं खो ना जाना
खुद को ही कहीं भूल ना जाना
अपनों से दूर नहीं हो जाना
घर लौट आने की राह भूल ना जाना
" नाशाद " कहीं भटक ना जाना
जिंदगी को कहीं भूल ना जाना
पीपल की छाँव को
बचपन के गाँव को
सावन के झूलों को
कागज़ की नांव को
भूल ना जाना
बाबा की डांट को
मां की लोरीयों को
दादा की सीख को
दादी की दुलार को
भूल ना जाना
धुल उड़ाती गलीयों को
फूलों पर बैठी तितलीयों को
खेतों में लहराती फसलों को
पनघट पर बतियाती सखियों को
भूल ना जाना
बचपन के यारों को
मुस्कुराते दरीचों को
अपनों की महफ़िलों को
सपनों की दुनिया को
भूल ना जाना
शहर की भीड़ - भाड़ में
दौलत पाने की चाह में
रोज़ नई मंजिल की तलाश में
पुरानी सुहानी यादों को
भूल ना जाना
लोगों की भीड़ में कहीं खो ना जाना
खुद को ही कहीं भूल ना जाना
अपनों से दूर नहीं हो जाना
घर लौट आने की राह भूल ना जाना
" नाशाद " कहीं भटक ना जाना
जिंदगी को कहीं भूल ना जाना
बुधवार, 24 मार्च 2010
ये ना जाने कोई
कितना लम्बा ये सफ़र है
ये ना जाने कोई
कहाँ तक अब ये डगर है
ये ना जाने कोई
कौन देखेगा कल की सहर
ये ना जाने कोई
किसकी है ये आखिरी शब
ये ना जाने कोई
कब तक हवाएं साथ है
ये ना जाने कोई
कब तक सूरज में आग है
ये ना जाने कोई
कब तक चाँद में शीतलता है
ये ना जाने कोई
कब तक सितारों का कारवाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक कदमों की चाल है
ये ना जाने कोई
कब तक सभी को ये आस है
ये ना जाने कोई
कब तक हम यहाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक ये जहां है
ये ना जाने कोई
कब तक दुआओं में असर है
ये ना जाने कोई
कब तक उसकी हम पर नज़र है
ये ना जाने कोई
कितना लम्बा ये सफ़र है
ये ना जाने कोई
कहाँ तक अब ये डगर है
ये ना जाने कोई
कौन देखेगा कल की सहर
ये ना जाने कोई
किसकी है ये आखिरी शब
ये ना जाने कोई
कब तक हवाएं साथ है
ये ना जाने कोई
कब तक सूरज में आग है
ये ना जाने कोई
कब तक चाँद में शीतलता है
ये ना जाने कोई
कब तक सितारों का कारवाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक कदमों की चाल है
ये ना जाने कोई
कब तक सभी को ये आस है
ये ना जाने कोई
कब तक हम यहाँ है
ये ना जाने कोई
कब तक ये जहां है
ये ना जाने कोई
कब तक दुआओं में असर है
ये ना जाने कोई
कब तक उसकी हम पर नज़र है
ये ना जाने कोई
तू क्यों मौन है
मैंने सुना था तू
हम सब को बनाता है
हम सब को तारता है
हम सब को पालता है
हम सब को खुश रखता है
हम सब का अन्नदाता है
हम सब का घर बसाता है
हम सब के दुःख दूर करता है
हम सब के बिगड़े काम बनाता है
हम सब की राहें आसान करता है
हम सब को भवसागर पार कराता है
पर अक्सर मैंने
लोगों को भूख से तड़पते देखा है
लोगों को खून के आंसू बहाते देखा है
लोगों के घर उजड़ते देखा है
लोगों को खाली पेट सोते देखा है
लोगों को रोते बिलखते देखा है
लोगों को ग़मों के समंदर में डूबते देखा है
लोगों को टूटते बिखरते देखा है
लोगों को राहों में भटकते बिछुड़ते देखा है
लोगों को बिना कारण मरते देखा है
लोगों को अपनों के लिए तरसते देखा है
लोगों को छोटी सी ख़ुशी के लिए तरसते देखा है
ये मैंने तेरा कैसा संसार देखा है
क्या सभी की किस्मत में तूने यही सब लिखा है
क्या सचमुच ये संसार तेरी ही देन है
क्या सभी जिंदगी जैसे लम्बी काली रैन है
मेरे इन सवालों पर तू क्यों मौन है
बता तू क्यों मौन है
मैंने सुना था तू
हम सब को बनाता है
हम सब को तारता है
हम सब को पालता है
हम सब को खुश रखता है
हम सब का अन्नदाता है
हम सब का घर बसाता है
हम सब के दुःख दूर करता है
हम सब के बिगड़े काम बनाता है
हम सब की राहें आसान करता है
हम सब को भवसागर पार कराता है
पर अक्सर मैंने
लोगों को भूख से तड़पते देखा है
लोगों को खून के आंसू बहाते देखा है
लोगों के घर उजड़ते देखा है
लोगों को खाली पेट सोते देखा है
लोगों को रोते बिलखते देखा है
लोगों को ग़मों के समंदर में डूबते देखा है
लोगों को टूटते बिखरते देखा है
लोगों को राहों में भटकते बिछुड़ते देखा है
लोगों को बिना कारण मरते देखा है
लोगों को अपनों के लिए तरसते देखा है
लोगों को छोटी सी ख़ुशी के लिए तरसते देखा है
ये मैंने तेरा कैसा संसार देखा है
क्या सभी की किस्मत में तूने यही सब लिखा है
क्या सचमुच ये संसार तेरी ही देन है
क्या सभी जिंदगी जैसे लम्बी काली रैन है
मेरे इन सवालों पर तू क्यों मौन है
बता तू क्यों मौन है
मंगलवार, 23 मार्च 2010
वो नहीं मिला
यूँ तो जिंदगी में हमें बहुत कुछ मिला
मगर जो चाहा था हमें वो नहीं मिला
खोजते रहे मगर मंजिल का रास्ता नहीं मिला
जीवन भर यही बस चलता रहा सिलसिला
ना कह सकता हूँ खुद से कि हमें मौका नहीं मिला
अपनी बात कहने का हमें हौसला ही नहीं मिला
किस्मत का साथ तो "नाशाद" हमें हर वक्त ही मिला
खुद ही ना दे सके अपना साथ अब किससे करें गिला
यूँ तो जिंदगी में हमें बहुत कुछ मिला
मगर जो चाहा था हमें वो नहीं मिला
खोजते रहे मगर मंजिल का रास्ता नहीं मिला
जीवन भर यही बस चलता रहा सिलसिला
ना कह सकता हूँ खुद से कि हमें मौका नहीं मिला
अपनी बात कहने का हमें हौसला ही नहीं मिला
किस्मत का साथ तो "नाशाद" हमें हर वक्त ही मिला
खुद ही ना दे सके अपना साथ अब किससे करें गिला
रविवार, 21 मार्च 2010
मैं
आँखें है कहीं खोई खोई
चेहरा है उलझा उलझा
जिंदगी का जैसे मसला कोई
आज तक हो नहीं सुलझा
दिल कहीं रहता है मेरा
धड़कन कहीं और है खोई
मंजिल है सामने खड़ी पर
रास्ता अभी तक कोई नहीं सूझा
खयाल एक तरफ जा रहे
इरादे चल दिए हैं और कहीं
कदम डगमग डगमग हो रहे
जीवन का हर एक तार है उलझा
जिस्म बिखरा है टुकड़े टुकड़े
जुड़ेगा कैसे ये ना जाने कोई
रातें होती है सभी की काली
यहाँ दिन भी है उलझा उलझा
आँखें है कहीं खोई खोई
आँखें है कहीं खोई खोई
चेहरा है उलझा उलझा
जिंदगी का जैसे मसला कोई
आज तक हो नहीं सुलझा
दिल कहीं रहता है मेरा
धड़कन कहीं और है खोई
मंजिल है सामने खड़ी पर
रास्ता अभी तक कोई नहीं सूझा
खयाल एक तरफ जा रहे
इरादे चल दिए हैं और कहीं
कदम डगमग डगमग हो रहे
जीवन का हर एक तार है उलझा
जिस्म बिखरा है टुकड़े टुकड़े
जुड़ेगा कैसे ये ना जाने कोई
रातें होती है सभी की काली
यहाँ दिन भी है उलझा उलझा
आँखें है कहीं खोई खोई
चेहरा है उलझा उलझा
जिंदगी का जैसे मसला कोई
आज तक हो नहीं सुलझा
गुरुवार, 18 मार्च 2010
गरीबों का मज़ाक उड़ाती मायावती
पिछले दो दिनों से मायावती ने जो कुछ भी किया है वो सिर्फ और सिर्फ गरीबों का मज़ाक उड़ाया है. जिस देश में आज भी लगभग बीस फीसदी लोग दो वक्त कि रोटी भी ठीक ढंग से नहीं जुटा पाते. लगभग तीस फीसदी लोगों के पास अपने तन को ठीक ढंग से ढकने के लिए कपडे नहीं है ; एक तिहाई जनता के पास अपना कोई मकान नहीं है और बेरोजगारी को कोई हिसाब नहीं है औए भ्रस्टाचार की फांस दिन दूनी रात चौगुनी कसती जा राही है उस देश के सबसे बड़े प्रदेश की मुख्यमंत्री अगर ऐसी हरकत करे तो ये बड़े ही शर्म की बात है. कहने को वो खुद को दलित की बेटी कहती है लेकिन सारा खेल दौलत का ही खेलती है. खुले आम लोगों से चंदा लेने में इन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती. कृपालुजी महाराज के आश्रम में हुई भगदड़ से मरे लोगों को मुआवजा ठुकराते हुए उसने यह कहा कि सरकारी खजाने में पैसे नहीं है और कल की रैली पर करोड़ों खर्च हुए हैं. ये रुपये कहाँ से आये. बरेली जल रहा है .कत्ले आम मचा हुआ है लेकिन मायावती नोटों की माला पहनने में और अपना स्वागत - सत्कार कराने में मशगूल है . मुख्यमंत्री के तलुए चाटने वाले प्रदेश के मंत्री उपर से यह कह रहे हैं कि अब वे हमेशा बहनजी ( ? ) को नोटों की ही माला पहनाएंगे. हद हो गई पद लोलुपता और जी हुजूरी की.
इसी मायावती ने कभी ब्राह्मणों को लात मारने की बात कही थी और आज वही ब्राह्मण वर्ग उसी मायावती के पैरों में शरण लिए हुए हैं. कम से कम ब्राह्मन समाज से यह उम्मीद किसी को भी ना थी . यह महिला किसी भी सरकारी कर्मचारी को जब चाहे तब थप्पड़ मार देती है और कोई चूं तक नहीं करता. इस प्रदेश के मंत्री और एम् एल ए खुले आम सरकारी कर्मचारियों को धमकाते हैं और कभी कभी उनका क़त्ल भी कर देते हैं और प्रदेश कि जनता खामोश देखती रह जाती है. विरोधी पार्टीयाँ भी केवल एक दो दिन थोडासा हंगामा करने के पश्चात वापस जैसे कि सो जाती है.
आजकल के नेता कितने ढीठ और उद्दंड हो चुके हैं कि उन्हें किसी बात की कोई फ़िक्र नहीं है ; कानून का कोई डर नहीं है. कहते हैं ना कि नंगे को किस बात की शर्म. हमारे नेता तो इसके भी एक कदम आगे निकल चुके हैं . वे नंगे होकर सडकों पर उतरते हैं और लोगों को यह कहते हैं कि अपनी आँखें बंद कर लो हम नंगे होकर निकल रहे हैं .
भारत का लोकतंत्र ऐसे नेताओं के हवाले रहा तो फिर इस देश का भगवान् ही मालिक है . करोड़ों रुपये खर्च कर के खुद के पुतले बनवाना हमारे देश की लोकतंत्र व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाता है. गंगा तथा यमुना जैसी महान नदीयाँ जिस प्रदेश में एक गंदे नाले का रूप ले चुकी है उस प्रदेश की मुख्यमंत्री के ऐसे कृत्य गरीब लोगों की बेबसी के साथ लिया गया एक क्रूर मजाक है. उत्तर प्रदेश में रोजगार के अवसर ना के बराबर है तभी तो हर साल लाखों लोग देश के अन्य दूसरे राज्यों में जा जाकर रोजगार तलाश रहे हैं और मायावती अखबारों में करोडो रुपये खर्च कर के विज्ञापन देती है कि राज्य का चौमुखा विकास हो चुका है और जनता खुशहाल है .
क्या यही भारत देश का भविष्य है ? क्या अब भारत इन भ्रष्ट और उद्दंड नेताओं का गुलाम हो चुका है ? क्या इस देश की जनता जो पहले अंग्रेजों की गुलाम थी और अब इन नेताओं की गुलामी हमेशा के लिए करती रहेगी ? इन सवालों का जवाब जनता को खुद तलाशना होगा और खुद ही कुछ करना होगा क्योंकि हम किसी भी राजनितिक दल से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो इस व्यवस्था में कोई सुधार ला पायेगा.
मंगलवार, 16 मार्च 2010
दूर बहुत सवेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
टूट गए हैं ख्वाब सभी
उम्मीदों ने भी दामन छोड़ा है
कितना खुद पर आंसू बहाऊँ
जितना भी बहाऊँ वो थोडा है
जब भी कभी मैं आगे बढा हूँ
नाकामीयों ने रास्ता रोका है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
मंजिलें सब ओझल हो गई
रास्ते भी कहीं खो गए
कभी कभी लगता है अब तो
अपने ख्वाब भी पराये हो गए
नींद नहीं आती रातों में
फिर यादों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
आंसुओं से जाम भर गए
फिर भी प्यास नहीं बुझी
खुद को बन लिया परवाना
पर हर शम्मा है बुझी बुझी
बिन पिए ही कदम लडखडा गए
अब संभलना मुश्किल लगता है
किस तरह आगे बढूँ
आफतों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
टूट गए हैं ख्वाब सभी
उम्मीदों ने भी दामन छोड़ा है
कितना खुद पर आंसू बहाऊँ
जितना भी बहाऊँ वो थोडा है
जब भी कभी मैं आगे बढा हूँ
नाकामीयों ने रास्ता रोका है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
मंजिलें सब ओझल हो गई
रास्ते भी कहीं खो गए
कभी कभी लगता है अब तो
अपने ख्वाब भी पराये हो गए
नींद नहीं आती रातों में
फिर यादों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
आंसुओं से जाम भर गए
फिर भी प्यास नहीं बुझी
खुद को बन लिया परवाना
पर हर शम्मा है बुझी बुझी
बिन पिए ही कदम लडखडा गए
अब संभलना मुश्किल लगता है
किस तरह आगे बढूँ
आफतों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
सोमवार, 15 मार्च 2010
गुढी पाढवा : भारत का राष्ट्रीय नव वर्ष
गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है .
इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.
गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है . इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.
हाथ की ये लकीरें
कहीं लेकर नहीं जाती है हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत नहीं संवारती है कभी हाथ की ये लकीरें
खुद ही खोज लो अपनी मंजिल अगर पाना है
कभी राह नहीं बतलाती है हाथ की ये लकीरें
कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें
सपनों को तोडती है इरादों को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें
ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें
ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद" तुम्हें कर देगी बरबाद हाथ की ये लकीरें
कहीं लेकर नहीं जाती है हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत नहीं संवारती है कभी हाथ की ये लकीरें
खुद ही खोज लो अपनी मंजिल अगर पाना है
कभी राह नहीं बतलाती है हाथ की ये लकीरें
कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें
सपनों को तोडती है इरादों को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें
ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें
ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद" तुम्हें कर देगी बरबाद हाथ की ये लकीरें
रविवार, 14 मार्च 2010
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाते आज के धारावाहिक
इन दिनों अनगिनत धारावाहिक अलग अलग चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं. इन धारावाहिकों में जिस तरह से हमारी संस्कृति का मखौल उड़ाया जा रहा है वो असहनीय है. सामजिक कुरीतियों को उजागर करना एक अच्छी बात है लेकिन उन कुरितेयों को बढा चढ़ा कर दिखाना कहाँ तक उचित है . दो दो माह तक एक ही घटना को दिखाना किसी की सहनशक्ति का इम्तिहान लेना है . कब कौनसे धारावाहिक की कहानी किधर मुड जाएगी यह शायद उस धारावाहिक का लेखक भी खुद नहीं जानता. बालिका वधु ; ना आना इस देस लाडो; बैरी पिया और ना जाने क्या क्या ? छह छह सात सात साल तक एक ही धारावाहिक को इस तरह से घसीटा जा रहा ही कि जैसे हमारे यहाँ अच्छी और स्वस्थ कहानीयों का अकाल पड़ गया हो. आजकल चल रहे धारावाहिकों में केवल सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों को बढा चढ़ा कर दर्शाया जा रहा है. कभी कभी ऊब सी हो जाती है. कभी कभी तो ऐसा लगता है जैसे आजकल के धारावाहिक केवल पैसा कमाने के लिए बनाए जा रहे हैं और दर्शकों से कोई लेना देना नहीं है . फ़िल्मी ड्रामों से भी कहीं अधिक नाटकीयता आ गई है . एक ही परिवार के सदस्यों की आपस में बेहद गिरी हुई दुश्मनी बतलाना लेखकों और निर्माता - निर्देशकों के दिमागी दीवालियापन का सबूत है .भारतीय नारी का जिस तरह से चरित्र हनन किया जा रहा है वो बरदाश्त की हद से बाहर है . कब कौनसी औरत किस पुरुष की पत्नी बनने वाली है कोई नहीं बता सकता. कभी कभी तो कहने इतना भटक जाती है कि लेखक खुद ही अपने को भटका हुआ महसूस करने लग जाता है और आखिर में तंग आकर किसी पात्र को या तो बिना मतलब मार डालता है या उसकी याददाश्त को मिटा देता है .
बात बात पर सडकों पर उतरने वाले तमाम महिला संघटन कहाँ है ? महिला आयोग भी जैसे सो रहा है ? हर धारावाहिक में एक एक नारी का दो दो पुरुषों से सम्बन्ध बताना भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाना नहीं है तो और क्या है ? जिस देश में नारी को देवी मना जाता है उस देश में नारी का यह अपमान भारतीय नारी किस तरह से सहन कर रही है ये भी सोचने वाली बात है .
बात बात पर सडकों पर उतरने वाले तमाम महिला संघटन कहाँ है ? महिला आयोग भी जैसे सो रहा है ? हर धारावाहिक में एक एक नारी का दो दो पुरुषों से सम्बन्ध बताना भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाना नहीं है तो और क्या है ? जिस देश में नारी को देवी मना जाता है उस देश में नारी का यह अपमान भारतीय नारी किस तरह से सहन कर रही है ये भी सोचने वाली बात है .
क्या हमारे चैनलों के मालिक व्यवसाय को लेकर इतने गिर चुके हैं कि पैसे कमाने के लिए वो भारतीय संस्कृति को पूरी तरह से तोड़ मरोड़ कर दिखने पर आमादा है . विश्व हिन्दू परिषद् ; बजरंग दल , श्री राम सेने जैसे तथाकथित सांस्कृतिक संघटन जो कि वेलेनटायन डे मनाने पर पूरे देश में हाय तौबा मचाते हैं वो इस तरह के धारावाहिकों पर खामोश क्यों है ? एक तरफ ये संघटन खुद को भारतीय संस्कृति का ठेकेदार समझते हैं और खुद ही कहते हैं लेकिन इस चरित्र हनन पर इनकी चुप्पी हास्यास्पद है और संदेहजनक भी है. बात बात पर संस्कृति कि दुहाई देने वालों का दोमुंहापन उनकी भी असलियत दिखला रहा है .
इन धारावाहिकों का विरोध इसी इलेक्ट्रोनिक मीडिया से ही संभव है. लेकिन यहाँ भी निराशाजनक स्थिति है . तमाम न्यूज़ चैनल भी इन धारावाहिकों को बढा चढ़ा कर दिखलाते हैं. न्यूज चैनल को अगर बिना मेहनत मसाला मिल जाय तो और क्या चाहिए . बुद्धिजीवी संघटन ही कुछ करें तो करें वर्ना स्थिति बहुत चिंताजनक है. आने वाली पीढ़ी इससे क्या शिक्षा लेगी ये भी बहुत बड़ी चिंता का विषय है . हमारे साहित्य में अनगिनत अच्छी शिक्षाप्रद कहानियाँ और उपन्यास है लेकिन उन पर कोई धारावाहिक नहीं बनाता. सब टीवी पर चल रहा लापतागंज धारावाहिक हमारे उत्कृष्ट साहित्य का श्रेष्ठ उदहारण है .शरद जोशी के व्यंग निबंधों पर आधारित यह धारावाहिक सभी उम्र के दर्शकों द्वारा पसंद किया जा रहा है. अच्छे प्रयास हमेशा सफल होते है बशर्ते ईमानदारी से कोई प्रयास तो करे.
हम उम्मीद करते हैं की आने वाले वक्त में लापतागंज जैसे प्रयास और भी होंगे और हमारी संस्कृति का बेहूदा मखौल उदानेवालों को मुंह की खानी पड़ेगी.
हम उम्मीद करते हैं की आने वाले वक्त में लापतागंज जैसे प्रयास और भी होंगे और हमारी संस्कृति का बेहूदा मखौल उदानेवालों को मुंह की खानी पड़ेगी.
शनिवार, 6 मार्च 2010
जीवन कैसे बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
दिन बीते साल बीते और
बस यूहीं जमाना बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन में पाया बहुत कम पर
बहुत कुछ जैसे खो दिया
मंजिल नहीं मिली अब तक पर
हर रास्ता जैसे खो दिया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
दिन बीते साल बीते और
बस यूहीं जमाना बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन में पाया बहुत कम पर
बहुत कुछ जैसे खो दिया
मंजिल नहीं मिली अब तक पर
हर रास्ता जैसे खो दिया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
आनेवाला कल अच्छा होगा पर
इसी इंतज़ार में आज खो दिया
फिर कभी कहूँगा उसे दिल की बात
सोचते सोचते साथ उसी का छूट गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
अब कुछ ना बचा
अब कुछ ना रहा
अब केवल यादें बाकी है
सन्नाटे हैं चारों ओर
बीती बातें गूंजती है
जो चेहरे हमसे दूर हो गए
वो चेहरे याद आते हैं
बंद कर लो आंख्ने तो
ख़्वाबों में आ जाते है
दूर दूर फैला है एक शून्य
अब मन बहुत अकेला है
जितना जिसके करीब गया मैं
वो उतना ही दूर हो गया
कभी कभी लगता है जैसे
खुद पर से भरोसा उठ गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जैसा चाहा था मैंने पर
वैसा ना मेरा अतीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन कैसे बीत गया
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मैं तेरा हाथ ज़िन्दगी भर थामे खड़ा रहता
तेरे आँचल में सारी उम्र गुजार देता
तेरी आँखों में खुद को बसा लेता
तेरी जुल्फों में खुद को उलझा देता
तेरी मुस्कान पर मैं लुट जाता
तेरी बाहों में सारे गम भुला देता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
तुझे अपने से दूर ना जाने देता
तेरे सारे गम मैं अपना लेता
अपनी सारी खुशीयाँ तुझे दे देता
तेरी राहों में फूल बिछा देता
तुझे अपनी मंजिल बना लेता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मैं तेरा हाथ ज़िन्दगी भर थामे खड़ा रहता
तेरे आँचल में सारी उम्र गुजार देता
तेरी आँखों में खुद को बसा लेता
तेरी जुल्फों में खुद को उलझा देता
तेरी मुस्कान पर मैं लुट जाता
तेरी बाहों में सारे गम भुला देता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
तुझे अपने से दूर ना जाने देता
तेरे सारे गम मैं अपना लेता
अपनी सारी खुशीयाँ तुझे दे देता
तेरी राहों में फूल बिछा देता
तुझे अपनी मंजिल बना लेता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मंगलवार, 2 मार्च 2010
गाँव बहुत याद आएगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
जब भी ढलेगी शाम तो
गाँव बहुत याद आएगा
ना कोई साथ चलेगा
ना कोई अपना लगेगा
जब देंगे लोग धोखा तो
गाँव बहुत याद आयेगा
माना के शहर में
मेले हैं बहुत मगर; जब
खुद को पाओगे अकेला तो
गाँव बहुत याद आएगा
खुशीयों में रहेगा
हर कोई संग यहाँ मगर; जब
छाएंगे ग़मों के बादल तो
गाँव बहुत याद आयेगा
उगते सूरज को
पूजते हैं यहाँ मगर; जब
डूबेगा जब तुम्हारा सूरज तो
गाँव बहुत याद आयेगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
जब भी ढलेगी शाम तो
गाँव बहुत याद आएगा
ना कोई साथ चलेगा
ना कोई अपना लगेगा
जब देंगे लोग धोखा तो
गाँव बहुत याद आयेगा
माना के शहर में
मेले हैं बहुत मगर; जब
खुद को पाओगे अकेला तो
गाँव बहुत याद आएगा
खुशीयों में रहेगा
हर कोई संग यहाँ मगर; जब
छाएंगे ग़मों के बादल तो
गाँव बहुत याद आयेगा
उगते सूरज को
पूजते हैं यहाँ मगर; जब
डूबेगा जब तुम्हारा सूरज तो
गाँव बहुत याद आयेगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
सोमवार, 1 मार्च 2010
यादों की धूप
यादों की तेज धूप में उनकी जुल्फों के साये हैं
इन्ही जुल्फों के साये कई ज़माने बिताये हैं
जब भी बंद की है पलकें हमने उन्हें ही पाया है
आज भी इस कदर वो मेरे दिल में समाये हैं
जब भी उदास होकर हम छतों पर लेटे हैं
बादलों के बीच आकर वो हमेशा मुस्कुराए हैं
काली स्याह रातों में हम जब भी राह भटकाए हैं
उनकी रोशन यादों ने राहों के चिराग जलाये है
सावन के भीगे मौसम में जब जब भी बादल छाए हैं
"नाशाद" करके याद उन्हें हमने खूब आंसू बहाए हैं
यादों की तेज धूप में उनकी जुल्फों के साये हैं
इन्ही जुल्फों के साये कई ज़माने बिताये हैं
जब भी बंद की है पलकें हमने उन्हें ही पाया है
आज भी इस कदर वो मेरे दिल में समाये हैं
जब भी उदास होकर हम छतों पर लेटे हैं
बादलों के बीच आकर वो हमेशा मुस्कुराए हैं
काली स्याह रातों में हम जब भी राह भटकाए हैं
उनकी रोशन यादों ने राहों के चिराग जलाये है
सावन के भीगे मौसम में जब जब भी बादल छाए हैं
"नाशाद" करके याद उन्हें हमने खूब आंसू बहाए हैं
एक पल ठहर जाओ
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
तुम्हारी आँखों में झाँक तो लूं
अपनी किस्मत जान तो लूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
जिसे कभी तुमने लिया था बड़े प्यार से
मेरे उस नाम को फिर से सुन तो लूं
कभी थामा था मैंने जिसे जनम जनम के लिए
उस हाथ को एक पल के लिए थाम तो लूं
जिसे तुमने डाला था मेरे सिर पर बड़े प्यार से
उस आंचल में कुछ देर आंसू बहा तो लूं
दिल में बनाई थी मैंने जो तस्वीर तुम्हारी
उस तस्वीर को सदा के लिए मिटा तो लूं
जिनमे बांधा था तुमने मुझे हमेशा के लिए
उन बंधनों को मैं खुद खोल तो लूं
कभी जो तुमने लिखे थे मेरे लिए बड़े प्यार से
उन खतों को मैं आज तुम्हें लौटा तो दूं
कभी जो हमने किये थे जनम जनम साथ निभाने के
उन वादों से आज़ाद आज मैं तुम्हें कर तो दूं
जिसे रखा था अब तक सीने से लगाकर
तुम्हारे उस दिल को तुम्हे लौटा तो दूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
तुम्हारी आँखों में झाँक तो लूं
अपनी किस्मत जान तो लूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
जिसे कभी तुमने लिया था बड़े प्यार से
मेरे उस नाम को फिर से सुन तो लूं
कभी थामा था मैंने जिसे जनम जनम के लिए
उस हाथ को एक पल के लिए थाम तो लूं
जिसे तुमने डाला था मेरे सिर पर बड़े प्यार से
उस आंचल में कुछ देर आंसू बहा तो लूं
दिल में बनाई थी मैंने जो तस्वीर तुम्हारी
उस तस्वीर को सदा के लिए मिटा तो लूं
जिनमे बांधा था तुमने मुझे हमेशा के लिए
उन बंधनों को मैं खुद खोल तो लूं
कभी जो तुमने लिखे थे मेरे लिए बड़े प्यार से
उन खतों को मैं आज तुम्हें लौटा तो दूं
कभी जो हमने किये थे जनम जनम साथ निभाने के
उन वादों से आज़ाद आज मैं तुम्हें कर तो दूं
जिसे रखा था अब तक सीने से लगाकर
तुम्हारे उस दिल को तुम्हे लौटा तो दूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
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