गुरुवार, 18 मार्च 2010
मंगलवार, 16 मार्च 2010
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
टूट गए हैं ख्वाब सभी
उम्मीदों ने भी दामन छोड़ा है
कितना खुद पर आंसू बहाऊँ
जितना भी बहाऊँ वो थोडा है
जब भी कभी मैं आगे बढा हूँ
नाकामीयों ने रास्ता रोका है
किस तरह आगे बढूँ
फिर आफतों ने आ घेरा है
मंजिलें सब ओझल हो गई
रास्ते भी कहीं खो गए
कभी कभी लगता है अब तो
अपने ख्वाब भी पराये हो गए
नींद नहीं आती रातों में
फिर यादों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
आंसुओं से जाम भर गए
फिर भी प्यास नहीं बुझी
खुद को बन लिया परवाना
पर हर शम्मा है बुझी बुझी
बिन पिए ही कदम लडखडा गए
अब संभलना मुश्किल लगता है
किस तरह आगे बढूँ
आफतों ने आ घेरा है
रात बहुत अंधियारी है
और दूर बहुत सवेरा है
सोमवार, 15 मार्च 2010
गुढी पढवा भारतीय नव वर्ष घोषित किया जाना चाहिए . भारत के अधिकाँश हिस्सों में इसी दिन से नया साल आरम्भ हुआ माना जाता है . हम लोग १ जनवरी को नया साल मनाते हैं जो कि अंतर्राष्ट्रीय नव वर्ष है . हमारा भारत एक विशाल और समृद्ध देश है . इसका इतिहास सबसे पुराना है . ये एक बड़े खेद की बात है कि हमारे देश का राष्ट्रीय नव वर्ष कोई नहीं है . ये बात अलग है कि हमारे भिन्न भिन्न राज्यों में भिन्न भिन्न दिन नया साल मनाया जाता है लेकिन राष्ट्रीय नया साल तो गुढी पडवा के दिन मनाया जा ही सकता है . हमारे पुराणों में भी इस बात के स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि चैत्र माह की पहली तिथि से नया साल आरम्भ होता है .इस दिन से नौ दिनों तक नवरात्र मनाया जाता है . इस बात पर सहमति बनाई जाये और गुडी पाढवा को भारतीय नव वर्ष दिन घोषित किया जाए.
कहीं लेकर नहीं जाती है हमारी हाथ की ये लकीरें
किस्मत नहीं संवारती है कभी हाथ की ये लकीरें
खुद ही खोज लो अपनी मंजिल अगर पाना है
कभी राह नहीं बतलाती है हाथ की ये लकीरें
कभी ना समझ लेना इन्हें तुम अपनी तकदीरें
खुद ही आपस में उलझी है हाथ की ये लकीरें
सपनों को तोडती है इरादों को झकझोरती है
भावनाओं से अक्सर खेलती है हाथ की ये लकीरें
ख़्वाबों में ही रहती है ये हकीकत नहीं बनती कभी
हाथ मलने को मजबूर करती है हाथ की ये लकीरें
ना कभी करना ऐतबार ना बांधना कभी तुम उम्मीदें
"नाशाद" तुम्हें कर देगी बरबाद हाथ की ये लकीरें
रविवार, 14 मार्च 2010
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
एक पल भी ना कभी ऐसा बीता जब
याद मैंने तुम्हें ना किया
हर सांस तेरे नाम की ली मैंने
हर ख्वाब तेरा ही देखा मैंने
ओढ़ के तेरे नाम की चुनर साजन
मैं तो दीवानी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी तस्वीर सदा रखी मैंने
अपने दिल के आईने में
खुद ने चुन लिए कांटे और
फूल तेरी राहों में बिछा दिए
तुम तक पहुँचने की चाह में
अपनी राह तक मैं भूल गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
हर आहट पर दिल मेरा धड़का
हर सावन में दिल मेरा तरसा
गर मिलते चार कहार मुझे तो
अपनी डोली खुद तेरे घर ले आती
तेरे आने के इंतज़ार में साजन
मेरी ज़िन्दगी अधूरी हो गई
तुम ना कभी बन सके श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
तेरी यादों का ज़हर पी पीकर साजन
मैं तो मीरा हो गई
तुम ना बन सके कभी श्याम साजन पर
मैं तो मीरा हो गई
शुक्रवार, 12 मार्च 2010
बात बात पर सडकों पर उतरने वाले तमाम महिला संघटन कहाँ है ? महिला आयोग भी जैसे सो रहा है ? हर धारावाहिक में एक एक नारी का दो दो पुरुषों से सम्बन्ध बताना भारतीय संस्कृति का मखौल उड़ाना नहीं है तो और क्या है ? जिस देश में नारी को देवी मना जाता है उस देश में नारी का यह अपमान भारतीय नारी किस तरह से सहन कर रही है ये भी सोचने वाली बात है .
हम उम्मीद करते हैं की आने वाले वक्त में लापतागंज जैसे प्रयास और भी होंगे और हमारी संस्कृति का बेहूदा मखौल उदानेवालों को मुंह की खानी पड़ेगी.
शनिवार, 6 मार्च 2010
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
दिन बीते साल बीते और
बस यूहीं जमाना बीत गया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
जीवन कैसे बीत गया
जीवन में पाया बहुत कम पर
बहुत कुछ जैसे खो दिया
मंजिल नहीं मिली अब तक पर
हर रास्ता जैसे खो दिया
अक्सर कहता हूँ मैं खुद से
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
काश वक्त वहीँ थम जाता
मैं तेरा हाथ ज़िन्दगी भर थामे खड़ा रहता
तेरे आँचल में सारी उम्र गुजार देता
तेरी आँखों में खुद को बसा लेता
तेरी जुल्फों में खुद को उलझा देता
तेरी मुस्कान पर मैं लुट जाता
तेरी बाहों में सारे गम भुला देता
काश वक्त वहीँ थम जाता
काश वक्त वहीँ थम जाता
तुझे अपने से दूर ना जाने देता
तेरे सारे गम मैं अपना लेता
अपनी सारी खुशीयाँ तुझे दे देता
तेरी राहों में फूल बिछा देता
तुझे अपनी मंजिल बना लेता
काश वक्त वहीँ थम जाता
मंगलवार, 2 मार्च 2010
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
जब भी ढलेगी शाम तो
गाँव बहुत याद आएगा
ना कोई साथ चलेगा
ना कोई अपना लगेगा
जब देंगे लोग धोखा तो
गाँव बहुत याद आयेगा
माना के शहर में
मेले हैं बहुत मगर; जब
खुद को पाओगे अकेला तो
गाँव बहुत याद आएगा
खुशीयों में रहेगा
हर कोई संग यहाँ मगर; जब
छाएंगे ग़मों के बादल तो
गाँव बहुत याद आयेगा
उगते सूरज को
पूजते हैं यहाँ मगर; जब
डूबेगा जब तुम्हारा सूरज तो
गाँव बहुत याद आयेगा
आ तो बसे हैं शहर में
गाँव बहुत याद आएगा
सोमवार, 1 मार्च 2010
यादों की तेज धूप में उनकी जुल्फों के साये हैं
इन्ही जुल्फों के साये कई ज़माने बिताये हैं
जब भी बंद की है पलकें हमने उन्हें ही पाया है
आज भी इस कदर वो मेरे दिल में समाये हैं
जब भी उदास होकर हम छतों पर लेटे हैं
बादलों के बीच आकर वो हमेशा मुस्कुराए हैं
काली स्याह रातों में हम जब भी राह भटकाए हैं
उनकी रोशन यादों ने राहों के चिराग जलाये है
सावन के भीगे मौसम में जब जब भी बादल छाए हैं
"नाशाद" करके याद उन्हें हमने खूब आंसू बहाए हैं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
तुम्हारी आँखों में झाँक तो लूं
अपनी किस्मत जान तो लूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
जिसे कभी तुमने लिया था बड़े प्यार से
मेरे उस नाम को फिर से सुन तो लूं
कभी थामा था मैंने जिसे जनम जनम के लिए
उस हाथ को एक पल के लिए थाम तो लूं
जिसे तुमने डाला था मेरे सिर पर बड़े प्यार से
उस आंचल में कुछ देर आंसू बहा तो लूं
दिल में बनाई थी मैंने जो तस्वीर तुम्हारी
उस तस्वीर को सदा के लिए मिटा तो लूं
जिनमे बांधा था तुमने मुझे हमेशा के लिए
उन बंधनों को मैं खुद खोल तो लूं
कभी जो तुमने लिखे थे मेरे लिए बड़े प्यार से
उन खतों को मैं आज तुम्हें लौटा तो दूं
कभी जो हमने किये थे जनम जनम साथ निभाने के
उन वादों से आज़ाद आज मैं तुम्हें कर तो दूं
जिसे रखा था अब तक सीने से लगाकर
तुम्हारे उस दिल को तुम्हे लौटा तो दूं
चले जाना फिर सदा के लिए
बस एक पल ठहर जाओ
रविवार, 28 फ़रवरी 2010
बीते हुए लम्हे; भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें
अपनों की भीड़ में अक्सर
खुद को तलाशती है आँखें
दुनिया भर के खराबों में
खुशीयाँ तलाशती है आँखें
तन्हाइयों और खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें
हर किसी के चेहरे में
तुम्हें तलाशती है आँखें
बंद पड़े उन दरीचों में
अपने तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलीयों में
यार तलाशती है आँखें
दम तोडती जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें
यारों की सूनी महफ़िलों में
"नाशाद" को तलाशती है आँखें
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
खुद की आँखों से आंसू बनकर; गिर चुका हूँ मैं
दूसरों की नज़रों से लोग गिराएंगे क्या मुझे
खुद को खुद ही के दिल से कब का निकाल चुका हूँ मैं
औरों के दिलों से लोग निकालेंगे क्या मुझे
खुद ही खुद को कब से सजा दे रहा हूँ मैं
औरों के ज़ुल्मों की सजा क्या देंगे लोग मुझे
खुद ही अपनी मंजिल से कब का भटक चूका हूँ मैं
गैर आकर अपनी राह से भटकायेंगे क्या मुझे
शीशा बनकर कब का टुकडे टुकड़े हो चुका हूँ मैं
झूठी दिलासा देकर लोग जोड़ेंगे क्या मुझे
किसी की याद बनकर तन्हाइयों में खो चुका हूँ मैं
मेरी यादों में बसकर लोग तड़पाएंगे क्या मुझे
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
कितना अच्छा लगता था उन दिनों
लोग जब लेते थे तेरा नाम मेरा नाम
दीवारों पर यूंही लिख देते थे उन दिनों
लोग जब एक साथ तेरा नाम मेरा नाम
दो दिलों को मिलता देख उन दिनों
लोग याद करते थे तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई गिनता था किसी की याद में तारे
लोग गिनाते थे सभी को तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई लिखता था ग़ज़ल किसी की याद में
लोग गुनगुनाते थे प्यार से तेरा नाम मेरा नाम
जब कोई दीवाना घूमता था बेमतलब गलीयों में
लोग कहते थे एक दूजे से तेरा नाम मेरा नाम
वक़्त के साथ बदल गयी ज़माने की तस्वीर
साथ ही बिगड़ गयी हम दोनों की तकदीर
अब टूटता है किसी मुफलिस का दिल तो
लोग लेते हैं ख़ामोशी से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई तड़पता है किसी की याद में तो
लोग लेते हैं धीरे से तेरा नाम मेरा नाम
अब कोई सोचता है करने को मोहब्बत तो
लोग याद दिलाते हैं उसे तेरा नाम मेरा नाम

तू
तू ही दूर तू ही करीब है
तेरा साथ कितना अजीब है
मेरी दोस्ती भी तुझी से हो
क्योंकि तू ही मेरा रकीब है
है दुआ तू मुझको नसीब हो
फिर अपना अपना नसीब है
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फिर तेरी याद

फिर से आई तेरी याद है
ऐ खुदा फिर फ़रियाद है
सावन आया बादल छा गए
फिर से बरसी तेरी याद है
ना मिलोगे तुम तो क्या हुआ
संग मेरे जो अब तेरी याद है
इस जहाँ में सब मुझसे दूर है
सब कुछ मेरा बस तेरी याद है
चाहे ढूंढ ले अब तू सारा जहाँ
ना मिलेगा जैसा ये "नाशाद" है
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
तेरी गलीयाँ तेरी महफ़िल
बस और मुझे कुछ याद नहीं
एक बस तू एक बस मैं
बस और मुझे कुछ याद नहीं
चाहा तुझे और पूजा तुझे
अब जीवन मेरा बरबाद नहीं
चाहे तू मिले या ना मिले
अब खुदा से कोई फ़रियाद नहीं
हकीकत में नहीं तो ख़्वाबों में आ
वर्ना जिंदगी मेरी आबाद नहीं
चाहूं जिसे और मुझे मिल जाए
ना पूरी हुई मेरी कोई मुराद नहीं
जाकर मांग लूं खुदा से तुझे
हुई ऐसी कोई तरकीब ईजाद नहीं
तेरे इश्क में हम घरबार भुला दें
ऐसे भी हम "नाशाद" नहीं
ये कैसी मौहब्बत है जहाँ इज़हार करना मना है
ये कैसी तन्हाइयां है जहाँ यादों का आना मना है
ये कैसी नींद है जिसमे यादों का आना मना है
ये कैसे ख्वाब है जिनमे किसी का आना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे ग़मों पर आंसू बहाना मना है
ये कैसा वक़्त है जहाँ हमें खुशीयाँ तलाशना मना है
ये कैसी बहारें है जिनमे गुलों का भी खिलना मना है
ये कैसा जहाँ है जिसमे दो दिलों का मिलना मना है
ये कैसा सावन है जिनमे बादलों का बरसना मना है
ये कैसी महफ़िल है जिसमे "नाशाद" का आना मना है
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
जानूं
मेरे लिए कौन हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मेरे लिए क्या हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
जैसे कोई पूरा हुआ ख्वाब हो तुम
खुदा ने सुन ली वो फरियाद हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
एक लडकी जानी पहचानी-सी हो तुम
जो अपनी ही लगी वो अनजानी हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मेरी हर आरज़ू हो तुम
मेरी हर खुशी हो तुम
मेरी हर धड़कन हो तुम
मेरी जीवन-प्राण हो तुम
ये तो सिर्फ मैं जानूं
तुम ही हो मेरी जानूं
ये तो सिर्फ मैं जानूं
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
किसी का हर बात पर हंसना और शरमाना याद आता है
किसी को याद करना और उसका सामने आना याद आता है
किसी का अलविदा कहना मुझे अब भी बहुत याद आता है
किसी का भूला हुआ चेहरा अब भी बहुत याद आता है
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
मैं तुम्हारी याद हूँ
अभी भी तुम्हारी सांसों की महक
मेरे चारों ओर है
अभी भी तुम्हारी हंसी की आवाज़
मेरे जहाँ में समाई है
अभी भी तुम्हारी ना ख़त्म होनेवाली बातें
मेरे कानों में गूंजती है
अभी भी तुम्हारे दिल की धड़कन
मेरे दिल में धड़कती है
अभी भी तुम्हारे होने का अहसास
मेरी आँखों में बसा हुआ है
अभी भी मेरी छाया में
अक्स तुम्हारा छुपा हुआ है
अभी भी तुम्हरे लौट आने की आस
मेरी उम्मीद में जिंदा है
तुम्हारी साँसे लेता हूँ
तुम्हारी बातें बोलता हूँ
तुम्हारी हंसी हँसता हूँ
तुम्हारी याद में जिंदा हूँ
क्योंकि मैं तुम्हारी याद हूँ
मैं तुम्हारी याद हूँ
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
तुम्हें भुला ना पाई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
वो तुम्हारी मुस्कान
वो आंखों की भाषा
जिनमें थी प्यार की अभिलाषा
वो ख़त पुराने
जिनमें थी प्यार की परिभाषा
वो सपन सुहाने
वो खनकती आवाज़
वो पहचानी सी आहट
वो मिलन की हर घडी
मैं तुम्हे भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
वो मंदिर की दहलीज
वो अनसुनी प्रार्थनाएं
वो मज़ार पर चादरें
वो लौटी फरियादें
वो पीपल तले वादे
वो जनम जनम के वादे
वो सूने दरीचे
वो खाली राहें
वो अंतिम मिलन पर सुबकती रुलाई
अपनी जुदाई मैं ना समझ पाई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
जब भी चली कभी पुरवाई
मुझे तुम्हारी ही याद आई
मैं तुम्हें भुला ना पाई प्रियतम
तुम्हें भुला ना पाई
मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
साँसों की कमी लगे है
मंजिल है सामने मगर रास्तों की कमी लगे है
जिंदगी बाकी है मगर साँसों की कमी लगे है
दोस्त तो बहुत है हमारे मगर दुश्मनों की कमी लगे है
दुःख है ज़माने में बहुत मगर खुशीयों की कमी लगे है
बस्तियां तो बहुत है मगर इंसानों की कमी लगे है
हर नाता झूठा है यहाँ सच्चाईयों की कमी लगे है
किसी का दूर जाना भी अब तो करीब आना लगे है
मोहब्बतें बिखरी है यहाँ वहां तलाशों की कमी लगे है
दुआएं करता है हर कोई यहाँ मगर असर की कमी लगे है
महफ़िल में है कई सुखनवर मगर नाशाद की कमी लगे है
शनिवार, 13 फ़रवरी 2010
आ गया वसंत सखि;
वे भी लौट आयेंगे
बगिया में खिले फूलों जैसे
सभी के चेहरे खिल जायेंगे
वृक्षों की डालीयाँ फूलों से लद गयी
फूलों की बगिया तितलियों से भर गयी
मुंडेरों पर चहक रही चिड़िया
लो फिर कागा आ गया
उनके आने का जैसे संदेसा आ गया
वे भी लौट आयेंगे
इतने दिनों की तन्हाई के बाद
फिर से दिन मिलन के आयेंगे
सुरमई आँखों में सखि
खुशीयों के आंसू छलक जायेंगे
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
फलाश के वृक्षों पर फिर लालिमा छा गई
उड़ने लगा फिर अबीर गुलाल
रंगों की छठा चहुँ ओर छा गई
अधखुले फूल सभी खिल जायेंगे
लौट आये सभी भंवरे सखि
लौट आया वसंत सखि
वे भी लौट आयेंगे
एक वो भी ज़माना था
जब लिखा करते थे दरख्तों पर नाम तेरा
घने जंगलों की अनजान राहों में
देखा करते थे रास्ता तेरा
दूर उफक में हम कहीं
तलाशा करते थे चेहरा तेरा
खामोश वादीयों में
हम अक्सर पुकारा करते थे नाम तेरा
अब ज़माना बदल गया
और साथ वक़्त भी बीत गया
देखते देखते ही हम
दोनों में फासला हो गया
अब शायद ही कभी हम मिलेंगे
आने वाले दिन तेरी यादों में कटेंगे
अब खोजते हैं उन दरख्तों को
जिन पर तेरा नाम कभी लिखा था
अब खोजते हैं उन राहों को
जिन पर तेरा रास्ता कभी तका था
पतझड़ के सूखे पत्तों की खड़क ही
तेरा आना लगता है
दूर उफक में परिन्दों की परवाज़
तेरा चेहरा दिखलाती है
सूनी वादीयों में झरनों की आवाज़
तेरी हंसी की याद दिलाती है

कितना कुछ बदल गया इन गुज़रे सालों में
कितना फासला हो गया इन दो ज़मानों में
दरिया के दो किनारों का सा अब साथ है हमारा
समंदर तक पहुँचते ही यह साथ भी छूट जायेगा
तब ये दिल हमेशा के लिए तेरी याद में खामोश हो जायेगा
फिर कभी नाशाद को, कोई साथ ना याद आएगा
सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
मेरा ख्वाब
दूर पहाड़ों कि गोद में होगा घर हमारा
चारों ओर होगा खुशीयों का नज़ारा
वहां पर ना होगा कभी ग़मों का अँधेरा
खिला रहेगा वहां सदा खुशीयों का सवेरा
दुनिया की हर ख़ुशी होगी हमारी
कोई गम ना होगा दिल को गवारा
खुशीयों के बादल दिल के आसमानों पर छाएंगे
ठंडी हवाओं के संग हम गीत ख्सुही के गायेंगे
गुरुवार, 4 फ़रवरी 2010

बहार थी; फूल थे, महक थी
तुम ना थे
गलीयाँ थी; मोड़ थे , इंतज़ार था
तुम ना थे
शाम थी ; यादें थी , तनहाइयाँ थी
तुम ना थे
महफ़िल थी ; किस्से थे , ज़िक्र था
तुम ना थे
जुदाई थी ; तड़प थी , दुआएं थीं
तुम ना थे
ख़याल थे ; नींद थी , ख्वाब थे
तुम ना थे
राहें थी ; राही थे , मंजिलें थी
तुम ना थे
दिल था ; आरज़ू थी , उम्मीद थी
तुम ना थे
शेर थे ; ग़ज़ल थी , नाशाद था
तुम ना थे
बस सिर्फ तुम ना थे
हर एक कोना कुछ कहता है
छत पुरानी शामें याद कराती है
कमरे बा बाऊजी की आवाजें सुनाती है
सीढीयाँ पापा की पदचाप सुनाती है
यहाँ यादों का बसेरा है
जहाँ बीता बचपन मेरा है
हाँ यह घर मेरा है
जहाँ आंधीयां खुशबू लेकर आती है
सुबहें भोर राग सुनाती है
दोपहरें सन्नाटों में गुनगुनाती है
शामें अपनों की महफिलें सजाती है
रातें लोरीयाँ सुनाती है
यहाँ मेरे सभी पुरखों का बसेरा है
हाँ यह घर मेरा है
आरज़ू है हर शाम यहीं बीते
ज़िन्दगी की शाम भी यहीं ढले
हर जनम यहीं मिले
हम सभी हर जनम में यहीं मिले
शुक्रवार, 15 जनवरी 2010
जब सामने आते हो तुम
तो शरमा जाती हूँ मैं
साजन, तुम सपनों में आया करो
बहुत कुछ कहना है तुम्हें
तुम्हें देख सब भूल जाती हूँ
तुम सपनों में आया करो
खुद को देखना चाहती हूँ तुम्हारी आंखों में
मिलते ही तुमसे नज़र आंखें झुक जाती है
तुम सपनों में आया करो
थाम कर तुम्हारा हाथ दूर तलक जाना चाहती हूँ मैं
पर ज़माने से घबराती हूँ
तुम सपनों में आया करो
रोजाना मिलने के बहाने अब खोजना मुश्किल है
पर तुम बिन रहना भी अब मुश्किल है
तुम सपनों में आया करो
साजन, तुम सपनों में आया करो
गुरुवार, 14 जनवरी 2010
अपनी किताबों में मेरा नाम लिखते थे तुम
मुझे ख़त लिखते थे और खुद ही पढ़ते थे तुम
हर अजनबी आहट को मेरा ही आना समझते थे तुम
मेरी तस्वीर लेकर शाम को छत पे खड़े रहते थे तुम
मेरा ख़याल दिल में आते ही "नाशाद" कहीं खो जाते थे तुम
सोमवार, 11 जनवरी 2010
शुक्रवार, 27 नवंबर 2009
सोमवार, 16 नवंबर 2009
लौट कर आऊँगा
अगर चला गया हूँ तो लौट कर भी आऊँगा
तुम मेरी राहों में नज़रें बिछाकर देखना
ना भूला सकोगे मुझे तुम उम्र भर
मुझे अपनी यादों में बसाकर देखना
हर दरीचे में नज़र आएगा चेहरा मेरा
हर बंद दरीचे को तुम खुलाकर देखना
जब भी खडा पाओ किसी दोराहे तुम खुद को
चला आऊँगा तुम्हें राह दिखलाने
मुझे आवाज़ लगाकर देखना
जिस्म से दूर हो गया हूँ तो क्या
रूह में तुम्हारी समां चुका हूँ मैं
हर कदम पर तुम्हारे साथ रहूँगा
हर जनम में मैं तुम्हें मिलूंगा
मेरा इंतज़ार कर के देखना
महसूस करोगे अपनी हर सांस में तुम सभी
अपने दिल की धडकनों को सुन कर देखना
फिर जनम लेंगे हम
हर जनम मिलेंगे हम
सोमवार, 2 नवंबर 2009
कोई है मेरे दिल में रहता है
दिल ये जानता है कि वो आपको नहीं पा सकता
फिर भी वो मानता नहीं है
कदम ये जानते हैं कि आप तक नहीं पहुँच सकते
फिर भी वे रुकते नहीं हैं
हाथ ये जानते हैं कि उनकी दुआओं में वो असर नहीं
फिर भी वे झुकते नहीं है
ऑंखें ये जानती है कि उनकी किस्मत में अब आपका नज़ारा नहीं
लेकिन वे बंद होती नहीं है
हर किसी को उसकी चाहत नहीं मिलती है
हर किसी को ग़मों से राहत नहीं मिलती नहीं है
ऐ खुदा गर ये तेरी दुनिया है
तो ऐसी दुनिया मिटती क्यों नहीं है
गर तू हर वक़्त खुश रहता है तो
हमें हमारी खुशियाँ मिलती क्यूँ नहीं है
रविवार, 1 नवंबर 2009
यादें
मंगलवार, 4 अगस्त 2009


शनिवार, 1 अगस्त 2009

नज़रों में तो था मगर दिल से दूर था
वो मेरा होकर भी कभी मेरा ना था
बे चराग गलियों में उसकी आवाजें तो थी
दरीचों से झाँका मगर गलियों में कोई न था
उसके जाने के बाद दिल तो बहुत रोया
मगर आंखों में उसके एक आंसू ना था
दूर तलक फैले तो थे उसकी यादों के काले साये
मगर धूप का कहीं नाम ओ निशान तक ना था
रविवार, 19 जुलाई 2009

बीते लम्हे भूली बिसरी यादें
यही सब तलाशती है आँखें
अपनों की भीड़ में अक्सर
ख़ुद को तलाशती है ऑंखें
दुनिया भर के वीरानों में
खुशीयाँ तलाशती है आँखें
तन्हाईयों खामोशियों में
आवाजें तलाशती है आँखें
हर बेगाने चेहरे में
किसी को तलाशती है आँखें
बंद पड़े तमाम दरीचों में
अपनों को तलाशती है आँखें
सूनी हो चुकी गलियों में
बिछुडे यार तलाशती है आँखें
दम तोड़ती हुई जिंदगी में
साँसें तलाशती है आँखें
टूटते हुए सभी रिश्तों में
करीबीयाँ तलाशती है आँखें
शाम ए ग़ज़ल है यारों
नाशाद को तलाशती है आँखें
चल कहीं चल
चल कहीं चल जहाँ कुछ देर ताज़ा हवा चले
चल कहीं चल जहाँ ग़मों की आंधी ना चले
चल कहीं चल जहाँ खुशियों का उजाला हो
चल कहीं चल जहाँ हर किसी पर ऐतबार हो
चल कहीं चल जहाँ ज़ज्बातों की कदर हो
चल कहीं चल जहाँ बचपन खिलखिलाता हो
चल कहीं चल जहाँ लोरियां सुलाती हों
चल कहीं चल जहाँ जिंदगी की हर साँस ताज़ा हो
चल कहीं चल जहाँ इंसानों में दूरीयाँ ना हो
चल कहीं चल जहाँ रिश्तों में करीबियां हो
चल कहीं चल जहाँ जिंदगी का बसेरा हो
चल कहीं चल जहाँ मौत का सन्नाटा ना हो
चल कहीं चल जहाँ गलियां और चौबारा हो
चल कहीं चल जहाँ नदियाँ और पहाड़ हो
चल कहीं चल जहाँ खुशियाँ बुलाती हो
चल कहीं चल जहाँ उदासीयाँ मुंह छुपाती हो
चल कहीं चल जहाँ अपनों का बसेरा हो
चल कहीं चल जहाँ पुर सूकून लम्हे हो
चल कहीं चल जहाँ करब अंगेज़ उजाले हो
चल कहीं चल जहाँ मुस्कानें बुलाती हो
चल वहीँ चल नाशाद चल वहीँ चल
शनिवार, 18 जुलाई 2009

बचपन का गाँव
वो जो बचपन का गाँव जिसे हम कहीं दूर छोड़ आए
चलो आज फ़िर से उसी गाँव की तरफ़ चला जाए
वो जो पीपल जिसके साए में गुजरती थी हर दोपहर
चलो आज फ़िर उसी पीपल की छाँव में बैठा जाए
वो जो गाँव की गलियां जहाँ हम दौड़ा करते थे दिन भर
चलो फ़िर उन्ही गलियों में बेमतलब घूमा जाए
वो जो अमराइयाँ जिनमे हम चुराया करते थे आम हर रोज़
चलो आज फ़िर उन्ही अमराइयों की तरफ़ चला जाए
वो जो बचपन का साथी हर खेल में जिससे होता था झगडा
चलो आज चलकर उससे गले मिलकर रोया जाए
बहुत हो चुका बेदिल बदिन्तिजाम आज का शहर
चलो फ़िर लौटकर नाशाद अपने गाँव बसा जाए
गुरुवार, 16 जुलाई 2009

मंगलवार, 14 जुलाई 2009
अपना गलियारा
है याद मुझे वो गलियारा
वो आँगन वो चौबारा
वो घर वो गाँव
वो बा बाउजी का चेहरा
उस आँगन में बा तुम
मुझको खूब खिलाती थी
अच्छाई का सच्चाई का
मुझको पाठ सिखाती थी
सीधी सीधी बातों में तुम
मुझे सीख अच्छी दे जाती थी
हर इंसान में भगवान् है
मुझे तुम रोज़ समझाती थी
वहां सरल जीवन मैं जीता था
भोलेपन की मिटटी में दिल रहता था
गाँव की गलियों में जीवन जी रहा था
बा - बाउजी की मुस्कानों में सारा जहाँ था
फ़िर वो दिन भी आया जब दूर जाना पड़ा
सब कुछ छोड़ सब कुछ भूल दूर जाना पड़ा
बाउजी को हमेशा हमेशा के लिए खोना पड़ा
गाँव गलियां चौबारा ना जाने क्यों छोड़ना पड़ा
कुछ लम्हे फ़िर भी बाकी बिताने को मिले
बा की जिंदगी से कुछ हिस्से मुझे और मिले
कितना खुशनसीब था मैं ; मुझे तीन माँओं ने पाला था
सब कुछ पाकर भी जैसे सब कुछ मैंने खो दिया है
ना जाने मुझे आज फ़िर क्यों मेरा गाँव याद आया है
ना जाने बा बाउजी ने उसे कहाँ छुपाया है
कोई मुझे आज ये बताये मैं क्यों जीवन हूँ हारा
क्यों छूटा है मेरा वो गाँव गलियां वो चौबारा
अपने आँगन से प्यार करो ; अपने गलियारों में खेलो
खुशीयों के तीर चलाओ ; सुख की लहरों से खेलो
जो वक्त आज गुजर रहा है फ़िर ना आएगा दोबारा
तुम तरसोगे आँगन को ; खोजोगे अपना गलियारा

आराधना
पहाडों के आँचल में ; नदियों की कलकल में
पक्षियों की कलरव में ; तारों की झिलमिल में
पलकों की छाँव में ; सपनों के गाँव में
शहरों की गलियों में ; यादों के बसेरों में
फूलों की कलियों में ; सावन के झूलों में
डायरी के भरे पन्नों में ; धुंधली होती तस्वीरों में
याद आती मुलाकातों में ; भूलती हुई यादों में
कभी जो किए थे वादों में ; अटल हमारे इरादों में
किसी को तलाश है तेरी
लौट आने की आस है तेरी
तुम बिन कोई आज भी अधूरा है
सूना किसी का बसेरा है
हर जगह तुझे कोई तलाशता है
हर दुआ में तुझे कोई मांगता है
हर रोज़ तेरी आराधना करता है
हर रोज़ तेरी तलाश करता है
लोग मुझे तेरी तलाश कहते हैं
लोग तुझे मेरी आराधना कहते हैं
शुक्रवार, 10 जुलाई 2009
मंगलवार, 7 जुलाई 2009
बरसों बाद अपने गाँव पहुँचा तो रात भर
बचपन के सारे गीत मुझे सुनाती रही हवा
गाँव उजड़ चुका था हर दोस्त बिछुड़ चुका था
फ़िर भी इन सभी का अहसास कराती रही हवा
हर दोपहर का साथी वो बरगद सूख चुका था
उसके सूखे ठूंठ से टकराती फिरती रही हवा
सावन रूठ चुका था तालाब सूख चुका था
कागज़ की कश्तियों को ख़ुद ही उडाती रही हवा
वो आँगन सूना था जहाँ दादा दादी का बसेरा था
नाम उनका मेरे संग पुकारती रही हवा
मैं अकेला ही खड़ा था बचपन के उजडे गाँव में
नाम मेरा पुकारती और मुझे ही ढूंढती रही हवा
उजडा गाँव फ़िर से बसाकर क्या नाशाद यहीं रहोगे
अपने सवाल के ज़वाब का इंतज़ार करती रही हवा































